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भारत में किसी खिलौने की दुकान पर जाइए. वहां बच्चे के लिए कोई पसंदीदा खिलौना ख़रीदते हुए आपको यह भी समझ आ सकता है कि भारत अपने ताक़तवर पड़ोसी चीन के साथ आर्थिक रिश्तों में संतुलन बनाने के लिए किस तरह जूझ रहा है.
छह साल पहले भारत ने विदेश से आने वाले खिलौनों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया था. इसका मक़सद देश में खिलौनों का उत्पादन बढ़ाना और ख़राब क्वालिटी के विदेशी खिलौनों को भारतीय बाज़ार से बाहर रखना था.
उस समय आयातित खिलौनों पर 20 फ़ीसदी शुल्क लगता था. इसे पहले बढ़ाकर 60 फ़ीसदी और फिर 70 फ़ीसदी कर दिया गया.
दुकानदारों और खिलौना बेचने वाली कंपनियों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका कहना था कि भारत की कंपनियां विदेशों में बने खिलौनों का मुक़ाबला कभी नहीं कर पाएंगी.
लेकिन आयात शुल्क बढ़ाने और क्वालिटी से जुड़े नियम सख़्त करने का असर हुआ.
कभी भारतीय खिलौना बाज़ार में चीन की 70% हिस्सेदारी थी
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भारत में खिलौनों का आयात 2020 के क़रीब 30 करोड़ डॉलर से एक-तिहाई घटकर इस साल 10 करोड़ डॉलर रह गया.
इसी दौरान भारत से खिलौनों का निर्यात क़रीब 12.9 करोड़ डॉलर से बढ़कर 20 करोड़ डॉलर हो गया.
भारत खिलौनों के मामले में चीन पर अपनी निर्भरता काफ़ी कम करने में भी कामयाब रहा. एक समय भारत के खिलौना बाज़ार में चीन की हिस्सेदारी 70 फ़ीसदी थी.
हालांकि, खिलौना उद्योग उन गिने-चुने क्षेत्रों में शामिल है, जहां भारत को ऐसी सफलता मिली है.
चीन के साथ लगातार एकतरफ़ा होते जा रहे व्यापारिक रिश्तों को संतुलित करने की भारत की दूसरी कोशिशें बहुत कामयाब नहीं हुई हैं.
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और चीन के बीच व्यापार का यह असंतुलन अब दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक असंतुलनों में शामिल है.
साल 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़पों के बाद दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्ते बुरी तरह बिगड़ गए थे.
इसके बाद दिल्ली ने चीन से आने वाले कई सामान पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया. इसका मतलब है कि ऐसे सस्ते विदेशी सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, जिनसे भारत के अपने उद्योगों को नुक़सान होने का ख़तरा था.
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भारत ने टिकटॉक जैसे कई चीनी ऐप पर भी पाबंदी लगा दी.
लेकिन इन क़दमों के बावजूद चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता रहा.
साल 2020 में यह घाटा 44 अरब डॉलर था. इस साल यह बढ़कर 112 अरब डॉलर के चौंकाने वाले स्तर पर पहुंच गया.
वॉशिंगटन में एशिया सोसायटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के सेंटर फ़ॉर चाइना एनालिसिस से जुड़े केविन ज़ोंगझे ली ने बीबीसी से कहा, “जिस समय भारत और चीन के राजनीतिक, सुरक्षा और निवेश से जुड़े रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर थे, उसी दौरान चीन पर भारत की आर्थिक निर्भरता लगातार बढ़ती गई.”
इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि इस दौरान चीन को होने वाला भारत का निर्यात महामारी से पहले के स्तर से भी नीचे रहा. दूसरी ओर, चीन से होने वाला आयात दोगुना हो गया.
‘दोनों देशों के रिश्ते धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं’

दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड एंड रिसर्च इनिशिएटिव यानी जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “भारत उद्योगों के लिए जितना सामान आयात करता है, उसमें चीन की हिस्सेदारी अब 30 फ़ीसदी से ज़्यादा है. भारत 100 से ज़्यादा अहम उत्पादों के लिए चीन पर निर्भर है और यह असंतुलन लगातार बढ़ रहा है.”
श्रीवास्तव के मुताबिक़, अगर आयात इसी तेज़ रफ़्तार से बढ़ता रहा तो दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 134 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
ऐसा हुआ तो भारत के उद्योगों पर दबाव बनाने की चीन की ताक़त और बढ़ जाएगी.
सितंबर में दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मुद्दे पर बात की थी.
दोनों देशों के रिश्ते धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं. इसी बीच दोनों नेताओं ने व्यापार में मौजूद “बुनियादी असंतुलन और सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याओं” को दूर करने का वादा किया.
लेकिन विशेषज्ञों ने बीबीसी से कहा कि भारत के उद्योग चीनी सामान पर इतने ज़्यादा निर्भर हो चुके हैं कि इस स्थिति को बदलना दिल्ली के लिए बेहद मुश्किल होगा.
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत अब चीन पर केवल तैयार सामान ख़रीदने के लिए निर्भर नहीं है.
भारत में सामान बनाने के लिए भी चीन से आने वाले पुर्ज़ों, मशीनों और कच्चे माल की ज़रूरत पड़ती है.
यह सही है कि भारत ने स्मार्टफ़ोन और सौर ऊर्जा से जुड़े तैयार उपकरणों के आयात पर अपनी निर्भरता कम की है.
अब दुनिया के एक-चौथाई से ज़्यादा आईफ़ोन भारत में बनाए जाते हैं.
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लेकिन अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “इसके बावजूद भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादन का मतलब अब भी बाहर से आए पुर्ज़ों को जोड़ना है. इन पुर्ज़ों के लिए भारत आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, ख़ासकर चीन से होने वाले आयात पर.”
औद्योगिक मशीनों, बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों, रसायनों, सोलर सेल और कारख़ानों में लगने वाले उपकरणों के मामले में भी यही स्थिति है.
थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन यानी ओआरएफ़ के मुताबिक़, चीन से भारत आने वाले सामान में इलेक्ट्रिकल मशीनों और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की हिस्सेदारी अकेले 36 फ़ीसदी है.
इसके बाद मशीनों और दूसरे मशीनी उपकरणों की हिस्सेदारी 21.7 फ़ीसदी है.
ऑर्गेनिक केमिकल यानी कार्बनिक रसायनों और प्लास्टिक की हिस्सेदारी भी काफ़ी बड़ी है.
ओआरएफ़ के सेंटर फ़ॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी से जुड़े सौम्य भौमिक कहते हैं कि अगर इन चीज़ों की सप्लाई रुकती है तो इसका असर केवल लोगों के इस्तेमाल वाले सामान पर नहीं पड़ेगा, बल्कि कारख़ानों में उत्पादन भी रुक सकता है.
उनके मुताबिक़, इससे पता चलता है कि भारत के लिए चीन से आने वाले पुर्ज़ों और कच्चे माल की जगह देश में बनी चीज़ों का इस्तेमाल करना कितना मुश्किल है.
चीन से भारत का आयात केवल पुर्ज़ों और कच्चे माल की बढ़ती ज़रूरत के कारण नहीं बढ़ रहा है. इसके पीछे अर्थव्यवस्था में हो रहे कुछ बड़े बदलाव भी हैं.
चीन के पास स्टील, सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक गाड़ियों जैसे कई क्षेत्रों में अपनी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा सामान बनाने की क्षमता है.
लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हो रही है. उसका घरेलू बाज़ार इस पूरे उत्पादन को नहीं खपा पा रहा है.
इसलिए चीन की कंपनियां अब दूसरे देशों के बाज़ारों की ओर ज़्यादा रुख़ कर रही हैं और वहां कम क़ीमत पर सामान बेच रही हैं.
अनुमान है कि लगातार दूसरे साल चीन का व्यापार सरप्लस एक लाख करोड़ डॉलर से ज़्यादा रहेगा. व्यापार सरप्लस का मतलब है कि कोई देश जितना सामान ख़रीदता है, उससे ज़्यादा सामान दूसरे देशों को बेचता है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि इनमें से बहुत सा सामान भारत आ रहा है.
इसकी एक वजह यह है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में तेज़ी से उत्पादन बढ़ा रहा है. इसके लिए उसे मशीनों, पुर्ज़ों और कच्चे माल की ज़रूरत है.
दूसरी वजह यह है कि पश्चिमी देश चीन से आने वाले सामान पर शुल्क और दूसरी पाबंदियां लगा रहे हैं.
दूसरी ओर, भारत की कंपनियों के लिए चीन के बाज़ार में अपनी जगह बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है.
कई मामलों में भारत चीन से पीछे
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केविन ली कहते हैं, “भारतीय उत्पादों को चीन में कई तरह के शुल्क और दूसरी रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इस वजह से भारतीय कंपनियों के लिए वहां बड़े पैमाने पर अपना निर्यात बढ़ाना मुश्किल हो जाता है.”
वह कहते हैं, “अगर दोनों देशों के रिश्ते सामान्य होते रहे, लेकिन चीन के बाज़ार में भारत को भी बराबर पहुंच दिलाने के लिए गंभीर कोशिश नहीं की गई, तो राजनीतिक रिश्ते तो बेहतर हो सकते हैं, लेकिन चीन पर भारत की आर्थिक निर्भरता पहले जैसी ही बनी रहेगी.”
अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़, जिन आयातों से बचा जा सकता है उन्हें कम करने और निर्यात बढ़ाने का लंबे समय का रास्ता भारत में उत्पादन को मज़बूत करना है.
लेकिन इसके लिए हर उद्योग की ज़रूरत के मुताबिक़ अलग नीतियां बनानी होंगी. इसके साथ ही अर्थव्यवस्था की बुनियादी सुविधाओं को भी बेहतर करना होगा.
इनमें सस्ती बिजली, कम क़ीमत पर क़र्ज़, सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की बेहतर व्यवस्था और ऐसे नियम शामिल हैं, जो बार-बार न बदलें.
श्रीवास्तव कहते हैं कि इन मामलों में भारत अब भी पीछे है.
भारत ने हाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई से जुड़े नियमों में भी कुछ ढील दी है.
इससे भारत में अपना निवेश बढ़ाने की इच्छा रखने वाली चीनी कंपनियों के लिए रास्ता खुल सकता है.
लेकिन श्रीवास्तव कहते हैं कि ऐसे निवेश की भी सावधानी से जांच करनी होगी.
वह कहते हैं, “अगर किसी निवेश से केवल सामान बेचने का नेटवर्क बढ़ता है या चीन से आए पुर्ज़ों को भारत में जोड़कर उत्पाद तैयार किए जाते हैं, तो इससे आयात और बढ़ सकता है. चीन पर भारत की निर्भरता भी ज़्यादा हो सकती है.”
“इसलिए उन निवेशों को मंज़ूरी देने में प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिनसे भारत को नई तकनीक मिले, भारत में ज़्यादा उत्पादन हो, पुर्ज़े देश में बनाए जाएं और यहां बने सामान का दूसरे देशों को निर्यात किया जाए.”
केविन ली कहते हैं कि फ़िलहाल भारत कुछ ख़ास क्षेत्रों में चीन को अपना निर्यात बढ़ाने पर ध्यान दे सकता है. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार के असंतुलन को कम करने में मदद मिल सकती है.
दवा उद्योग ऐसा ही एक क्षेत्र हो सकता है क्योंकि चीन में बुज़ुर्गों की आबादी और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला ख़र्च बढ़ रहा है.
लेकिन वह कहते हैं, “केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में निर्यात के मौक़े तलाशकर 112 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम नहीं किया जा सकता.”
उनके मुताबिक़, सबसे बड़ा सवाल यह है कि दोनों देशों के रिश्ते सामान्य करने की कोशिशों के बीच क्या चीन अपने बाज़ार में भारत को ज़्यादा पहुंच देने के लिए तैयार है और क्या वह इस मामले में कुछ रियायत देगा.
अगर चीन ऐसा नहीं करता है, तो भारत को इस मुद्दे पर बातचीत के लिए दबाव बनाने का अपना कोई रास्ता तलाशना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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