Source :- LIVE HINDUSTAN
मुख्य बातें
- अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 46.3% बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि आयात की मात्रा लगभग स्थिर रही
- भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत अक्टूबर में बढ़कर 121.25 डॉलर प्रति बैरल हो गई
भारत के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आर्थिक मोर्चे पर नई चुनौती बनती जा रही हैं। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान देश का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल सालाना आधार पर 46.3% बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। खास बात यह है कि इस दौरान भारत ने कच्चे तेल की मात्रा लगभग उतनी ही आयात की, जितनी पिछले साल की समान अवधि में की थी, यानी खर्च में भारी बढ़ोतरी की मुख्य वजह तेल की ऊंची कीमतें हैं।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान भारत ने 12.27 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 12.18 करोड़ टन था। आयात की मात्रा में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद बिल में इतनी बड़ी उछाल बताती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे तेल का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा हो सकता है।
अक्टूबर में 121 डॉलर के पार पहुंचा भारतीय क्रूड बास्केट का भाव
कच्चे तेल की कीमतों में हालिया तेजी ने भारत की चिंता और बढ़ा दी है। भारतीय क्रूड बास्केट का औसत भाव अक्टूबर में बढ़कर 121.25 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि पिछले साल अक्टूबर में यह 65.08 डॉलर था। सितंबर 2026 में भी भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 116.09 डॉलर प्रति बैरल रही थी। सितंबर 2025 में यह 69.61 डॉलर प्रति बैरल थी।
21 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं और सऊदी अरब के एनर्जी ठिकानों पर संभावित हमलों के खतरे से तेल की कीमतों को समर्थन मिल रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव तथा हूती विद्रोहियों के हमलों ने भी सप्लाई बाधित होने की आशंका बढ़ाई है।
सितंबर में भी 46% से ज्यादा बढ़ा तेल आयात बिल
भारत का तेल आयात बिल सिर्फ 6 महीने के आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि सितंबर में भी तेजी से बढ़ा। PPAC के अनुसार, सितंबर में कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 46.6% बढ़कर 15.4 अरब डॉलर हो गया। इस दौरान आयात की मात्रा 6.8% बढ़कर 2.17 करोड़ टन रही।
मार्केट एक्सपर्ट का मानना है कि पश्चिम एशिया में अगर तनाव और बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में बड़ी रुकावट आने का जोखिम बना रहेगा। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें नीचे लाने के लिए भंडार से सप्लाई बढ़ाने या रूस के तेल पर प्रतिबंधों में राहत जैसे कदम भी बाजार की चिंताओं को पूरी तरह दूर नहीं कर पाएंगे।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल भारत विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है।
भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी से सालाना आयात बिल में करीब 2 अरब डॉलर तक का इजाफा हो सकता है।
महंगे तेल का असर सिर्फ विदेशी मुद्रा खर्च तक सीमित नहीं रहता। इससे देश का व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बिगड़ सकता है। साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ने से ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और कई वस्तुओं की लागत भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ ही जाएंगे। इसका असर सरकारी नीतियों, तेल कंपनियों के फैसलों और अन्य लागतों पर भी निर्भर करता है।
2027 तक महंगा रह सकता है कच्चा तेल
S&P ग्लोबल एनर्जी के अनुमान के मुताबिक, 2027 तक कच्चे तेल की कीमतें 80 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के बाकी महीनों में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव करीब 90 डॉलर या उससे अधिक रह सकता है, जबकि 2027 के लिए इसका अनुमान 86 डॉलर प्रति बैरल है। यह पहले के अनुमान से 5 डॉलर अधिक है।
BankPro के CEO पाओलो ब्रोकार्डो के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने या किसी नई घटना के सामने आने पर तेल की कीमतों में फिर तेजी आ सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में बाजार में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहेगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती तेल की उपलब्धता से ज्यादा उसकी कीमत है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो आयात बिल पर दबाव बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें भारत के आर्थिक परिदृश्य के लिए बेहद अहम रहेंगी।
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