Home National news hindi ईरान: अली ख़ामेनेई की वसीयत अब तक क्यों नहीं जारी की...

ईरान: अली ख़ामेनेई की वसीयत अब तक क्यों नहीं जारी की गई?

5
0

Source :- BBC INDIA

अली ख़ामेनेई 28 फ़रवरी 2026 को तेहरान में अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमले में मारे गए थे

इस्लामिक रिपब्लिक के दूसरे सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के मारे जाने को सात महीने हो चुके हैं. लेकिन उनकी राजनीतिक वसीयत अब तक सामने नहीं आई है.

इस दौरान उनकी सिर्फ़ एक पुरानी निजी वसीयत जारी की गई है, जिसे अप्रैल 1963 में लिखा गया था.

अली ख़ामेनेई की वसीयत सामने लाने में तो देरी हुई ही है, उनके उत्तराधिकारी की आवाज़ या तस्वीर भी अब तक जारी नहीं की गई है.

दोनों ही मामलों में सरकार के सबसे ऊंचे स्तर से जुड़ी जानकारी छिपी हुई है. सत्ता के गलियारों में भी इसे सामने लाने की कोई ठोस कोशिश होती नहीं दिख रही है.

‘हो सकता है वसीयत नष्ट हो गई हो’

वसीयत के बारे में आधिकारिक मंचों से एक संभावना यह जताई गई कि सर्वोच्च नेता के आवास पर हुई बमबारी में यह दस्तावेज़ नष्ट हो गया होगा.

सरकारी सूत्रों ने अलग-अलग मौक़ों पर वसीयत से जुड़े सवालों पर जवाब देने की कोशिश ज़रूर की, लेकिन उनके जवाबों से मामला स्पष्ट होने के बजाय और उलझ गया.

वसीयत के बारे में आधिकारिक मंचों से एक संभावना यह जताई गई कि सर्वोच्च नेता के आवास पर हुई बमबारी में यह दस्तावेज़ नष्ट हो गया होगा.

मिसाल के तौर पर, सर्वोच्च नेता से जुड़े संस्थान की निगरानी में प्रकाशित होने वाले अख़बार ‘एत्तेलाआत’ ने कहा कि वसीयत शायद मलबे के नीचे दब गई होगी.

वहीं, तेहरान के मेयर अलीरेज़ा ज़ाकानी ने कहा कि अली ख़ामेनेई की हाथ से लिखी चीज़ें और उनकी निजी लाइब्रेरी नष्ट हो गईं. इसलिए हो सकता है कि वसीयत भी नष्ट हो गई हो.

इन बातों को मानें तो देश के सर्वोच्च नेता की राजनीतिक वसीयत जैसा अहम दस्तावेज़ उनकी निजी लाइब्रेरी जैसी किसी जगह पर रखा गया होगा.

लेकिन ऐसा होना मुश्किल लगता है.

ख़ासकर तब, जब रूहोल्लाह ख़ुमैनी की राजनीतिक वसीयत की दो अलग-अलग प्रतियां सीलबंद करके रखी गई थीं. इनमें से एक प्रति आस्तान-ए-क़ुद्स में और दूसरी असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स यानी विशेषज्ञों की सभा में रखी गई थी.

क्या ख़ुमैनी की वसीयत पर अमल हुआ था?

अली ख़ामेनेई की वसीयत को लेकर लोगों में उत्सुकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वसीयत सामने आते ही ईरान की सत्ता में कोई बड़ा बदलाव हो जाएगा.

वसीयत का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्ता में बैठे लोग उसमें लिखी बातों का क्या मतलब निकालते हैं.

मिसाल के तौर पर, जून 1989 में इस्लामिक रिपब्लिक के संस्थापक रूहोल्लाह ख़ुमैनी की मौत हुई. इसके तुरंत बाद सरकारी अधिकारियों ने उनके प्रति बहुत बढ़ा-चढ़ाकर सम्मान जताया.

लेकिन इसी दौरान उन्होंने ख़ुमैनी की वसीयत में लिखी कुछ सबसे साफ़ हिदायतों को भी नज़रअंदाज़ कर दिया. इससे उनके सामने कोई ख़ास परेशानी भी नहीं आई.

ख़ुमैनी की लंबी वसीयत में ईरान और दुनिया के हालात, पुराने इतिहास और धार्मिक विषयों से जुड़ी बहुत-सी बातें थीं.

इसके साथ ही इसमें सरकार के कामकाज़ को लेकर कुछ साफ़ हिदायतें भी दी गई थीं.

इनमें से एक अहम हिदायत यह थी कि सेना, पुलिस, रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स, बसीज और दूसरे सशस्त्र संगठनों को राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह दूर रहना चाहिए.

लेकिन उनके उत्तराधिकारी के दौर में इसका उलटा हुआ. रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स और ख़ास तौर पर बसीज ईरान के सबसे बड़े और ताक़तवर राजनीतिक संगठनों में शामिल हो गए.

इन संगठनों ने राजनीतिक और चुनावी मुक़ाबलों में भी अहम भूमिका निभाई.

वसीयत के बारे में और क्या-क्या कहा गया?

रूहोल्लाह ख़ुमैनी ने अपनी वसीयत में इस बारे में भी एक अहम निर्देश दिया था कि उनकी मौत के बाद उनके नाम से कही जाने वाली बातों को किस तरह देखा जाए.

असल में, इसे उनकी वसीयत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है.

उन्होंने लिखा था, “जो कुछ भी मेरे नाम से कहा गया है या कहा जाएगा, उसे तब तक सही नहीं माना जाए, जब तक वह मेरी आवाज़ में न हो या उस पर मेरी लिखावट और दस्तख़त न हों और जानकार उसकी पुष्टि न कर दें. इसके अलावा, अगर मैंने इस्लामिक रिपब्लिक के टेलीविज़न पर कोई बात कही हो, तो उसे भी सही माना जा सकता है.”

इसके बावजूद, असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स में वसीयत पढ़े जाने के कुछ ही घंटों बाद अकबर हाशमी रफ़संजानी ने एक दावा किया.

उन्होंने कहा कि पूर्व सर्वोच्च नेता ने निजी तौर पर उनसे और अहमद ख़ुमैनी से कहा था कि अली ख़ामेनेई उनके उत्तराधिकारी बनने के लिए एक अच्छे विकल्प हैं.

सरकारी सूत्रों की ओर से उस बैठक के बारे में जारी विस्तृत रिपोर्टों और वहां मौजूद विरोधी राजनीतिक गुटों के लोगों के बयानों से पता चलता है कि नए सर्वोच्च नेता को इसी कथित बयान के आधार पर चुना गया.

बैठक में मौजूद किसी व्यक्ति ने यह सवाल तक नहीं पूछा कि अगर रूहोल्लाह ख़ुमैनी की वसीयत में लिखी बातों को नज़रअंदाज़ ही करना था, तो उसे पढ़कर सुनाने का क्या फ़ायदा था.

लेनिन के सोवियत संघ से माओ के चीन तक

संभव है कि नए सर्वोच्च नेता या उनकी टीम ने किसी कारण से पूर्व नेता की वसीयत को फ़िलहाल सार्वजनिक न करना ही अपने हित में समझा हो.

जो नेता ज़िंदगी के आख़िर तक सत्ता में बने रहते हैं, उनकी वसीयत सरकार से जुड़े सबसे अहम दस्तावेज़ों में से एक हो सकती है.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ऐसे नेता उन राष्ट्रपतियों से अलग होते हैं, जो कुछ साल सत्ता में रहते हैं और फिर पद छोड़ देते हैं.

ये नेता जब तक जीवित रहते हैं, संवेदनशील मामलों पर फ़ैसले लेते रहते हैं.

इसीलिए सत्ता के भीतर मौजूद विरोधी गुटों के लिए यह बात बहुत अहम हो जाती है कि इन नेताओं की वसीयत को किस तरह समझा जाए, सार्वजनिक किया जाए या उनके बाद के दौर के लिए छिपाकर रखा जाए.

इससे इन गुटों के अपने अहम हित जुड़े होते हैं.

इसका एक मशहूर ऐतिहासिक उदाहरण 1917 की रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की वसीयत है.

असल में यह सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस को लिखा गया एक पत्र था.

इसमें पार्टी के बड़े नेताओं की कमियों की आलोचना की गई थी. साथ ही जोसेफ़ स्टालिन के हाथों में सत्ता इकट्ठा होने को लेकर साफ़ चेतावनी दी गई थी.

लेनिन की मौत के बाद यह पत्र केवल पार्टी की बंद बैठकों में वरिष्ठ प्रतिनिधियों को पढ़कर सुनाया गया.

स्टालिन ने पार्टी में अपने साथियों की मदद से इसे आम लोगों के सामने आने से रोक दिया.

हालांकि, 1926 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने इस वसीयत की जानकारी सार्वजनिक कर दी थी.

लेकिन सोवियत संघ में इसे लेनिन की मौत के 32 साल बाद, यानी 1956 में आम लोगों के लिए प्रकाशित किया गया.

यह उस समय के सोवियत नेता निकिता ख़्रुश्चेव के स्टालिन-विरोधी अभियान का दौर था.

चीन में भी 1976 में माओ ज़ेदोंग की मौत के बाद उनकी छोड़ी गई हिदायतें अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की लड़ाई से जुड़ गईं.

चीनी क्रांति के नेता माओ ने कोई लिखित राजनीतिक वसीयत नहीं छोड़ी थी.

हालांकि, अपनी मौत से लगभग 20 साल पहले उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के कई दूसरे ताक़तवर नेताओं के साथ एक दस्तावेज़ पर दस्तख़त किए थे.

इस दस्तावेज़ में कहा गया था कि पार्टी नेताओं के शवों का अंतिम संस्कार किया जाए और उनकी याद में मक़बरे न बनाए जाएं.

अगर कोई दस्तावेज़ सामने आया तो क्या सभी उसे मानेंगे?

माना जाता है कि इसका मक़सद कम्युनिस्ट शासन से पहले चली आ रही धार्मिक अंतिम संस्कार की परंपराओं और मृत लोगों की बहुत ज़्यादा पूजा करने की प्रथा का विरोध करना था.

लेकिन माओ के उत्तराधिकारी हुआ गुओफ़ेंग और उनके साथियों ने उनकी इस हिदायत को सार्वजनिक नहीं किया.

पार्टी के भीतर अपने विरोधियों के सामने सत्ता मज़बूत करने के लिए उन्हें ऐसे प्रतीकों की ज़रूरत थी, जो उनके शासन को सही ठहरा सकें.

उन्होंने माओ के लिए एक विशाल समाधि बनवाई और उनके शव को ममी के रूप में सुरक्षित रखा. यह चीन के पुराने सम्राटों की परंपराओं से भी आगे की व्यवस्था थी.

इसके चार साल बाद चीन के अगले नेता देंग शियाओपिंग ने एक इंटरव्यू में माओ की हिदायतों और उनकी मौत के बाद लिए गए फ़ैसलों के पीछे की राजनीतिक मजबूरियों के बारे में बात की.

हालांकि, इस समय इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के हालात कई मायनों में 1976 के चीन या 1924 के सोवियत संघ से अलग हैं.

यह अंदाज़ा लगाना संभव नहीं है कि अली ख़ामेनेई की वसीयत कब सामने लाई जा सकती है.

इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अगर आख़िरकार इस नाम से कोई दस्तावेज़ सामने आता है, तो सभी पक्ष उसे असली मानने पर सहमत होंगे.

लेकिन तमाम सवालों के बावजूद यह मानना बहुत मुश्किल है कि अली ख़ामेनेई ने अपनी राजनीतिक वसीयत के नाम से कोई दस्तावेज़ तैयार ही नहीं किया होगा.

इससे भी अधिक मुश्किल यह मानना है कि वसीयत अब तक केवल इसलिए सामने नहीं आई, क्योंकि अली ख़ामेनेई के आवास पर बमबारी के दौरान वह नष्ट हो गई थी.

आख़िर में सबसे अधिक संभावना इसी बात की लगती है कि मौजूदा घटनाक्रम भी दुनिया में पहले हो चुकी कुछ ऐसी ही घटनाओं जैसा हो सकता है.

यानी संभव है कि नए सर्वोच्च नेता या उनकी टीम ने किसी कारण से पूर्व नेता की वसीयत को फ़िलहाल सार्वजनिक न करना ही अपने हित में समझा हो.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS