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भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी मोहम्मद शमीम अख़्तर के दिन की शुरुआत निर्वाचन आयोग के ऑनलाइन पोर्टल पर लॉग इन करने से होती है.
वह अपनी मतदाता जानकारी डालकर हर दिन अपील की स्टेट्स चेक करते हैं. लेकिन वहाँ केवल एक शब्द दिखाई देता है- ‘पेंडिंग’ यानी लंबित.
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से कुछ हफ़्ते पहले मतदाता सूची से 90.83 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए थे. अख़्तर भी उनमें शामिल थे.
इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का लगभग 15 साल पुराना शासन ख़त्म हुआ और पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी.
इन 90.83 लाख मतदाताओं के नाम राज्य की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान हटाए गए थे.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एसआईआर को मतदाता सूची ‘शुद्ध’ करने का तरीक़ा बताया था. उन्होंने मतदाता सूची से ‘घुसपैठियों’ के नाम हटाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया था.
लेकिन कई लोगों का दावा है कि उनसे ग़लत तरीक़े से मतदान का अधिकार छीन लिया गया. एसआईआर के विरोध में अब देशभर में लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके हैं. इस प्रक्रिया के कारण भारत के 13 करोड़ लोगों के मतदान के योग्य होने पर अब तक सवाल उठ चुके हैं.
‘छह महीने बीत गए, लेकिन कोई प्रगति नहीं’
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मोहम्मद शमीम अख़्तर ने पिछले महीने यानी सितंबर में बीबीसी को बताया था, “27 मार्च को मुझे एक अतिरिक्त मतदाता सूची से पता चला कि मेरा नाम हटा दिया गया है. यह मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था. मैंने एक अप्रैल को अपील दायर की थी और अब सितंबर ख़त्म होने वाला है.”
“लगभग छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन मुझे अपनी अपील में शायद ही कोई प्रगति दिखाई दे रही है.”
इस हफ़्ते अख़्तर ने पुष्टि की कि उनकी अपील अब भी लंबित है. अख़्तर इस स्थिति का सामना करने वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं.
19 ट्रिब्यूनल और 38.31 लाख अपीलें
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पश्चिम बंगाल में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए थे. इन ट्रिब्यूनलों को राज्य में एसआईआर के दौरान मतदाताओं के बारे में लिए गए फ़ैसलों के ख़िलाफ़ दायर अपीलों की सुनवाई करनी है.
निर्वाचन आयोग के मुताबिक़, इन ट्रिब्यूनलों के काम शुरू करने के छह महीने के भीतर लगभग 38.31 लाख अपीलें दायर हुईं. लेकिन इनमें से अब तक केवल लगभग 3.3 फ़ीसदी अपीलों का निपटारा हुआ है.
इस रफ़्तार को देखते हुए अपील करने वाले लोगों को डर है कि उनका मतदान का अधिकार कई वर्षों तक अधर में लटका रह सकता है.
19 ट्रिब्यूनलों में से एक जज ने पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि अपीलों के निपटारे में इतना समय क्यों लग रहा है.
जज के मुताबिक़, मामलों की बहुत बड़ी संख्या और निर्वाचन आयोग के ऑनलाइन पोर्टल से जुड़ी समस्याएं इसकी प्रमुख वजहों में शामिल हैं.
मतदाता सूची से इतने नाम क्यों हटाए गए?
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पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से हटाए गए 90.83 लाख लोगों में अनुपस्थित, दूसरी जगह चले गए, मृत और दो जगह दर्ज मतदाता शामिल थे.
इन्हें अंग्रेज़ी में एएसडीडी (एब्सेंटी, शिफ्टेड, डेड और डुप्लीकेट) मतदाता कहा जाता है. लेकिन नाम हटाए जाने वाले सभी लोग इस सूची में शामिल नहीं थे.
लाखों लोगों के नाम में ‘तार्किक गड़बड़ियां’ (लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) बताई गईं.
इनमें नाम की वर्तनी का अलग होना, माता-पिता और बच्चों की उम्र के बीच असामान्य अंतर जैसी वजहें शामिल थीं.
कई मतदाताओं को ‘अनमैप्ड’ यानी पुरानी सूची से संबंध साबित न कर पाने वाला बताया गया.
निर्वाचन आयोग के मुताबिक़, जो मतदाता 2002 की मतदाता सूची में दर्ज अपने या अपने किसी रिश्तेदार के नाम से सफलतापूर्वक संबंध नहीं जोड़ पाए, उन्हें ‘अनमैप्ड’ माना गया.
किसी मतदाता को वास्तविक साबित करने की प्रमुख शर्तों में से एक यह थी कि वह पश्चिम बंगाल की 2002 की मतदाता सूची से अपना संबंध स्थापित करे.
चुनाव से एक महीने पहले जांच की ज़िम्मेदारी
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इस साल फ़रवरी में, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से लगभग एक महीने पहले, संदेह के दायरे में आए मतदाताओं की जांच न्यायिक अधिकारियों को सौंप दी गई.
सुप्रीम कोर्ट ने इन अधिकारियों को हर मामले की अलग-अलग जांच करके यह तय करने को कहा था कि संबंधित व्यक्ति मतदान करने के योग्य है या नहीं.
एसआईआर के दौरान न्यायिक अधिकारियों ने 90.83 लाख में से लगभग 27.16 लाख लोगों के मामलों पर फ़ैसला किया. इसके बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इन लोगों के नाम पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से हटा दिए गए.
मुसलमानों के नाम हटने की दर अधिक होने का दावा
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कोलकाता के डेटा रिसर्च संस्थान ‘सबर इंस्टीट्यूट’ के विश्लेषण के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की दर मुसलमानों के बीच अपेक्षाकृत अधिक रही.
ख़ास तौर पर मालदा और मुर्शिदाबाद ज़िलों में यह दर अधिक पाई गई.
राज्य में पहले सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस ने एसआईआर शुरू होने से पहले ही इसका कड़ा विरोध किया था.
पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले महीने बीजेपी और निर्वाचन आयोग पर निशाना साधते हुए कहा था, “आपने एसआईआर क्यों कराया? केवल इसलिए क्योंकि आप ताक़त के बल पर बंगाल पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे. आप किसी दूसरे तरीक़े से ऐसा नहीं कर सकते थे. एसआईआर के नाम पर आपने 92 लाख लोगों के नाम हटा दिए.”
हालांकि, बीजेपी ने इन आरोपों से इनकार किया है.
पार्टी ने बार-बार एसआईआर के ज़रिए मतदाता सूची के ‘शुद्धिकरण’ और ‘अवैध घुसपैठियों’ की पहचान करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.
निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दिया है, जिसे बीबीसी ने देखा है.
इसके मुताबिक़, 16 सितंबर तक पश्चिम बंगाल के 19 ट्रिब्यूनलों में 38.31 लाख से अधिक अपीलें पहुंची थीं.
इनमें से लगभग 1.26 लाख अपीलों का निपटारा किया गया. यह दायर की गई कुल अपीलों का केवल लगभग 3.3 फ़ीसदी है. इसी जानकारी के मुताबिक़, लंबित अपील वाले लगभग 19 हज़ार मतदाताओं में से अधिकतर राज्य में हाल में हुए उपचुनावों में मतदान नहीं कर पाए.
नाम हटाए जाने के बाद अपील का इंतज़ार कर रहे कई लाख दूसरे मतदाताओं को डर है कि राज्य में आने वाले नगर निकाय चुनावों में भी वे चुनाव प्रक्रिया से बाहर रह सकते हैं.
एक दिन में 100 तो कहीं केवल 10 से 15 अपीलें
कुछ दिन पहले बीबीसी ने पश्चिम बंगाल के 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों में से एक जज से मतदाताओं की योग्यता की दोबारा जांच करने की लंबी प्रक्रिया के बारे में बात की.
यह बातचीत पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर हुई. ट्रिब्यूनल के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है?
इस सवाल पर जज ने कहा, “सबसे बड़ी समस्या काम का बोझ है. मेरे ट्रिब्यूनल में लाखों अपीलें लंबित हैं. मैं उन सभी का निपटारा कैसे कर सकता हूं? किसी भी तरह यह संभव नहीं है.”
“हाई कोर्ट के लिए और अधिक सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति करना भी संभव नहीं है. इतनी सारी अपीलें संभालने के लिए पर्याप्त संख्या में सेवानिवृत्त जज हैं ही नहीं.”
जज के मुताबिक़, कुछ ट्रिब्यूनल एक दिन में लगभग 100 अपीलों का निपटारा कर सकते हैं. कुछ ट्रिब्यूनल केवल 10 से 15 अपीलों का ही निपटारा कर पाते हैं.
एक अपील के साथ दिए गए लगभग 30 से 32 दस्तावेज़ों की जांच करनी होती है. इसके बाद अपील पर लिए गए फ़ैसले के बारे में दो पन्नों का आदेश लिखना पड़ता है.
औसतन एक अपील का निपटारा करने में कुल मिलाकर लगभग 20 से 30 मिनट लग सकते हैं.
बीबीसी ने पूछा कि क्या हर मतदाता के मामले की दोबारा जांच करने और उस पर फ़ैसला लेने की पूरी ज़िम्मेदारी केवल ट्रिब्यूनल के जज की है?
जज ने जवाब दिया, “किसी भी अदालत में जज से ऊपर कोई नहीं होता. जो भी करना है, जज को ही करना है. जांच जज को पूरी करनी है. आदेश जज को लिखना है और डिक्टेशन का मिलान भी जज को ही करना है.”
“मेरी मदद के लिए लोग हैं. स्टेनोग्राफ़र, सहायक और चपरासी हैं. वे सभी मौजूद हैं. लेकिन मुझे वही काम करना है, जिसकी ज़िम्मेदारी मुझे दी गई है. यही बात सभी न्यायिक अधिकारियों पर लागू होती है.”
इस रफ़्तार से 37.05 लाख लंबित अपीलों पर फ़ैसले लेने में कई साल लग सकते हैं.
जज ने भी इस बात से सहमति जताई. कुछ याचिकाकर्ता ट्रिब्यूनल में लंबित अपीलों का जल्द निपटारा कराने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट जा रहे हैं.
कई मामलों में हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को उन अपीलों का जल्दी निपटारा करने का आदेश दिया है.
जज ने कहा, “हम ऐसे अधिक से अधिक मामलों का निपटारा जल्दी करने की कोशिश कर रहे हैं. यह सच है कि ऐसे कई आदेश दिए जा रहे हैं. हम भी जितना संभव हो सके, उतना करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा हो ही जाएगा. कई अदालतों में ऐसे मामले अब भी लंबित हैं.”
19 से बढ़ाकर 42 ट्रिब्यूनल करने का प्रस्ताव
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सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफ़नामे में निर्वाचन आयोग ने लंबित अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया को व्यवस्थित और तेज़ करने का प्रस्ताव रखा है.
आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या राज्य की लोकसभा सीटों के बराबर करने पर विचार किया जा सकता है.
सीधे शब्दों में कहें तो आयोग ने ट्रिब्यूनलों की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करने का प्रस्ताव दिया.
कांग्रेस, ममता बनर्जी की ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई(एम), सीपीआई(एमएल) लिबरेशन और नागरिक अधिकार संगठनों ने आने वाले नगर निकाय चुनाव टालने की मांग की है.
इनमें हावड़ा और कोलकाता के नगर निकाय चुनाव भी शामिल हैं.
इन दलों और संगठनों का आरोप है कि एसआईआर के दौरान कई वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए.
ट्रिब्यूनल में एक अपील का निपटारा कैसे होता है?
जज के मुताबिक़, हर ट्रिब्यूनल में मामलों का निपटारा करने का तरीक़ा अलग है.
कुछ ट्रिब्यूनलों में मतदाताओं को ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफ़िसर यानी बीडीओ और बूथ लेवल ऑफ़िसर यानी बीएलओ के ज़रिए नोटिस भेजे जाते हैं.
बीडीओ ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारी होते हैं. बीएलओ चुनाव व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले अधिकारी होते हैं. जज ने बताया कि ऐसे मामलों में सुनवाई की तारीख़ से 15 से 20 दिन पहले मतदाता के ब्लॉक के बीडीओ को नोटिस भेजा जाता है.
जज ने कहा, “नोटिस में सुनवाई में शामिल होने वाले व्यक्ति का नाम होता है. इसमें बीएलओ का नाम और फ़ोन नंबर भी होता है. यह भी बताया जाता है कि संबंधित व्यक्ति को क्यों बुलाया जा रहा है. मसलन, पुरानी मतदाता सूची से संबंध नहीं मिलना या मैपिंग न होना.”
बीडीओ मतदाता से संपर्क करके सुनवाई से पहले ज़रूरी दस्तावेज़ अपने कार्यालय के ज़रिए निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर अपलोड करने की जानकारी देते हैं. इसके बाद बीडीओ के कार्यालय से ही ऑनलाइन सुनवाई होती है.
फ़ैसले के बाद लिखना होता है आदेश
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सुनवाई पूरी होने के बाद जज को एक आदेश लिखना पड़ता है. इसमें बताया जाता है कि अपील करने वाले व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दोबारा क्यों शामिल किया गया या सूची से बाहर क्यों रखा गया.
इसके बाद आदेश को निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर अपलोड किया जाना होता है. हालांकि, जज ने स्पष्ट किया कि सभी ट्रिब्यूनल इसी तरीक़े से काम नहीं करते.
बीबीसी ने इस साल 11 अगस्त को ट्रिब्यूनल के जजों के बीच हुई बैठक का विवरण देखा है. बैठक में कुछ जजों ने मतदान के अधिकार से जुड़े इन मामलों में संबंधित पक्षों को नोटिस भेजने के लिए “उचित व्यवस्था” न होने पर चिंता जताई थी.
बैठक के विवरण में दर्ज एक बिंदु में कहा गया, “कई अनुरोध और याद दिलाने के बावजूद पोर्टल पर ऐसी कोई साझा और उचित व्यवस्था अब तक नहीं बनाई गई है, जिसके ज़रिए संबंधित पक्षों को सीधे या किसी उचित माध्यम से नोटिस भेजा जा सके. मई 2026 में हममें से कुछ लोगों ने संबंधित पक्षों को भेजे जाने वाले नोटिस के एक प्रारूप को मंज़ूरी भी दी थी. लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हुआ.”
नोटिस न जाने से नहीं हो सकी सुनवाई
बीबीसी से बातचीत में जज ने बैठक के इस विवरण को सही बताया.
जज के मुताबिक़, संबंधित पक्षों को सुनवाई का नोटिस भेजने की समस्या के कारण कुछ ट्रिब्यूनल मतदाताओं की सुनवाई नहीं कर पाए हैं.
एक अन्य जज ने मई में ही यह चिंता जताई थी.
बीबीसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखा गया एक पत्र देखा है.
इस पत्र में ट्रिब्यूनल के एक जज ने दावा किया कि हज़ारों अपीलों की जांच की गई, लेकिन केवल कुछ सौ अपीलों का ही निपटारा हो सका.
ये वे अपीलें थीं, जिनके निपटारे के लिए किसी पक्ष की मौजूदगी ज़रूरी नहीं थी.
पत्र में लिखा गया, “अगर संबंधित पक्षों, ख़ास तौर पर अपील करने वालों को नोटिस भेजने की कोई व्यवस्था होती, तो बाक़ी अपीलों का भी निपटारा किया जा सकता था.”
“अपील से जुड़े पक्षों को सूचना देने की व्यवस्था न होने से अपीलों के निपटारे की रफ़्तार पर बुरा असर पड़ रहा है.”
आधार की जानकारी मांगे जाने पर आपत्ति
बीबीसी से बातचीत में जज ने एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया. मौजूदा नियमों के तहत जजों को आदेश अपलोड करने के लिए आधार से जुड़ी अपनी निजी जानकारी साझा करनी पड़ती है.
इस कारण 21 सितंबर से कई जज पोर्टल पर अपने आदेश अपलोड नहीं कर पाए हैं. जज ने कहा, “हर जज कह रहा है कि आधार नंबर साझा नहीं करना है. मैं अपना आधार नंबर क्यों दूं? हर मामले का निपटारा करते समय मेरे आधार से जुड़े नंबर पर एक वन-टाइम पासवर्ड आता है. क्या यह संभव है?”
बीबीसी ने पूछा कि क्या जज अपनी निजी जानकारी की गोपनीयता को लेकर चिंतित हैं?
जज ने जवाब दिया, “हां, इसीलिए हमने कहा है कि हम ऐसा नहीं करेंगे.”
अपीलों का निपटारा रुकने का दावा
बीबीसी को एक सूत्र ने बताया कि पोर्टल की समस्याएं दूर होने तक ट्रिब्यूनलों में अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया रुक गई है. हालांकि, बीबीसी स्वतंत्र रूप से इस दावे की पुष्टि नहीं कर सका है.
इस वजह से आम लोगों की लाखों लंबित अपीलों के निपटारे में और देरी हो रही है. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नतीजों का लोगों ने सामना करना भी शुरू कर दिया है.
जज ने कहा, “पोर्टल पर हमारे पास किसी फ़ैसले की दोबारा समीक्षा करने का अधिकार नहीं है. हम कोई सुधार नहीं कर सकते. अगर हमारी ग़लती से भी किसी का नाम हट जाता है, तो हम कुछ नहीं कर सकते. मुझे उम्मीद है कि इन समस्याओं को ठीक किया जाएगा.”
11 अगस्त की बैठक में ट्रिब्यूनल के जजों ने भी ऐसी चिंताएं जताई थीं.
बैठक के विवरण में लिखा गया, “अपील का निपटारा करके मतदाता का नाम सूची से हटाने या उसमें शामिल करने के बाद पोर्टल पर उस फ़ैसले को वापस नहीं बदला जा सकता. न्यायिक आदेश या किसी दूसरी वजह से पुराने फ़ैसले को बदलने की ज़रूरत होने पर भी ऐसा नहीं किया जा सकता.”
बैठक में दर्ज एक दूसरे बिंदु में कहा गया, “जब ट्रिब्यूनल को पता चलता है कि अपलोड किए गए दस्तावेज़ गणना फ़ॉर्म के मुताबिक़ नहीं हैं या ट्रिब्यूनल को अतिरिक्त दस्तावेज़ चाहिए, तब उन दस्तावेज़ों को हासिल करने की कोई व्यवस्था नहीं है.”
ऑफ़लाइन दी गई अपीलों का क्या हुआ?
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एसआईआर के दौरान मतदान के अधिकार पर लिए गए फ़ैसले को कोई मतदाता अब तक दो तरीक़ों से चुनौती दे सकता था. मतदाता निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर ऑनलाइन अपील दायर कर सकता था.
इसके अलावा ज़िलाधिकारी यानी डीएम या ज़िला निर्वाचन अधिकारी यानी डीईओ को लिखकर भी अपील की जा सकती थी. डीएम किसी ज़िले का सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होता है. डीईओ ज़िले का सबसे वरिष्ठ चुनाव अधिकारी होता है.
11 अगस्त की बैठक के विवरण में डीएम और डीईओ के पास ख़ुद जाकर जमा की गई अपीलों को लेकर चिंता जताई गई.
बैठक में कहा गया, “ट्रिब्यूनलों के ध्यान में आया है कि कुछ नागरिकों ने संबंधित डीएम या डीईओ के सामने व्यक्तिगत रूप से अपील जमा की है. इन अपीलों को डिजिटल रूप में दर्ज नहीं किया गया है. इसलिए उनका रिकॉर्ड रखने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है. अगर इन अपीलों को सही माध्यम तक नहीं पहुंचाया गया, तो इन नागरिकों के साथ अन्याय होगा.”
जज ने बीबीसी से कहा कि डीएम और डीईओ के ज़रिए अपीलें मिली हैं, लेकिन बैठक में दर्ज चिंता अब भी बनी हुई है.
जज ने कहा, “मैं नहीं बता सकता कि ऐसी कितनी अपीलें वास्तव में ट्रिब्यूनल तक पहुंची हैं और कितनी नहीं पहुंचीं. मुझे यह भी नहीं पता कि डीएम के पास कितनी अपीलें जमा की गई हैं.”
किन वजहों से मतदाताओं के नाम हटाए गए?
बीबीसी ने पूछा कि एसआईआर के दौरान अपील करने वालों के नाम शुरुआत में मतदाता सूची से क्यों हटाए गए थे?
जज ने जन्मतिथि और नाम की वर्तनी में गड़बड़ी जैसी वजहें बताईं.
जज ने कहा, “बहुत से लोगों के दस्तावेज़ों में दर्ज जन्मतिथि को लेकर समस्याएं हैं. कुछ मतदाताओं के दो बच्चों की उम्र में केवल नौ महीने का अंतर है. कुछ लोगों के दस्तावेज़ों में एक तय समय के भीतर इतने बच्चे दर्ज हैं, जो वास्तविक नहीं लगता. हो सकता है कि दस्तावेज़ों के मुताबिक़ किसी बुज़ुर्ग मतदाता के यहां 80 साल की उम्र में बच्चा पैदा हुआ हो.”
बीबीसी ने जज से पूछा कि क्या ज़्यादातर लोगों के नाम काग़ज़ी गड़बड़ियों के कारण हटाए गए थे?
इसके जवाब में जज ने एक उदाहरण दिया.
हो सकता है कि 2002 की मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का केवल पहला नाम दर्ज हो. किसी दूसरे दस्तावेज़ में उस व्यक्ति का पहला और आख़िरी नाम हो सकता है. एक अन्य दस्तावेज़ में पहले और आख़िरी नाम के साथ बीच का नाम भी दर्ज हो सकता है.
जज ने कहा, “ऐसी गड़बड़ियों के कारण कुछ लोगों के नाम हटाए गए थे, लेकिन अपीलीय अदालतों में हमने उन्हें ठीक किया है.”
ज़्यादातर मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल
जज के मुताबिक़, अपील करने वाले ज़्यादातर लोगों के नाम मतदाता सूची में दोबारा शामिल किए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल किए जाने की दर बहुत अधिक है.”
निर्वाचन आयोग का हलफ़नामा भी इस दावे का समर्थन करता है.
10 सितंबर तक जिन आवेदनों का निपटारा हुआ, उनमें लगभग 92.94 फ़ीसदी मामलों में ट्रिब्यूनल ने हटाए गए मतदाता का नाम सूची में बनाए रखने का आदेश दिया.
यानी जिन 100 अपीलों का निपटारा हुआ, उनमें से लगभग 93 फ़ैसले मतदाता का नाम सूची में बनाए रखने के पक्ष में थे.
दूसरी ओर, मतदाता सूची में शामिल लोगों की योग्यता पर सवाल उठाते हुए भी बड़ी संख्या में अपीलें दायर की गई हैं.
आरोप है कि ऐसी कई अपीलें निर्वाचन आयोग के नाम पर दायर की गईं.
निर्वाचन आयोग के 16 सितंबर के हलफ़नामे के मुताबिक़, मतदाता सूची में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ ट्रिब्यूनलों में लगभग 16.10 लाख अपीलें दायर हुईं.
जज ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि मतदाता सूची से नाम हटवाने के लिए कई लाख अपीलें निर्वाचन आयोग ने ख़ुद दायर की हैं.
जज के मुताबिक़, ऑनलाइन व्यवस्था में ये अपीलें पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से दायर दिखाई देती हैं.
अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी राज्य के सबसे वरिष्ठ चुनाव अधिकारियों में शामिल होते हैं.
अपीलों में क्या वजहें बताई गईं?
जज के मुताबिक़, इन अपीलों में मतदाता की योग्यता पर सवाल उठाने के लिए कई वजहें दी गई हैं.
जज ने कहा, “ग़लत मैपिंग, पिता से संबंध साबित न होना, दो भाई-बहनों की उम्र में केवल नौ महीने का अंतर और किसी व्यक्ति का 70 साल की उम्र में पिता बनना, ऐसी कई वजहें दी गई हैं.”
जज ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं के नाम सूची में शामिल किए जाने को चुनौती दी गई है, उन्हें भी सुनवाई का नोटिस भेजा जाएगा.
यह प्रक्रिया वैसी ही होगी, जैसी मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के मामलों में अपनाई जाती है.
भारतीय अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक़, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने मतदाता सूची में शामिल लोगों की योग्यता को चुनौती देने वाली अपीलों पर आयोग के भीतर ही सवाल उठाए थे.
रिपोर्ट के मुताबिक़, अगस्त में संधू ने निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखा.
संधू ने पूछा, “निर्वाचन आयोग की ओर से ये अपीलें दायर करने का अधिकार किसे और किसके द्वारा दिया गया था?”
उन्होंने यह भी पूछा, “निर्वाचन आयोग की ओर से वास्तव में ये अपीलें किसने दायर कीं?”
तीन वरिष्ठ अधिकारियों को प्रक्रिया की जानकारी नहीं
रिपोर्ट में दावा किया गया कि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में दर्ज किया कि न तो उन्हें, न उनके साथी निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी और न पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों का आधार या इन्हें दायर करने की प्रक्रिया बताई गई थी.
इस बीच निर्वाचन आयोग ने 26 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दिया.
आयोग ने दावा किया कि मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के ख़िलाफ़ 16.10 लाख अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के ज़रिए दायर की गई थीं.
हलफ़नामे में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों को ये अपीलें दायर करने का अधिकार था.
आयोग ने यह भी कहा कि ये मामले निर्वाचन आयोग के सामने नहीं लाए गए थे.
निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाताओं के नाम सूची में शामिल किए जाने के ख़िलाफ़ अपीलें दायर करने का एक अर्थ यह भी है कि पश्चिम बंगाल के एसआईआर के नतीजों को केवल लाखों परेशान लोग ही चुनौती नहीं दे रहे हैं.
एसआईआर शुरू करने, उसकी निगरानी करने और देशभर में चुनाव कराने वाले निर्वाचन आयोग की ओर से भी इसके नतीजों को चुनौती दी गई है.
सूची से हटाए गए मतदाताओं की मुश्किलें
बीबीसी ने ऐसे मतदाताओं से बात की, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और जिनकी अपीलें ट्रिब्यूनलों में लंबित हैं.
इन लोगों में यह डर और चिंता साफ़ दिखाई देती है कि वास्तविक मतदाता साबित होने तक उन्हें वैध भारतीय नागरिक होने के संदेह का सामना करना पड़ेगा.
वायु सेना के पूर्व अधिकारी अख़्तर ने कहा कि अगर देश की 17 साल सेवा करने के बाद उन्हें इस मुश्किल से गुज़रना पड़ रहा है, तो सोचना चाहिए कि एक आम व्यक्ति पर क्या बीत रही होगी.
पश्चिम बंगाल के हाल में चुने गए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 28 सितंबर को एक कार्यक्रम में कहा था, “जो लोग घुसपैठिए हैं, जिनके नाम एसआईआर के दौरान हटाए गए हैं, वे भारतीय नहीं हैं. उन्हें राशन नहीं मिलेगा, उन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलेगी.”
बैंक ने क़र्ज़ देने से इनकार किया
नज़रुल इस्लाम नाम के एक शख़्स ने बताया कि अपील लंबित होने के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने के कारण उन्हें बार-बार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
उनका दावा है कि बैंक ने कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण अभी उन्हें क़र्ज़ नहीं दिया जा सकता.
इस्लाम ने कहा, “अगर मैं किसी सरकारी कार्यालय या राशन की दुकान पर जाता हूं, तो वे कहेंगे कि हमारा नाम हटा दिया गया है. हमारा कोई भी काम करने से पहले बहुत हिचकिचाहट दिखाई जाती है. जब से हमारे नाम हटाए गए हैं, किसी भी सरकारी कार्यालय में हमारा कोई काम आसानी से नहीं हुआ है.”
मतदाता सूची से हटाए गए फ़ारूक़ हुसैन मोल्ला की अपील भी लंबित है.
मोल्ला कहते हैं कि एसआईआर के इस अनुभव और ट्रिब्यूनल में अनिश्चित समय तक इंतज़ार करने से ऐसा महसूस होता है, जैसे धीरे-धीरे उन्हें देश से बाहर धकेला जा रहा है.
मोल्ला ने कहा, “इतने वर्षों तक नागरिक के रूप में मतदान करने के बाद अब ऐसा लगता है, जैसे हमें देश से बाहर धकेला जा रहा है. मुझे अब नागरिक जैसा महसूस नहीं होता. मैं इस देश से इतना प्यार करते हुए यहां रहा हूं और आज ऐसा लग रहा है, जैसे हमें देश-विरोधी बताया जा रहा है.”
एक अक्तूबर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने विशेष शिविर लगाने की घोषणा की. ये शिविर उन लोगों और युवा या पहली बार मतदान के योग्य बने लोगों के नाम जोड़ने के लिए लगाए जाने हैं, जिनके नाम मतदाता सूची में छूट गए हैं.
हालांकि, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल में लंबित अपील वाले किसी भी मतदाता को इन शिविरों में नाम जुड़वाने की मदद नहीं दी जाएगी.
सूत्र ने कहा, “हम ऐसी प्रक्रिया में दख़ल नहीं दे सकते, जिसे न्यायपालिका देख रही है.”
निर्वाचन आयोग ने जवाब नहीं दिया
बीबीसी ने इस रिपोर्ट में उठाए गए कई सवालों पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग से संपर्क किया.
रिपोर्ट प्रकाशित होने तक आयोग की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट में कहा था, “ईसीआईनेट जैसे आयोग के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बिना अनुमति किसी तरह का बदलाव या हेरफेर रोकने के लिए डेटा सुरक्षा के सख़्त नियमों के तहत काम करते हैं.”
“आईटी सुरक्षा जांच और ऑडिट नियंत्रण देश के सभी डेटाबेस पर लागू किए जाने वाले सामान्य साइबर सुरक्षा उपाय हैं.”
“भारत का निर्वाचन आयोग पूरी ईमानदारी के साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानता है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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