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HDFC के इस म्यूचुअल फंड में ₹1 लाख करोड़ जमा, क्या अब पैसा लगाना सही या सावधानी जरूरी?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के लिए किसी स्कीम का लगातार बड़ा होना आमतौर पर भरोसे का संकेत माना जाता है। लेकिन, जब किसी फंड का साइज यानी AUM (Assets Under Management) बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो एक सवाल जरूर उठता है कि क्या बहुत बड़ा म्यूचुअल फंड आगे भी पहले जैसी तेजी से रिटर्न दे सकता है? यह सवाल अब इसलिए चर्चा में है, क्योंकि HDFC मिड कैप फंड ने ₹1 लाख करोड़ AUM का आंकड़ा पार कर लिया है। इसके साथ ही यह इस स्तर तक पहुंचने वाला चौथा एक्टिव म्यूचुअल फंड बन गया है। इससे पहले पराग पारिख फ्लेक्सी कैप फंड (Parag Parikh Flexi Cap Fund), HDFC फ्लेक्सी कैप फंड (HDFC Flexi Cap Fund) और HDFC बैलेंस एडवांटेज फंड इस क्लब में शामिल हो चुके हैं।

HDFC मिड कैप फंड के ₹1 लाख करोड़ के पार पहुंचने के बाद कुछ निवेशकों को चिंता हो सकती है कि इतना बड़ा पैसा अब कहां और कैसे लगाया जाएगा। खासकर मिड-कैप फंड के मामले में यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस कैटेगरी में फंड को अपने पोर्टफोलियो का कम से कम 65% हिस्सा मिड-कैप शेयरों में रखना होता है। अगर किसी फंड के पास बहुत बड़ा कॉर्पस हो और उसे अपेक्षाकृत छोटी या कम लिक्विड कंपनियों में निवेश करना हो, तो फंड मैनेजर के लिए बड़ी रकम को सही जगह लगाना चुनौती बन सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ AUM बड़ा हो जाना किसी म्यूचुअल फंड को खराब निवेश नहीं बना देता।

आनंद राठी वेल्थ (Anand Rathi Wealth) के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर भरत राठौड़ के मुताबिक, निवेशकों को केवल इसलिए किसी म्यूचुअल फंड से दूरी नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि उसका AUM ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है। उनके अनुसार फंड का साइज अकेले उसके प्रदर्शन को तय नहीं करता। एक जैसे AUM वाले दो फंड का प्रदर्शन एक-दूसरे से काफी अलग हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि 2025 में ICICI प्रूडेंशियल लार्ज कैप फंड अपनी कैटेगरी के सबसे बड़े फंडों में शामिल होने के बावजूद बेहतर प्रदर्शन करने वालों में रहा, जबकि एक अन्य बड़े फंड Axis Large Cap Fund का प्रदर्शन औसत से नीचे रहा। इससे यह बात सामने आती है कि फंड का पैसा कितना बड़ा है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि फंड मैनेजर उस पैसे को कहां और किस रणनीति के साथ निवेश कर रहा है।

बड़े AUM के बावजूद किसी फंड के लिए लंबे समय में बेहतर रिटर्न यानी Alpha पैदा करना संभव है। मिड-कैप कैटेगरी में भी फंड मैनेजर के पास निवेश के लिए कुछ लचीलापन रहता है। हालांकि, स्कीम को कम से कम 65% निवेश मिड-कैप शेयरों में रखना होता है, बाकी हिस्से को दूसरे मार्केट-कैप सेगमेंट में जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए यह मान लेना कि ₹1 लाख करोड़ का AUM पार करते ही फंड के रिटर्न की क्षमता खत्म हो जाएगी, सही नहीं होगा।

हालांकि, जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज़ के सीनियर इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट श्रीराम बीकेआर इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि फंड का साइज कुछ परिस्थितियों में जरूर महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर किसी फंड का AUM बहुत ज्यादा बढ़ जाए और जिस मार्केट सेगमेंट में उसे निवेश करना है, वहां पर्याप्त लिक्विडिटी या मार्केट डेप्थ नहीं है, तो बड़ी रकम को निवेश करना मुश्किल हो सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर फंड को कम ट्रेड होने वाले छोटे या मिड-कैप शेयरों में बहुत बड़ी रकम लगानी पड़े, तो एक साथ बड़ी खरीदारी शेयर की कीमत को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में फंड मैनेजर के लिए निवेश करना और बाद में जरूरत पड़ने पर उसे बेचकर पैसा निकालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

लेकिन जहां बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी मौजूद है और बड़ी रकम को आसानी से एबजॉर्ब किया जा सकता है, वहां बड़ा AUM अपने आप में समस्या नहीं बनता। विशेषज्ञों के अनुसार उपलब्ध आंकड़ों में भी AUM और खराब प्रदर्शन के बीच कोई सीधा संबंध दिखाई नहीं देता। जून-जुलाई 2026 तक तीन और पांच साल के प्रदर्शन के आधार पर फ्लेक्सी कैप (Flexi Cap), मल्टी कैप (Multi Cap), मिड कैप (Mid Cap) और स्मॉल कैप (Small Cap) कैटेगरी के टॉप-10 फंडों को देखें तो इनमें कई ऐसे फंड शामिल हैं, जिनकी AUM रैंकिंग भी टॉप-10 में रही है या जिनका AUM अपनी कैटेगरी के औसत से ज्यादा है।

तो फिर निवेशक को म्यूचुअल फंड चुनते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए? एक्सपर्ट के मुताबिक सबसे पहले रिस्क एडजेस्टमेंट रिटर्न्स (Risk-Adjusted Returns) यानी जोखिम को ध्यान में रखते हुए मिलने वाले रिटर्न को देखना चाहिए। इसके लिए शार्प रेशियो (Sharpe Ratio) और सॉर्टिनो रेशियो (Sortino Ratio) जैसे संकेतक उपयोगी हो सकते हैं। इसके अलावा यह देखना जरूरी है कि फंड ने अलग-अलग बाजार चक्रों में लगातार अपने बेंचमार्क (benchmark) और पियर्स (peers) की तुलना में कैसा प्रदर्शन किया है। सिर्फ एक साल का शानदार रिटर्न देखकर निवेश करना सही रणनीति नहीं मानी जाती।

इसके साथ पोर्टफोलियो क्वॉलिटी (Portfolio Quality) भी बेहद महत्वपूर्ण है। निवेशकों को देखना चाहिए कि फंड किन कंपनियों में पैसा लगा रहा है, किसी एक सेक्टर या कंपनी में कितना एक्सपोजर (exposure) है और पोर्टफोलियो में जोखिम कितना है। इंफॉर्मेशन रेशियो (Information Ratio) भी एक उपयोगी संकेतक हो सकता है, क्योंकि यह बताता है कि फंड ने बेंचमार्क (benchmark) के मुकाबले अतिरिक्त रिटर्न देने के लिए कितना अतिरिक्त जोखिम लिया। एक्टिव शेयर (Active Share) से भी यह समझने में मदद मिल सकती है कि फंड का पोर्टफोलियो बेंचमार्क (benchmark) से कितना अलग है और उसकी सक्रिय निवेश रणनीति ने रिटर्न में कितना योगदान दिया है।

इसलिए HDFC मिड कैप फंड का ₹1 लाख करोड़ AUM पार करना अपने आप में बेचने या निवेश से बचने का संकेत नहीं है। निवेशकों को केवल AUM देखकर अपना निवेश निर्णय नहीं बदलना चाहिए। इसके बजाय फंड की ऐतिहासिक कंसिस्टेंसी, बेंचमार्क को मात देने की क्षमता, बाजार गिरने पर डाउनसाइड प्रोटक्शन, पियर फंड्स के मुकाबले प्रदर्शन, पोर्टफोलियो क्वॉलिटी, जोखिम और अपनी निवेश अवधि को देखना चाहिए। खासकर मिड-कैप और स्मॉल-कैप जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले सेगमेंट में निवेश करने वालों के लिए अपनी रिस्क एपेटाइट को समझना जरूरी है। सरल शब्दों में कहें तो ₹1 लाख करोड़ का बड़ा AUM चिंता का विषय तभी बनता है, जब फंड के लिए उस बड़ी रकम को प्रभावी तरीके से निवेश करना मुश्किल हो। केवल बड़ा होना कोई कमजोरी नहीं है; असली सवाल यह है कि उस बड़े corpus को फंड मैनेजर कितनी कुशलता से संभाल रहा है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN