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PoK में बदली हवा: 1990 में भारत विरोधी नारे, आज पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा; मुजफ्फराबाद में क्या बदल गया?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर की मस्जिदों से पाकिस्तान के ‘आजादी’ और बेहतर भविष्य के वादे सुनाई देते थे। आज वही मस्जिदें लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार मुजफ्फराबाद में गूंज रही हैं, लेकिन इस बार स्थानीय इमाम पाकिस्तानी सेना के अत्याचार के खिलाफ कश्मीरियों को एकजुट होने की अपील कर रहे हैं।

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले पीओके के क्या हालात हैं, किसी को बताने की जरूरत नहीं है। आये दिन विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई से आम आवाम परेशान है। सरकार और प्रशान के खिलाफ जमकर नारेबाजी हो रही है। ठीक उसी तरह, जिस तरह 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर की सड़कों और मस्जिदों से भारत-विरोधी नारे लगते थे। पाकिस्तान के ‘आजादी’ के वादे गूंजते थे। आज वही आवाजें फिर गूंज रही हैं, लेकिन दिशा पूरी तरह उलट गई है। इस बार लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के उस पार पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में मुजफ्फराबाद और आसपास के इलाकों में स्थानीय इमाम और मौलवी कश्मीरियों से पाकिस्तानी सेना और प्रशासन के अत्याचार के खिलाफ एकजुट होने की जोरदार अपील कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) एसपी वैद ने उस काल को याद करते हुए बताया कि 1990 के दशक में इन्हीं मस्जिदों का इस्तेमाल सीमा पार से भारतीय हिस्से के लोगों को लुभाने और उकसावे के लिए किया जाता था। पाकिस्तानी सेना एलओसी के उस पार से लाउडस्पीकर के जरिए ‘अच्छे भविष्य’, ‘आजादी’ और बेहतर जीवन का वादा करती थी। सलोत्री मस्जिद से आने वाले इन संदेशों के प्रभाव में पुंछ जिले के कई नौजवान पीओके चले गए थे। वैद ने कहा कि कर्मा पलटवार कर रहा है। जिस इलाके का इस्तेमाल पाकिस्तान की सेना और उसकी जासूसी एजेंसी आईएसआई कभी आतंक और अशांति फैलाने के लिए करती थी, वहां अब खुद बगावत और गुस्सा भड़क रहा है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

दरअसल, पिछले दो महीनों में पीओके में सुरक्षा बलों और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में 100 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। सिर्फ एक सप्ताह में कम से कम 50 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। यह इलाका करीब 45 लाख आबादी वाला है और यहां चुनाव भी चल रहे हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। विरोध-प्रदर्शनों के बीच आये दिन मौत की खबर आ रही है।

मृतकों में सबसे अधिक बच्चे

दरअसल, बीबीसी को हाल ही में विरोध प्रदर्शनों के एक प्रमुख केंद्र रावलकोट का एक्सेस मिला। वहां आंदोलन के बीच मौजूद लोगों से बातचीत में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आई। मुख्य प्रदर्शन स्थल के पास एक अस्थायी क्लिनिक चलाने वाले स्थानीय डॉक्टर ने बताया कि मारे गए या गंभीर रूप से घायल ज्यादातर आम नागरिक 15-16 साल से लेकर 32-35 साल के युवा हैं। एक डॉक्टर ने बताया कि मैंने 40 साल से ऊपर के बहुत कम ही मरीज देखे हैं।

उन्होंने बताया कि उनका क्लिनिक पाकिस्तानी सेना की गोलियों से घायल लोगों को सिर्फ बुनियादी प्राथमिक उपचार दे सकता है। उन्होंने आगे कहा कि हमारे पास फर्स्ट एड के लिए पर्याप्त सामान है। हम खून बहना रोक सकते हैं, घाव साफ करके पट्टी बांध सकते हैं और ऊपरी गोलियां निकाल सकते हैं। लेकिन छाती, पेट, सिर या अन्य महत्वपूर्ण अंगों में गंभीर चोट वाले मरीजों को एडवांस्ड अस्पताल की जरूरत होती है। अगर एक साथ इतने मरीज आ जाएं तो बड़े अस्पताल भी संकट में पड़ जाएंगे।

परिवारों का दर्द और गुस्सा

क्लिनिक में अपने घायल दोस्त से मिलने आए एक युवक अली ने आंसू पोंछते हुए कहा कि हमने सिर्फ सस्ता आटा, बिजली और अपने बुनियादी अधिकार मांगे थे। इसके बजाय हमारे भाइयों को मारा जा रहा है। हमारा क्या गुनाह था? हम पर गोलियां क्यों चलाई जा रही हैं?

रावलकोट की अस्मा उस प्रदर्शन में मौजूद थीं जब उन्हें पता चला कि उनके इकलौते बेटे को गोली मार दी गई है। उन्होंने कहा कि हम सिर्फ अपना हक मांग रहे थे। हम आतंकवादी नहीं हैं। कोई भी मां इससे बेहतर बेटा नहीं मांग सकती। उन्हें पता था कि इसमें जोखिम है, लेकिन उनका मानना था कि न्याय के लिए खड़ा होना जरूरी है। वह कहते थे कि सही काम के लिए मरना सम्मान की बात है।

वहीं, सलमान ने कहा कि वह अपने छोटे भाई को खो दिया। वह परिवार में सबसे छोटा था और सभी उससे प्यार करते थे। यह हमारे लिए बहुत बड़ा नुकसान है। साथ ही मुझे गर्व है कि उसने लोगों के अधिकारों के लिए अपनी जान दे दी। वह किसी से लड़ या हमला नहीं कर रहा था।

रिटायर्ड सैनिक अयूब ने भी पुलिस कार्रवाई में अपने बेटे को खोया। उन्होंने पाकिस्तान सरकार या सेना की बजाय पीओके की स्थानीय सरकार पर उंगली उठाई और कहा कि उन्होंने ही पैरामिलिट्री फोर्स को बुलाया था। उन्होंने आगे कहा कि मैं रिटायर्ड सैनिक हूं। मैं जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ के मार्शल लॉ का समय भी देखा हूं। लेकिन जो अब हो रहा है, वैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा। मेरी राय में यह बहुत बड़ा अन्याय है। मेरे बेटे ने कुछ भी गलत नहीं किया। किसी भी प्रदर्शनकारी ने कुछ भी गलत नहीं किया।

प्रदर्शनकारियों की मांगें और सरकार का रुख

जेएएसी के प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ये प्रदर्शन उनके बुनियादी अधिकारों के लिए हैं। इसमें बिजली की बढ़ी कीमतें, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, महंगाई, आटे की कमी और दशकों से चले आ रहे सैन्य दबाव, भेदभाव तथा अत्याचार शामिल हैं। अक्टूबर में पाकिस्तान और पीओके सरकारों के साथ हुए एक समझौते को मदद के रूप में पेश किया गया था, लेकिन जेएएसी का आरोप है कि उसे लागू नहीं किया गया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इन विरोधों का सबसे ताजा और सबसे बड़ा कारण पिछले महीने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा आम लोगों की हत्या है। स्थानीय सरकार इससे सहमत नहीं है। उनका कहना है कि यह समूह, जिस पर जून में प्रतिबंध लगा था, हथियारबंद है और चल रहे चुनावों में बाधा डालने की कोशिश कर रहा है। अधिकारी प्रदर्शनकारियों को इलाके की राजधानी मुजफ्फराबाद तक मार्च करने नहीं देना चाहते।

क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

दूसरी ओर जानकारों का मानना है कि इस्लामाबाद इन प्रदर्शनों से घबराया हुआ है। सुरक्षा विश्लेषक और राजनीतिक टिप्पणीकार सेवानिवृत्त कमोडोर दलबीर सिंह सोढ़ी ने कहा कि पीओके नियंत्रण से बाहर होने के साथ पाकिस्तान अब कश्मीर घाटी में आतंक फैलाकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में कुलगाम और अनंतनाग में हुई लक्षित हत्याएं इसी रणनीति का हिस्सा बताई जा रही हैं। आज मुजफ्फराबाद और रावलकोट की मस्जिदों से गूंजने वाली आवाजें साफ संकेत दे रही हैं कि पीओके में गुस्सा अब सिर्फ महंगाई या बिजली कटौती तक सीमित नहीं रह गया है। यह दशकों पुरानी शिकायतों, सैन्य दबाव और हालिया हिंसा का नतीजा है, जिसने स्थानीय लोगों को सड़कों पर उतार दिया है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN