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अंतरिक्ष युद्ध हुआ तो अमेरिका और चीन पर रूस पड़ेगा भारी, ये है वजह

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Source :- BBC INDIA

अंतरिक्ष युग की शुरुआत से ही वहां सैन्य गतिविधियां होती रही हैं.

अमेरिका ने कहा है कि उसने पृथ्वी की कक्षा में एक अंतरिक्ष हथियार तैनात किया है.

इस घोषणा के बाद कई सवाल उठ रहे हैं. अंतरिक्ष में इस समय किस तरह के हथियार मौजूद हैं? ये हथियार अंतरिक्ष में अपना दबदबा बढ़ाने में बड़ी ताक़तों की कैसे मदद कर सकते हैं?

अभी अमेरिका ने इस हथियार के बारे में बहुत कम जानकारी दी है. अमेरिकी वायुसेना के सेक्रेट्री ट्रॉय मिंक ने कहा कि कक्षा में मौजूद यह हथियार दुश्मनों की कार्रवाई से अमेरिकी सेनाओं की रक्षा करने के लिए ज़रूरी है.

लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यह हथियार क्या कर सकता है और इसे अंतरिक्ष में कब तैनात किया गया था.

तो यह किस तरह का हथियार हो सकता है? अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियों की क्या स्थिति है? और किन दूसरे देशों के पास ऐसे हथियार हो सकते हैं?

अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियां तेज़

अंतरिक्ष युग की शुरुआत से ही वहां सैन्य गतिविधियां होती रही हैं.

1960 के दशक के आख़िरी वर्षों में सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात किए थे.

सोवियत संघ ने ‘इस्त्रेबितेल स्पुतनिकोव’ यानी आईएस कार्यक्रम चलाया था. इसका मतलब ‘उपग्रह को नष्ट करने वाला’ है.

इस कार्यक्रम के तहत ऐसे उपग्रह बनाए गए थे, जो किसी दूसरे उपग्रह की कक्षा में जाकर विस्फोट कर सकते थे. आमतौर पर उनका निशाना अमेरिकी उपग्रह (सैटेलाइट) होते थे.

विस्फोट के बाद निकलने वाले धातु के टुकड़े दूसरे उपग्रह को नुक़सान पहुंचा सकते थे.

आज आधुनिक सेनाएं कई कामों के लिए अंतरिक्ष में उपग्रह तैनात करती हैं.

इनका इस्तेमाल जासूसी करने, सुरक्षित संपर्क बनाए रखने और मिसाइल दागे जाने का पता लगाने के लिए किया जाता है.

ये उपग्रह किसी ठिकाने की सटीक जगह बताने में भी मदद करते हैं, ताकि उस पर हमला किया जा सके.

जैसे-जैसे युद्ध में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है, विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अंतरिक्ष में सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल भी बढ़ेगा.

अनुमान है कि कई तरह के हथियार अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर मलबा और तबाही पैदा कर सकते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

अमेरिका ने कौन-सा हथियार तैनात किया है?

डॉक्टर ब्लेडिन बोवेन रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट यानी आरयूएसआई में सैन्य विज्ञान विभाग के एसोसिएट फ़ेलो हैं.

वह डरहम यूनिवर्सिटी में अंतरिक्ष राजनीति के एसोसिएट प्रोफ़ेसर भी हैं.

उन्होंने कहा कि अमेरिका ने जिस हथियार की घोषणा की है, उसके बारे में वह केवल अनुमान लगा सकते हैं.

उन्होंने बीबीसी रेडियो 4 के ‘टुडे’ कार्यक्रम से कहा, “मुझे लगता है कि यह इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़ा कोई सिस्टम या रेडियो सिग्नल जाम करने वाला उपकरण हो सकता है.”

“यह ऐसा एंटी सैटेलाइट हथियार भी हो सकता है, जो उपग्रह को पूरी तरह नष्ट किए बिना उसे बेकार कर दे.”

उन्होंने बताया कि इस तरह के हथियार पहले से पृथ्वी पर मौजूद हैं. ये उपग्रहों के संपर्क और संचार को रोक सकते हैं.

बोवेन ने कहा, “अगर आप रेडियो संपर्क काट दें, तो आपका उपग्रह लगभग बेकार हो जाएगा.”

हालांकि, बोवेन ने इस संभावना से भी इनकार नहीं किया कि यह ज़्यादा ख़तरनाक और भारी नुक़सान पहुंचाने वाला हथियार हो सकता है.

ऐसा हथियार अंतरिक्ष में बहुत सारा मलबा और तबाही पैदा कर सकता है.

उन्होंने कहा, “इस बात की संभावना कम है कि यह कोई ऐसा वाहन हो, जो टक्कर मारकर दूसरे उपग्रह को नष्ट कर दे.”

“इस तरह का वाहन किसी उपग्रह से टकराने के लिए कोई चीज़ छोड़ सकता है और उसे नष्ट कर सकता है.”

“एक दूसरी संभावना यह है कि यह ऐसा उपग्रह हो, जो दूसरे उपग्रह के पास जाकर उसकी जांच कर सके और उसे पकड़ सके.”

क्या रूस और चीन के पास भी ऐसे हथियार हैं?

यह कहना मुश्किल है कि रूस और चीन जैसे अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देशों ने भी ऐसे हथियार अंतरिक्ष में तैनात कर रखे हैं या नहीं.

जूलियाना ज़ूस पहले आरयूएसआई में रिसर्च फ़ेलो रह चुकी हैं. अब वह जर्मन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफ़ेयर्स में रिसर्चर हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “चीन और रूस दोनों ने इस तरह की गतिविधियां की हैं.”

उन्होंने कहा, “रूस के मामले में हमने ऐसी गतिविधि देखी है, जो एक ही कक्षा में एंटी सैटेलाइट हथियार के परीक्षण जैसी हो सकती है.”

“इसका मतलब है कि हो सकता है कि रूस ने कक्षा में किसी हथियार या प्रोजेक्टाइल को परीक्षण के लिए छोड़ा हो.”

“इसके अलावा भी ऐसी गतिविधियां हुई हैं. लेकिन अमेरिकी हथियार के बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए इनकी आपस में तुलना करना मुश्किल है.”

अमेरिका ने अंतरिक्ष में जो हथियार तैनात किया है, वह आम हथियारों से अलग हो सकता है.

लेकिन अमेरिका, रूस और चीन के पास लंबे समय से ऐसे हथियार हैं, जिन्हें पृथ्वी से अंतरिक्ष में मौजूद निशानों की तरफ़ दागा जा सकता है.

चीन ने अमेरिका की घोषणा का विरोध किया और कहा कि अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोका जाना चाहिए.

बाद में बीबीसी से बात करते हुए बोवेन ने चीन के इस बयान की आलोचना की.

उन्होंने इसे “एक चोर का दूसरे चोर को चोर कहना” बताया.

बोवेन ने कहा, “अगर आप पहले से इस क्षेत्र के जानकार हैं, तो आपको पता होगा कि रूस और चीन की सरकारों की ये बातें कितनी खोखली हैं.”

उन्होंने कहा, “अमेरिका, रूस, चीन और भारत ने अलग-अलग तरह के उपग्रह विरोधी या अंतरिक्ष विरोधी हथियार बनाए हैं.”

“रूस और चीन ने अंतरिक्ष में ऐसी कई तकनीक इस्तेमाल की हैं, जिनका हथियार के रूप में इस्तेमाल होने की पूरी संभावना है.”

उपग्रहों का पीछा करने की तकनीक

एक्सपर्ट मानते हैं कि अंतरिक्ष हथियार बहुत अधिक मलबा भी पैदा कर सकते हैं

पिछले 10 साल में रूस और चीन अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में ‘रेंडेवू एंड प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशंस’ यानी आरपीओ कर रहे हैं.

इसमें एक उपग्रह दूसरे उपग्रह के पास जाकर उसके आसपास काम करता है.

रूस और चीन के उपग्रहों को पश्चिमी देशों के उपग्रहों के पास जाकर उनका “पीछा करते हुए” भी देखा गया है.

डॉक्टर रॉड थॉर्नटन लंदन के किंग्स कॉलेज में रूस की सुरक्षा और रक्षा मामलों के लेक्चरर हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “सैद्धांतिक रूप से आरपीओ उपग्रहों को दूसरे उपग्रहों का शिकार करके उन्हें नष्ट करने वाले उपग्रहों में बदला जा सकता है.”

“वे दूसरे उपग्रह से सीधे टकरा सकते हैं या उसे धक्का देकर उसकी कक्षा से बाहर कर सकते हैं.”

बोवेन के मुताबिक़, चीन ने “स्पेस टग” यानी अंतरिक्ष में किसी उपग्रह को खींचकर दूसरी जगह ले जाने की क्षमता भी दिखाई है.

उन्होंने कहा, “एक वाहन किसी उपग्रह के पास जा सकता है, उसे पकड़ सकता है और दूसरी कक्षा में ले जा सकता है.”

बोवेन ने कहा कि यह तकनीक फ़ायदेमंद भी हो सकती है.

इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष से मलबा हटाने और काम कर रहे उपग्रहों को हटाने के लिए किया जा सकता है.

लेकिन कुछ अंतरिक्ष हथियार बहुत अधिक मलबा भी पैदा कर सकते हैं.

किंग्स कॉलेज में अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियारों के विशेषज्ञ डॉक्टर मार्क हिलबोर्न ने बताया कि साल 2007 में चीन ने एक ऐसा मिसाइल परीक्षण किया था, जिसमें पृथ्वी से सीधे अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह को निशाना बनाया गया था.

इस तरह के परीक्षण से पैदा हुआ बहुत सारा मलबा लंबे समय तक पृथ्वी की कक्षा में घूमता रहता है.

ज़ूस ने बताया कि चीन के उस परीक्षण से निकला मलबा आज भी कक्षा में मौजूद है और अब भी ख़तरनाक है.

उन्होंने कहा, “नुक़सान पहुंचाने के लिए धातु का बहुत बड़ा टुकड़ा होना ज़रूरी नहीं है.”

“पृथ्वी की कक्षा में चीज़ें जिस तेज़ रफ़्तार से घूमती हैं, उसे देखते हुए प्लास्टिक का छोटा-सा टुकड़ा भी नुक़सान पहुंचाने के लिए काफ़ी है.”

परमाणु हथियारों का ख़तरा

रूस के पास अंतरिक्ष हथियार और उपग्रह कम हैं, लेकिन उसकी मिसाइल क्षमता इस कमी को पूरा करती है.

थॉर्नटन का कहना है कि रूस के पास अंतरिक्ष हथियार और उपग्रह कम हैं, लेकिन उसकी मिसाइल क्षमता इस कमी को पूरा करती है.

उन्होंने कहा, “रूस के पास ज़मीन से दागी जाने वाली ऐसी मिसाइलें हैं, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद उपग्रहों को निशाना बना सकती हैं.”

“रूस के पास एएसएटी यानी उपग्रह विरोधी मिसाइलें भी हैं, जिन्हें विमान से बहुत अधिक ऊंचाई पर ले जाकर दागा जा सकता है.”

उन्होंने कहा, “रूस का मानना है कि उसके उपग्रहों के मुक़ाबले नेटो के पास अधिक संख्या में और बेहतर उपग्रह हैं.”

“इसी वजह से रूस ने युद्ध के मैदान में कुछ हद तक बराबरी लाने के लिए उपग्रह विरोधी हथियारों पर बहुत पैसा लगाया है.”

थॉर्नटन ने एक और चिंता जताई.

उन्होंने कहा, “आख़िरी विकल्प के तौर पर रूस अंतरिक्ष में परमाणु हथियार भी दाग सकता है.”

“इसके बाद होने वाला ईएमपी यानी परमाणु विद्युत चुंबकीय विस्फोट एक बड़े इलाक़े में उन उपग्रहों को जला सकता है, जिन्हें इससे बचाने के इंतज़ाम नहीं किए गए हैं.”

तो अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों का टकराव होने की कितनी आशंका है?

ऐसा शायद तभी होगा, जब पृथ्वी पर भी युद्ध चल रहा हो.

बोवेन ने कहा, “अंतरिक्ष में जो कुछ होगा, वह अपने आप में अलग घटना नहीं होगी.”

उन्होंने कहा, “हो सकता है कुछ भी न हो. यह भी हो सकता है कि कुछ हो जाए.”

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SOURCE : BBC NEWS