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अभिजीत दीपके को हिरासत के बाद रिहा किया गया, सीजेपी ने क्या बताया

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Source :- BBC INDIA

अभिजीत दीपके

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके को शनिवार को रिहा कर दिया गया. इसकी जानकारी सीजेपी की लीगल सेल की हेड रत्ना सिंह ने बताया.

बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित के मुताबिक़, सीजेपी ने कहा कि रिहाई के बाद अभिजीत दीपके वहां से चले गए.

दीपके ने शुक्रवार शाम को ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया था लेकिन उन्हें मार्च से पहले ही प्रिवेंटिव डिटेंशन में ले लिया गया था.

बार एंड बेंच के मुताबिक़, एसईएम कोर्ट ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है. कोर्ट ने कुछ शर्तें भी लगाई हैं लेकिन विस्तृत जानकारी का इंतज़ार है.

लाइव लॉ के अनुसार, दीपके को बॉन्ड की शर्तें माननी होंगी. इनमें से एक शर्त ये भी है कि उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखनी होगी.

शनिवार शाम को ही वापमंथी छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में ले लिया गया था लेकिन उन्हें शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया.

सीजेपी के दो दूसरे प्रमुख चेहरे सौरव दास और आशुतोष रांका पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं. उन्हें जंतर-मंतर में बिना अनुमति दाख़िल होने के मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.

शनिवार को क्या हुआ

मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन

इससे पहले मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर शनिवार को वकीलों और सुरक्षा बलों के बीच बहस से तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी.

रत्ना सिंह ने सुनवाई में देरी पर सवाल उठाते हुए एक्स पर लिखा, “सुनवाई दोपहर 12 बजे होनी थी. लेकिन शाम 3.38 बजे तक इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे. अगर यह जानबूझकर नहीं है तो क्या है.”

मौके पर मौजूद बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने बताया था कि हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने या उनकी पैरवी करने की अनुमति वकीलों को नहीं देने की वजह से पुलिस स्टेशन के बाहर तनाव का माहौल पैदा हो गया.

उन्होंने बताया कि मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत है और यहां गेट पर कुछ समय के लिए हंगामा हुआ.

आंदोलन के प्रमुख युवा चेहरों के पुलिस कार्रवाई के दायरे में आने के बावजूद शुक्रवार को कनॉट प्लेस और उसके आसपास सैकड़ों लोग जमा हुए. इनमें से कई लोगों के हाथों में तिरंगा था. इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया.

अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन को सीजेपी 2.0 कहा था, लेकिन पुलिस की सख़्त कार्रवाई से सवाल उठने लगा है कि इस आंदोलन का अब आगे क्या होगा.

सरकार के सामने चुनौती

अभिजीत की हिरासत के बाद आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि सरकार को इस तरह के आंदोलन को बहुत ध्यान से देखना चाहिए.

की कार्रवाई से आंदोलन को और दिशा मिल सकती है.

वह कहते हैं, “जब भी किसी राजनीतिक आंदोलन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होती है, तो उसमें और उभार आता है. “

“कॉकरोच जनता पार्टी का उदय अलग तरीक़े से हुआ है. उसने पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए और उसके प्रदर्शन में हर वर्ग के लोग, ख़ासकर युवा शामिल हुए.”

रशीद किदवई कहते हैं, “साल 2014 से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जो भी राजनीतिक विरोध सामने आया, सरकार ने उसे नक्सलियों, विदेशी ताक़तों या देश विरोधी गतिविधियों से जोड़कर उसका असर कम करने की कोशिश की.”

“लेकिन जुलाई से अब तक सरकार इस आंदोलन को किसी ख़ास खांचे में फिट नहीं कर पाई है. पहली बार सरकार इस विरोध को क़ाबू करने में विफल रही है. हालांकि, यहां मामला युवाओं का है, इसलिए सरकार कोई मौक़ा नहीं देना चाहती.”

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई.

विश्लेषकों मानना है कि अधिक सख़्ती से सरकार के लिए आंदोलन को रोकना मुश्किल हो सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, “जब इस तरह के विरोध होते हैं या सरकार इतनी ज़्यादा सख़्ती करती है, तो उसके लिए मुश्किल बढ़ जाती है. अब शायद सरकार इसे आसानी से नहीं दबा सकेगी.”

“भले ही यह राजनीतिक मुद्दा हो, मगर यह छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन है.”

पड़ोसी देशों में हुए प्रदर्शनों से इसकी तुलना किए जाने पर लव कुमार मिश्रा कहते हैं, “भले ही इन प्रदर्शनों की तुलना बांग्लादेश से हो रही है, लेकिन वहां की सरकारें बहुत नाज़ुक मोड़ पर थीं. भारत के हालात अलग हैं. भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार काफ़ी मज़बूत है.”

आपको बता दें कि बांग्लादेश में जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों की कोटा व्यवस्था के ख़िलाफ़ छात्रों का प्रदर्शन शुरू हुआ था.

बाद में यह शेख़ हसीना सरकार के ख़िलाफ़ बड़े आंदोलन में बदल गया और पांच अगस्त 2024 को हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ कर देश से बाहर शरण लेनी पड़ी.

इसी तरह नेपाल में सितंबर 2025 में भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर पाबंदी के ख़िलाफ़ युवाओं का ‘जेन ज़ी’ आंदोलन भड़का. हिंसक प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया और पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी.

प्रदर्शनकारी

बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम ‘दिनभर’ में शामिल वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनीषा प्रियम ने कहा, “ये युवा हैं और झंडा ही तो फहरा रहे हैं. इसमें क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? इन युवाओं की लड़ाई बिल्कुल भी राजनीतिक नहीं थी. इन्होंने नीट और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए थे.”

वह कहती हैं, “ये बच्चे कोई क़ानून नहीं तोड़ रहे हैं. पुलिस उन्हें किस तरह पीट रही है, यह सबके सामने है. पुलिस बच्चों की पिटाई कर रही है और अगर वे ज़रा-सा कुछ कहते हैं, तो उसे अवमानना बताया जा रहा है.”

उन्होने कहा, “किसी भी सरकार को युवाओं की इस भावना को नहीं छेड़ना चाहिए. इसके बजाय सरकार को उन सवालों के जवाब देने चाहिए, जो ये युवा पूछ रहे हैं.”

अभिजीत दीपके को हिरासत में क्यों लिया गया?

नेहा बोरा और अभिजीत दीपके

सीजेपी ने शुक्रवार शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम बुलाया था.

शुक्रवार सुबह दिल्ली पुलिस की एक टीम उस घर पर पहुंची, जहां अभिजीत दीपके ठहरे हुए थे.

पुलिस ने उन्हें नोटिस देकर मार्च में शामिल नहीं होने को कहा. नोटिस के मुताबिक़, अभिजीत ने कनॉट प्लेस में लोगों से जमा होने की अपील की थी, लेकिन इसके लिए क़ानूनी अनुमति नहीं ली गई थी.

बाद में शाम क़रीब चार बजकर 50 मिनट पर अभिजीत घर से बाहर निकले. उन्हें रोकने के लिए वहां मौजूद पुलिसकर्मी आगे बढ़े.

हालांकि, सीजेपी ने बाद में दावा किया कि उसे अभिजीत के ठिकाने की जानकारी नहीं दी जा रही और उन्हें वकीलों से बात करने की अनुमति भी नहीं दी गई.

सौरव और आशुतोष पहले से न्यायिक हिरासत में

सौरव दास और आशुतोष रांका

इससे पहले 13 अक्तूबर को सीजेपी के 14 कार्यकर्ता जंतर-मंतर पहुंचे थे. इनमें सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे भी शामिल थे.

पुलिस का आरोप है कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने और वहां भारी बैरिकेडिंग के बावजूद ये लोग एक निजी परिसर के रास्ते अंदर पहुंचे.

पुलिस के मुताबिक़, इन लोगों ने एक बंद लोहे के गेट को पार किया, जंतर-मंतर पहुंचे, तिरंगा फहराया और नारे लगाए.

पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की और उनके काम में बाधा डाली.

इस मामले में कनॉट प्लेस और संसद मार्ग पुलिस स्टेशनों में दो अलग मामले दर्ज किए गए.

पुलिस ने कहा कि सौरव और आशुतोष ने बार-बार क़ानून का उल्लंघन किया और सोशल मीडिया के ज़रिए दूसरे लोगों को भी ऐसी गतिविधियों के लिए उकसाने की कोशिश की.

दोनों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

सीजेपी का कहना है कि उसके नेता केवल तिरंगा फहराने और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने के लिए वहां गए थे.

सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे को पांच हज़ार रुपये के बॉन्ड पर छोड़ दिया गया. इसके साथ यह शर्त लगाई गई कि वह एक साल तक ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे, जिससे शांति भंग हो.

इससे पहले विमान से हिरासत में लिए गए थे तीनों नेता

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SOURCE : BBC NEWS