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अमेरिका ने ईरान पर लगाए ‘अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध’, भारत पर ये असर

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Source :- BBC INDIA

तेहरान के एक बाज़ार में शॉपिंग करते लोग

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डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए एक नया अभियान शुरू किया है. अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘अभूतपूर्व’ बताया है.

उन्होंने कहा कि इसका मक़सद विदेशों में ईरान के ‘आर्थिक रास्ते बंद करना’ है.

इस मिशन के तहत अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध और कड़े कर दिए हैं. दर्जनों लोगों, कंपनियों और जहाज़ों के नाम प्रतिबंधों की सूची में जोड़े गए हैं.

अमेरिका ने कहा है कि वह उन विदेशी बैंकों, कंपनियों और बिचौलियों पर दबाव बढ़ाएगा, जो ईरान के साथ अब भी काम कर रहे हैं. इसमें कुछ ऐसी गतिविधियां रोकने के लिए डेडलाइन तय करना भी शामिल है, जिन्हें अमेरिका ईरान के व्यापार और कमाई में मददगार मानता है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ अमेरिका की ईरान पर प्रस्तावित इन नई पाबंदियों से ईरान को भारत के चावल, चाय और दवाओं के निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है. भारतीय निर्यातकों ने सोमवार को यह आशंका जताई. हाल के वर्षों में इन सामानों का बड़ा हिस्सा दुबई के बंदरगाह के रास्ते ईरान पहुंचता रहा है.

अमेरिका इस अभियान को “ऑपरेशन इकोनॉमिक आइसोलेशन” (आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की नीति) कह रहा है. अमेरिका के मुताबिक़ वो ऐसे सभी देशों को अलग-थलग कर देगा जो ईरान के साथ किसी भी तरह का व्यापार करते हैं.

यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब दोनों देशों के बीच का युद्धविराम बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है. ईरान की अर्थव्यवस्था को कई महीनों के सैन्य संघर्ष से भारी नुक़सान हुआ है. तेल निर्यात और विदेशी व्यापार में रुकावट आई है. महंगाई बहुत बढ़ गई है. राष्ट्रीय मुद्रा की क़ीमत भी गिरी है.

अपने भाषण में अमेरिका के वित्त मंत्री ने साफ़ तौर पर इस अभियान को ईरान पर सैन्य दबाव का हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि अमेरिकी सशस्त्र बलों ने “नींव तैयार कर दी है”.

शिपिंग, सोने के कारोबार और ईरानी विमानन जैसे क्षेत्रों पर अमेरिका कई सालों से अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगा रहा है. अब जो बदलाव हुआ है, उसमें नए क्षेत्रों को शामिल करने के अलावा, पहले से लागू प्रतिबंधों को और सख़्त किया जा रहा है.

इसके अलावा, ईरान के साथ विदेशों में काम करने वाले लोगों या संस्थाओं के ख़िलाफ़ और सख़्ती का एलान किया गया है.

घोषित प्रतिबंध क्या हैं?

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट मे ईरान पर नए प्रतिबंधों का एलान किया

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सबसे बड़ा बदलाव पांच क्षेत्रों से जुड़ा है: डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, विमानन और शिपिंग.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय के फॉरेन एसेट कंट्रोल ऑफ़िस (विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय) ने इन पांच क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर ईरानी अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों की सूची में शामिल किया है, जिन पर 2023 के कार्यकारी आदेश के तहत प्रतिबंध लागू हो सकते हैं.

यह आदेश डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान जनवरी 2020 में जारी किया था. शुरुआत में इसमें ईरान के निर्माण, खनन, मैन्युफैक्चरिंग और टेक्सटाइल क्षेत्र शामिल थे. इसमें वित्त मंत्रालय को बाद में दूसरे क्षेत्रों को भी जोड़ने की अनुमति दी गई थी.

उसी साल वित्तीय क्षेत्र को भी इसमें शामिल किया गया था. 2024 में तेल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र जोड़े गए.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय का कहना है कि पांच और क्षेत्रों को जोड़ने से ईरान से जुड़ी उन गतिविधियों का दायरा बढ़ गया है, जिन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

मंत्रालय के मुताबिक, विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय इन क्षेत्रों में ईरानी अर्थव्यवस्था से जुड़ी गतिविधियों के लिए किसी भी व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है. चाहे वो किसी भी देश में रहता हो.

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अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस फ़ैसले से इन क्षेत्रों में काम करने वाली वो विदेशी संस्थाएं जो ईरान के साथ किसी भी तरह कारोबार करती हैं, अमेरिका के निशाने पर आ जाएंगी.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय का कहना है कि ईरान पैसे भेजने और प्रतिबंधों से बचने के लिए डिजिटल एसेट्स का इस्तेमाल करता है. वह अपने हथियार कार्यक्रमों के लिए उन्नत टेक्नोलॉजी हासिल करने की कोशिश करता है. ईरानी रियाल की क़ीमत गिरने से अपनी संपत्ति बचाने के लिए सोने का सहारा लेता है. विमानन और शिपिंग नेटवर्क का इस्तेमाल उपकरण, पैसा और तेल का निर्यात करने के लिए करता है.

अमेरिका ने अपने इस अभियान के तहत क़रीब 60 लोगों, कंपनियों और जहाज़ों पर भी प्रतिबंध लगाए हैं. अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (ओएफ़एसी) के मुताबिक, इनमें से कुछ ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों के लिए उपकरण मुहैया कराने में शामिल थे. कुछ साइबर ऑपरेशन में शामिल थे. जबकि दूसरे तेल के निर्यात और उससे होने वाली कमाई को ट्रांसफ़र करने में शामिल थे.

अमेरिका के निशाने पर आए ये लोग और संस्थाएं अलग-अलग देशों से हैं. सब पर प्रतिबंध लगाने का आधार भी अलग-अलग है.

पहले दी गई कुछ छूटों पर लगाई रोक

नए प्रतिबंधों के असर ईरान के स्टूडेंट्स पर भी पड़ेगा

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नए पैकेज में एक और बड़ा बदलाव उन कई गतिविधियों पर रोक है, जो ईरान पर व्यापक प्रतिबंधों के बावजूद पहले ओएफ़एसी के जनरल लाइसेंस के तहत संभव थीं.

पहले दूसरे देशों में पढ़ने के लिए ईरानी छात्र, छात्राओं को कई तरह की छूटें मिली थीं. अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ ईरानी यूनिवर्सिटीज़ के साथ अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट कोर्स के लिए स्टूडेंट एक्सचेंज के समझौते कर सकती थीं. इसमें ईरानी यूनिवर्सिटी छात्रों को अमेरिका में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप देना भी शामिल था.

कुछ एडमिशन और ट्यूशन से जुड़ी सेवाओं, कुछ ऑनलाइन कोर्स, कुछ नॉन-कमर्शियल एजुकेशनल और रिसर्च गतिविधियों के साथ कुछ एकेडमिक और प्रोफ़ेशनल परीक्षाएं आयोजित करने की भी कुछ शर्तों के तहत अनुमति थी.

लेकिन इस लाइसेंस के निलंबन के बाद अब इन गतिविधियों को इस जनरल लाइसेंस का लाभ नहीं मिलेगा. अमेरिका ने कहा है कि अब इनमें से जुड़ी किसी भी गतिविधि के लिए अलग से आवेदन करना होगा.

खेल के क्षेत्र में भी 2013 से लागू एक लाइसेंस को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया गया है. इसके तहत ईरान और अमेरिका के बीच प्रोफ़ेशनल और एमेच्योर स्पोर्टिंग इवेंट और एक्सचेंज प्रोग्राम की अनुमति थी. इसमें टूर्नामेंट्स और एग्ज़ीबिशन, खिलाड़ियों की स्पॉन्सरशिप, कोचिंग, रेफ़रिंग और स्पोर्ट्स एजुकेशन शामिल थी.

इन देशों पर पड़ेगा असर

चीन, ईरानी तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार रहा है और नई पाबंदियों का उस पर भी बड़ा असर पड़ सकता है

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अमेरिका के ईरान पर लगाए गए इन नए प्रतिबंधों का असर भारत पर भी पड़ सकता है.

रॉयटर्स के मुताबिक़ भारत ईरान के पांच सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में रहा है. हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार 2018-19 के 17 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर से 90 फ़ीसदी से अधिक गिर चुका है. अब भारत से ईरान को ज़्यादातर उन्हीं सामानों का निर्यात होता है, जिन्हें मानवीय आधार पर अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट मिली हुई है.

भारतीय निर्यातकों को डर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इन नए प्रतिबंधों से भारत और ईरान के कमज़ोर हो चुके व्यापार पर और बुरा असर होगा.

यूएई ने पिछले हफ़्ते अगले आदेश तक ईरान के साथ सभी व्यापारिक गतिविधियां, एक्सचेंज और वित्तीय लेन-देन रोक दिए थे.

हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के बयानों से पता चलता है कि इस इकोनॉमिक प्रेशर के फ़ोकस में चीन है. हाल के सालों में चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार रहा है. अमेरिका ने इन नए प्रतिबंधों के ज़रिए ईरान और चीन के कारोबार को रोकने या कम करने की कोशिश की है.

रॉयटर्स के मुताबिक, ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 फ़ीसदी से ज़्यादा चीन जाता है. इसका एक बड़ा हिस्सा छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियां ख़रीदती हैं. ख़ास तौर पर शानदोंग प्रांत की रिफाइनरियां. अमेरिका के प्रतिबंध दोबारा लागू होने के बाद चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों ने सीधे ईरानी तेल ख़रीदना काफ़ी हद तक बंद कर दिया है. लेकिन स्वतंत्र रिफाइनरियां सस्ता ईरानी तेल ख़रीदती रही हैं.

नए प्रतिबंधों के पैकेज से पहले भी इस कारोबार पर दबाव था. अमेरिका ने कई बार उन शिपिंग कंपनियों, रिफाइनरियों और बिचौलियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिनके बारे में वॉशिंगटन का कहना है कि वे चीन को ईरानी तेल बेचने में शामिल रहे हैं.

ऊर्जा विश्लेषण कंपनी केप्लर के अनुमान के मुताबिक, अगस्त में चीन को ईरान का तेल निर्यात क़रीब 5 लाख 34 हज़ार बैरल प्रतिदिन रहा. जुलाई में यह क़रीब 8 लाख 23 हज़ार बैरल था. इस साल की शुरुआत में एक समय यह क़रीब 15 लाख 80 हज़ार बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था.

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चीन के साथ संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भी ईरान के विदेशी व्यापार नेटवर्क का अहम हिस्सा रहा है. दोनों देशों के बीच कारोबार की मात्रा ही इसकी अहमियत की वजह नहीं है. दुबई कई सालों से ईरान को सामान दोबारा निर्यात करने, पैसे ट्रांसफ़र करने और ईरानी कंपनियों और कारोबारियों की गतिविधियों के लिए प्रमुख रास्तों में से एक रहा है.

हालांकि, अब इस रास्ते में भी रुकावट है. 18 अगस्त को अमीरात ने ईरान के साथ सभी व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन रोक दिए थे. उसने ईरान पर अपने इलाक़े की ओर मिसाइल दागने का आरोप लगाया था.

इराक़ भी कई वर्षों से ईरान के सबसे अहम क्षेत्रीय बाज़ारों में से एक रहा है. ख़ास तौर पर गैस, बिजली और ग़ैर-तेल सामान के लिए. अमेरिकी दबाव बढ़ने पर बैंक, शिपिंग कंपनियां और तीसरे देशों के बिचौलिये निशाने पर आ सकते हैं. इससे चीन के अलावा ईरान के क्षेत्रीय व्यापार के रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं.

अमेरिकी वित्त मंत्री ने नए प्रतिबंधों के पैकेज का ऐलान करते समय यह भी कहा कि वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और अमेरिकी सेना की टीमें दूसरी सरकारों के संपर्क में हैं. उन्होंने कहा कि हर देश को वॉशिंगटन की ओर से बताई गई गतिविधियों को बंद करने के लिए एक डेडलाइन दी जाएगी.

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ये गतिविधियां जारी रहीं, तो ईरान के लिए “पैसा छिपाने” में मदद करने वाली संस्थाएं अमेरिका के निशाने पर आ जाएंगी.

ईरान में घरेलू हालात भी बहुत मुश्किल हो गए हैं. यह आंकड़ों और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी कई रिपोर्टों, दोनों से पता चलता है. ख़ुद ईरानी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, इस साल जुलाई में सालाना महंगाई दर 66 फ़ीसदी पहुंच गई. खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमतें पिछले साल जुलाई के मुक़ाबले क़रीब 128 फ़ीसदी बढ़ गईं.

इसी समय, परिवारों की परचेज़िंग पावर (क्रय शक्ति) में गिरावट और औद्योगिक और कारोबारी गतिविधियों में रुकावट ने ईरानी अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है. उन्हें इस स्थिति के जारी रहने के सामाजिक असर की चिंता है.

तेल निर्यात में गिरावट ने ईरान की विदेशी मुद्रा कमाई के सबसे अहम स्रोतों में से एक को सीमित कर दिया है. वहीं, शिपिंग में रुकावट, समुद्री पाबंदियों और बिचौलियों के नेटवर्क पर दबाव ने ईरानी तेल को बेचने और उसकी ढुलाई को और मुश्किल बना दिया है.

SOURCE : BBC NEWS