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इलेक्ट्रिक कारों में बैठते ही कुछ लोगों की तबीयत क्यों बिगड़ने लगती है

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Source :- BBC INDIA

सांकेतिक तस्वीर

लोला बेयर्ड ने अपने बॉयफ्रेंड से कार सड़क किनारे रोकने को कहा. सफर शुरू हुए करीब 40 मिनट ही हुए थे और उन्हें मितली इतनी ज़्यादा महसूस हो रही थी कि वह खुद को उल्टी करने से रोक नहीं पाईं.

नॉर्थ लंदन की रहने वाली 24 वर्षीय लोला को इससे पहले कभी मोशन सिकनेस यानी सफर के दौरान जी मिचलाने की समस्या नहीं हुई थी. लेकिन करीब दो साल पहले उनके बॉयफ्रेंड ने इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) खरीदा.

तब से जब भी वह उन्हें लंबी कार यात्रा पर लेकर जाते हैं, लोला को “बहुत ज़्यादा मितली” महसूस होती है.

समस्या इतनी बढ़ गई कि उन्होंने अपने बॉयफ्रेंड से कार बदलने तक के लिए कह दिया.

लोला अकेली नहीं हैं. बीबीसी न्यूज़ से कुछ अन्य लोगों ने भी बताया कि उन्हें या उनके बच्चों को इलेक्ट्रिक कार में यात्री के तौर पर बैठने पर ज़्यादा कार सिकनेस महसूस होती है. हालांकि, दूसरी तरफ कई ईवी ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें ऐसी कोई परेशानी नहीं होती.

तो मोशन सिकनेस की इन शिकायतों की वजह क्या हो सकती है?

किंग्स कॉलेज लंदन में एनाटॉमी और बायोमैकेनिक्स की सीनियर लेक्चरर डॉ. आइरीन डी गिउलियो मोशन सिकनेस पर भी रिसर्च करती हैं.

उनका कहना है कि अब तक हुई रिसर्च से संकेत मिलता है कि कुछ लोगों को पेट्रोल या डीज़ल वाली कारों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों में ज़्यादा मोशन सिकनेस हो सकती है.

शिकागो के नॉर्थवेस्टर्न मेडिसिन के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. निकोलस हेक ने भी अपने कुछ मरीजों से ऐसी शिकायतें सुनी हैं.

वह चक्कर और वर्टिगो से जुड़ी समस्याओं के विशेषज्ञ हैं.

उनका कहना है, “उन्हें लगता है कि इलेक्ट्रिक वाहनों में उन्हें मोशन सिकनेस होने की संभावना ज़्यादा है या वे इसके प्रति ज़्यादा संवेदनशील हैं.”

वह आगे कहते हैं, “मैंने इसके बारे में कई, कई बार सुना है.”

उनके मुताबिक, हर महीने करीब दो मरीज खास तौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों में सफर के दौरान मोशन सिकनेस होने की बात बताते हैं.

लोला बेयर्ड

हालांकि, इलेक्ट्रिक वाहनों और मोशन सिकनेस के बीच किसी संभावित जुड़ाव पर रिसर्च अभी शुरुआती दौर में है.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है, जिसके आधार पर निश्चित तौर पर कुछ कहा जा सके.

पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी में मोशन सिकनेस पर रिसर्च कर चुके डॉ. बिल येट्स कहते हैं कि इस विषय पर अब तक हुई रिसर्च “अभी काफी सीमित और अस्पष्ट” है.

वह कहते हैं, “कुछ लोगों के अनुभवों पर आधारित जानकारी ज़रूर है, लेकिन अभी तक इस पर पर्याप्त संख्या में गंभीर और व्यापक अध्ययन नहीं हुए हैं.”

‘चलाने में मजा आता है, लेकिन मेरी बेटी की तबीयत खराब हो जाती है’

जब मार्क क्विग पिछले साल नई कार खरीदने के विकल्प तलाश रहे थे, तो कम चलने वाले खर्च की वजह से इलेक्ट्रिक वाहन उन्हें सबसे बेहतर विकल्प लगा.

लिंकनशायर के रहने वाले 45 वर्षीय मार्क कहते हैं कि उनकी नई इलेक्ट्रिक कार चलाने में “बहुत शानदार” है. लेकिन उन्होंने जल्द ही महसूस किया कि उनकी नौ साल की बेटी को इसमें सफर करने पर मोशन सिकनेस की समस्या काफी बढ़ गई है.

पहले उनकी बेटी को सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में फ्रांस की करीब 600 मील लंबी यात्रा के दौरान ही मोशन सिकनेस होती थी. लेकिन अब मार्क के मुताबिक, पास के शहर तक सिर्फ 30 मिनट की यात्रा में भी उनकी बेटी की तबीयत खराब हो जाती है.

हाल ही की एक यात्रा के दौरान उनकी बेटी ने उल्टी भी कर दी.

मार्क कहते हैं कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

मार्क क्विग

मोशन सिकनेस यानी सफर के दौरान जी मिचलाने की समस्या ईवी में सफर करने वाले सभी को नहीं होती.

कई इलेक्ट्रिक कार मालिकों ने बीबीसी न्यूज़ से संपर्क कर बताया कि उन्हें या उनके परिवार के लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों में सफर करने पर ऐसी कोई परेशानी नहीं होती. कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि पारंपरिक पेट्रोल-डीज़ल वाली कारों की तुलना में ईवी में उन्हें कम मोशन सिकनेस होती है.

इलेक्ट्रिक वाहन चालकों के संगठन ईवीए इंग्लैंड की सीईओ विकी एडमंड्स का कहना है कि उनके सदस्यों के बीच मोशन सिकनेस कोई चिंता का विषय नहीं है.

वह कहती हैं, “यह मुद्दा कभी सामने ही नहीं आया.”

हालांकि, चीन की इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी एक्सपेंग, जिसके ब्रिटेन में कई शोरूम हैं, इस समस्या पर पहले सार्वजनिक रूप से बात कर चुकी है. इलेक्ट्रिक वाहनों और मोशन सिकनेस के बीच संबंध महसूस करने वाले लोगों से कंपनी ने कहा है कि “यह एक जायज़ सवाल है और यह सिर्फ आपका वहम नहीं है.”

कंपनी के मुताबिक, यह समस्या “इलेक्ट्रिक कारों को जिस तरह डिजाइन और इंजीनियर किया जाता है, उसके कुछ साइड इफेक्ट्स” की वजह से हो सकती है.

इसकी वजह क्या हो सकती है?

हैक के मुताबिक, मोशन सिकनेस की वजह “हमारी इंद्रियों से मिलने वाले संकेतों में तालमेल न होना” है.

वह बताते हैं कि हमारे शरीर में यह समझने के लिए तीन मुख्य सेंसर होते हैं कि हम चल रहे हैं या नहीं. इनमें हमारी आंखों से मिलने वाली जानकारी, अंदरूनी कान का बैलेंस सिस्टम और शरीर के अंदर मौजूद ऐसे फाइबर्स शामिल हैं, जो शरीर की हरकत को महसूस करते हैं.

जब इनमें से किसी एक से मिलने वाला संकेत बाकी संकेतों से मेल नहीं खाता, तो मोशन सिकनेस हो सकती है.

उदाहरण के लिए, अगर आप कार में बैठे-बैठे फोन देख रहे हैं और खिड़की के बाहर हो रही हलचल दिखाई नहीं दे रही है, तो शरीर को मिलने वाले संकेतों में तालमेल बिगड़ सकता है और जी मिचलाने की समस्या हो सकती है.

रिसर्च में कुछ ऐसी वजहों की भी पहचान हुई है, जिनकी वजह से इलेक्ट्रिक वाहनों में यह समस्या ज़्यादा गंभीर हो सकती है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि इंसान गाड़ियों में आवाज़ को उनकी गति से जोड़ने के आदी हो चुके हैं.

डॉ. डी गिउलियो के मुताबिक, इलेक्ट्रिक वाहनों में इंजन की वह आवाज़ और कंपन नहीं होता, जिससे हमें आमतौर पर पता चलता है कि कार कब तेज हो रही है. इसकी वजह से मोशन सिकनेस हो सकती है.

एक और वजह रीजेनरेटिव ब्रेकिंग हो सकती है. इसमें ड्राइवर जैसे ही एक्सेलरेटर से पैर हटाता है, मोटर जनरेटर की तरह काम करने लगती है. इससे प्रतिरोध पैदा होता है, कार की रफ्तार कम होती है और साथ ही बिजली बनती है, जिसे बैटरी में स्टोर किया जा सकता है. एक्सेलरेटर से पैर धीरे-धीरे हटाना ज़रूरी होता है, वरना कार अचानक तेज़ गति से धीमी हो सकती है.

हैक कहते हैं, “इससे व्यक्ति को कुछ पल के लिए ऐसा महसूस हो सकता है जैसे कार की रफ्तार अचानक बदलने पर उसका शरीर आगे-पीछे हिल रहा हो.”

कैलिफोर्निया की 24 वर्षीय कैरोलिन ले ने भी ऐसा ही अनुभव किया है.

वह बताती हैं कि व्यस्त शहरों में जब उनका दोस्त इलेक्ट्रिक कार चलाता है, तो उन्हें “बहुत ज़्यादा” मोशन सिकनेस होती है.

उनके मुताबिक, रीजेनरेटिव ब्रेकिंग की वजह से “ऐसा लगातार महसूस होता है जैसे कार बार-बार रुक रही हो.”

कैरोलिन ले

इलेक्ट्रिक वाहन पारंपरिक पेट्रोल-डीज़ल वाली कारों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से एक्सेलरेट और डीसेलरेट कर सकते हैं. डॉ. डी गिउलियो के मुताबिक, इसकी वजह से मोशन सिकनेस हो सकती है.

हालांकि, ईवीए इंग्लैंड की विकी एडमंड्स का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के डिज़ाइन में हुए बदलावों से अब उनकी रफ़्तार बढ़ने की प्रक्रिया को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे कार अचानक उतनी तेज़ी से स्पीड नहीं पकड़ती.

वह आगे कहती हैं कि संगठन का मानना है कि ईवी में मोशन सिकनेस की वजह कार खुद नहीं, बल्कि ड्राइवर का ड्राइविंग स्टाइल जैसे “दूसरे कारण” हो सकते हैं.

सोसाइटी ऑफ मोटर मैन्युफैक्चरर्स के प्रमुख माइक हॉस के मुताबिक, इलेक्ट्रिक कारों के कुछ फीचर्स शुरुआत में ड्राइवरों को अलग या थोड़े अनजान लग सकते हैं.

वह कहते हैं कि ईवी एक अलग तरह का ड्राइविंग अनुभव देते हैं.

“हालांकि, ड्राइवर आमतौर पर इन खूबियों के साथ जल्दी तालमेल बिठा लेते हैं और कई मॉडल में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग को अपनी पसंद के हिसाब से एडजस्ट करने का विकल्प भी होता है.”

कुछ लोगों को वैसे भी मोशन सिकनेस होने की संभावना ज़्यादा होती है.

हैक के मुताबिक, इसमें जेनेटिक्स का सबसे बड़ा असर होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाएं और बच्चे मोशन सिकनेस के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.

वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी, रॉयल नेवी और रॉयल एयर फोर्स में इस विषय पर रिसर्च कर चुके प्रोफेसर जॉन गोल्डिंग के मुताबिक, मोशन सिकनेस आमतौर पर 8 से 10 साल की उम्र के बीच सबसे ज़्यादा होती है. इसके बाद लगातार सफर करने और इसकी आदत पड़ने के साथ यह समस्या कम होती जाती है.

सिर को स्थिर रखें और खिड़की खोल लें

सफेद शर्ट पहने एक महिला कार की पिछली सीट पर बैठी है. वह सीट बेल्ट लगाए खिड़की से बाहर देख रही है और उसके चेहरे पर परेशानी साफ नजर आ रही है.

जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों की लोकप्रियता बढ़ रही है, उनसे बचना मुश्किल होता जा रहा है. ब्रिटेन के डिपार्टमेंट फॉर ट्रांसपोर्ट के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जून 2026 के बीच रजिस्टर की गई नई ज़ीरो-एमिशन कारों की संख्या 2025 की इसी अवधि के मुक़ाबले 40.5 फ़ीसदी बढ़ी.

आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 के अंत तक ब्रिटेन की सड़कों पर चलने वाली कुल लाइसेंस प्राप्त कारों में 5.8 फ़ीसदी ज़ीरो-एमिशन वाहन थे. 2030 से नई पेट्रोल या डीज़ल कारों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाना है.

लंदन की 24 वर्षीय लुसिंडा हैरिसन बताती हैं कि वह अक्सर टैक्सी बुक करती हैं, लेकिन कई बार पता चलता है कि वह इलेक्ट्रिक वाहन है. ऐसे में उन्हें पूरे सफर के दौरान मितली, पसीना और बेचैनी महसूस होती रहती है.

वह कहती हैं कि ईवी में सफर करने का ख्याल ही उन्हें डराने लगता है. हाल ही में एक सहकर्मी से सिर्फ पांच मिनट की लिफ्ट लेकर ट्यूब स्टेशन तक जाना भी उनके लिए इतना मुश्किल रहा कि उन्हें “बहुत बुरा” महसूस हुआ.

अकादमिक विशेषज्ञों का कहना है कि यात्री मोशन सिकनेस की समस्या को कम करने के लिए कुछ उपाय अपना सकते हैं.

  • सामने की खिड़की से बाहर देखें और फोन देखने या किताब पढ़ने से बचें
  • अगर संभव हो तो पीछे बैठने के बजाय आगे वाली पैसेंजर सीट पर बैठें. अगर पीछे बैठना ज़रूरी हो, तो बीच वाली सीट चुनें, ताकि सामने की खिड़की से बाहर देख सकें
  • सिर को हेडरेस्ट से टिकाकर स्थिर रखें
  • अपनी सीट को थोड़ा पीछे झुका लें
  • सांस लेने की गति को सामान्य और नियंत्रित रखें
  • ताजी हवा के लिए खिड़की खोल लें
  • जरूरत पड़ने पर ट्रैवल सिकनेस की दवा ले सकते हैं, हालांकि इससे नींद आ सकती है
  • लंबी यात्रा से पहले पर्याप्त पानी पिएं, अच्छी नींद लें और बहुत ज्यादा तला-भुना या चिकना खाना खाने से बचें

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि लंबे समय तक बार-बार सफर करने से शरीर मोशन सिकनेस का आदी हो सकता है.

प्रोफेसर गोल्डिंग के मुताबिक, इलेक्ट्रिक वाहनों में जितना ज़्यादा सफर करेंगे, शरीर उतना ही उनके सफर के तरीके के साथ एडजस्ट कर सकता है और मोशन सिकनेस होने की संभावना कम हो सकती है.

सांकेतिक तस्वीर

रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट में मोबिलिटी डिजाइन के प्रोफेसर साइरिल डील्स का कहना है कि कार कंपनियां भी इलेक्ट्रिक वाहनों में मोशन सिकनेस की समस्या को कम करने के लिए कुछ कदम उठा सकती हैं.

इनमें अचानक होने वाले तेज़ एक्सेलरेशन को सॉफ्ट करने वाला सॉफ्टवेयर, यात्रियों को कार की गति का एहसास कराने के लिए साउंड सिस्टम और सीट में हल्के कंपन जैसे फीचर्स शामिल हो सकते हैं. इसके अलावा, ऐसा अडैप्टिव रीजेनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम भी दिया जा सकता है, जो अचानक कार की रफ्तार कम होने से रोकता है.

कुछ ईवी में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग को बंद करने का विकल्प भी होता है.

ब्रिटेन में इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग पॉइंट बनाने वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले बीईएएमए के मैट एडम्स कहते हैं कि उन्हें भरोसा है कि “अगर भविष्य की रिसर्च से कार सिकनेस की वजह का पता चलता है, तो वाहन निर्माता उसी के मुताबिक बदलाव कर इसे बेहतर कर सकते हैं.”

लेकिन लोला के लिए फिलहाल सबसे ज़रूरी बात यही है कि उनके बॉयफ्रेंड अपनी कार बदल लें. वह कहती हैं कि वह दिन जितनी जल्दी आए, उतना ही अच्छा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS