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‘एक भी संतरा बाज़ार नहीं पहुंचा, पूरे बाग़ सूख गए’: महाराष्ट्र के सैकड़ों किसानों का दर्द

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Source :- BBC INDIA

अपने संतरे के बाग में बैठे रामचंद्र राणे.

“खेती के लिए तीन लाख रुपये का कर्ज़ लिया. घर के लिए पांच लाख रुपये का कर्ज़ लिया. कुल आठ लाख रुपये का कर्ज़ है. अब खेत की हालत ऐसी हो गई है. समझ नहीं आ रहा कि कर्ज़ कैसे चुकाऊं. मेरी पत्नी काम पर जाती है और उसी की कमाई से घर चल रहा है. मुझे पूरी रात नींद नहीं आती.”

महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के मोर्शी में संतरे की खेती करने वाले रामचंद्र राणे अपना दर्द बता रहे थे.

राणे छोटे किसान हैं. उनके पास दो एकड़ ज़मीन है, जिस पर संतरे का बाग़ लगा है.

लेकिन इस साल पेड़ों पर बहुत कम संतरे आए. बारिश के बीच लंबा अंतर होने की वजह से जो संतरे लगे, उनका आकार भी नहीं बढ़ा. इसलिए उन्हें बाज़ार में खरीदार नहीं मिल रहे हैं. अब कर्ज़ कैसे चुकाएंगे और आगे जीवन कैसे चलेगा? राणे के सामने यही सवाल है.

विदर्भ के संतरे और उससे जुड़ा करोड़ों का कारोबार

इस साल महाराष्ट्र में सूखा पड़ा है. इसका संतरे और मौसंबी के बाग़ों पर क्या असर हो रहा है, यह जानने के लिए हम उन इलाक़ों में पहुंचे, जहां अच्छी क्वालिटी के इन फलों की खेती होती है.

विदर्भ में करीब एक लाख 50 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर संतरे की खेती होती है. इससे करोड़ों रुपये का कारोबार जुड़ा है.

इनमें सबसे ज़्यादा संतरे नागपुर ज़िले और अमरावती ज़िले के वरुड और मोर्शी इलाक़ों में उगाए जाते हैं.

नागपुर के काटोल और नरखेड़ तालुका मौसंबी की खेती के लिए जाने जाते हैं. लेकिन अब इन इलाक़ों के किसानों की हालत बेहद ख़राब है.

अंबिया बहार के संतरे अब बाज़ार में पहुंचने लगते हैं. लेकिन राणे के खेत का एक भी संतरा अब तक बाज़ार नहीं पहुंचा है.

अंबिया बहार के बहुत से संतरे पेड़ों से गिर गए. जो बचे, उनका आकार नहीं बढ़ा. अब तक मृग बहार के संतरे भी बड़े हो जाने चाहिए थे. लेकिन उनका आकार भी नहीं बढ़ा है.

बारिश के बीच लंबा अंतर होने से संतरों की बढ़त रुक गई. इतना ही नहीं, सूखे की वजह से संतरे के पेड़ भी सूखने लगे हैं.

सूखे से संतरे का बाग़ सूख गया

संतरा उगाने वाले किसान गिरीश काले

मोर्शी तालुका के दापोरी गांव के किसान गिरीश काले के पास सात एकड़ में संतरे का बाग़ है. लेकिन उनके बाग़ के आधे से ज़्यादा पेड़ सूखे की वजह से सूख गए हैं. अब उन्होंने सूखे हुए पेड़ों को हटाना भी शुरू कर दिया है.

गिरीश बताते हैं, “गर्मियों में तापमान 47 से 48 डिग्री तक पहुंच गया था. उस गर्मी में हमने किसी तरह बाग़ों को बचाया. लेकिन बारिश के मौसम में भी कम बारिश हुई. तेज़ गर्मी और कम बारिश की वजह से बाग़ सूख गया.”

“किसी तरह मृग बहार के संतरे लगे, लेकिन उनका आकार छोटा है. अंबिया बहार के संतरे भी बड़े नहीं हुए. इसलिए व्यापारी यहां आ ही नहीं रहे.”

“हमारे यहां अरहर और कपास का उत्पादन भी बहुत ज़्यादा नहीं होता. चाहे जितने इंतज़ाम कर लें, एक एकड़ में तीन क्विंटल से ज़्यादा कपास नहीं होती. हमारी ज़मीन संतरे के लिए ही अच्छी है. लेकिन अब सूखे की वजह से पेड़ सूख गए हैं.”

गिरीश ने एक निजी साहूकार से पांच लाख रुपये का कर्ज़ लिया है. लेकिन अब वह कहते हैं कि कर्ज़ चुकाने और आगे जीवन चलाने के लिए उनके पास दो एकड़ ज़मीन बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

वह कहते हैं, “मरने से अच्छा है कि दो एकड़ ज़मीन बेचकर जीवन चलाया जाए. मेरे पास 14 एकड़ ज़मीन है, इसलिए मैं दो एकड़ बेच दूंगा. लेकिन जिनके पास कुल दो एकड़ ज़मीन है, वे क्या करेंगे? उनके सामने तो मरने की नौबत आ जाएगी.”

कुएं का पानी पूरा नहीं पड़ रहा, बाग़ों को कैसे बचाएं?

महाराष्ट्र में संतरे के बाग

मोर्शी और वरुड ऐसे इलाक़े हैं, जहां ज़मीन के नीचे पानी की भारी कमी है. यहां नए कुएं खोदने या बोरवेल करने की अनुमति नहीं है क्योंकि पानी का स्तर बहुत नीचे जा चुका है.

किसानों का कहना है कि कम बारिश के कारण अब कुओं का पानी भी बाग़ों के लिए पूरा नहीं पड़ रहा है. अक्तूबर में ही कुओं का जलस्तर सबसे नीचे पहुंच गया है.

किसानों की शिकायत है कि पिछले साल जिस कुएं का पानी 12 घंटे तक चलता था, वह अब डेढ़ घंटे में ख़त्म हो जाता है. ऐसे में किसानों के सामने सवाल है कि वे अपने बाग़ों को कैसे बचाएं.

कुछ गिने-चुने किसानों के बाग़ों में संतरे दिखाई दे रहे हैं. लेकिन उनकी संख्या कम है क्योंकि बहुत से फल पहले ही पेड़ों से गिर चुके हैं.

मोर्शी तालुका के किसान रुपेश वालके के खेत में पेड़ों पर संतरे दिखाई देते हैं. लेकिन उनका कहना है कि इनकी संख्या हर साल के मुक़ाबले कम है.

रुपेश कहते हैं, “इस साल गर्मी बहुत तेज़ रही. उसी समय अंबिया बहार के 70 फ़ीसदी संतरे पेड़ों से गिर गए.”

“इसके बाद लगा कि बारिश अच्छी होगी और जो 30 से 40 फ़ीसदी संतरे बचे हैं, वे कम से कम तैयार हो जाएंगे.”

“लेकिन बारिश ने भी साथ नहीं दिया और संतरों का आकार छोटा रह गया. जितना उत्पादन होना चाहिए था, उतना भी नहीं होगा.”

मौसंबी के उत्पादन पर भी असर

किसान रुपेश वालके

नागपुर ज़िले में मौसंबी के बाग़ों की हालत भी इससे अलग नहीं है.

किसानों का कहना है कि हर साल जितनी मौसंबी होती है, उसके 30 फ़ीसदी फल भी इस साल पेड़ों पर दिखाई नहीं दे रहे हैं.

हमने काटोल तालुका में मौसंबी के बाग़ देखे. यहां पेड़ों पर इतनी कम मौसंबी लगी है कि उसे उंगलियों पर गिना जा सकता है. संतरे की तरह मौसंबी का आकार भी नहीं बढ़ा है.

काटोल के येरला गांव के किसान स्वप्निल धोटे बताते हैं, “पिछले साल एक पेड़ से 30 किलो मौसंबी मिली थी. इस साल एक पेड़ पर केवल तीन किलो फल हैं. किसी-किसी पेड़ पर ज़्यादा से ज़्यादा सात से आठ किलो मौसंबी दिखाई दे रही है.”

“पेड़ों पर बहुत अच्छे फूल आए थे और फल भी अच्छी तरह लगने शुरू हुए थे. लेकिन इस साल गर्मी बहुत तेज़ पड़ी और उस समय फल गिर गए.”

“इसके बाद दो-तीन दिन लगातार बारिश हुई तो फिर फल गिरे. फिर बारिश के बीच बहुत लंबा अंतर आ गया. इसकी वजह से पेड़ों पर दबाव बढ़ा और उस समय भी फल गिर गए.”

“इसलिए अब पेड़ों पर फल नहीं हैं. पेड़ों पर बहुत दबाव पड़ा है. इस साल बारिश भी फुहार की तरह हुई. पानी ज़मीन के अंदर गया ही नहीं.”

स्वप्निल धोटे का मौसंबी का बाग़ 12 एकड़ में फैला है. लेकिन उनका कहना है कि इस साल इससे एक लाख रुपये की पैदावार भी नहीं होगी.

संतरे के मुक़ाबले मौसंबी के बाग़ में जोखिम ज़्यादा होता है. मौसंबी का पेड़ चौथे साल से फल देना शुरू करता है. लेकिन जैसे ही फल मिलने शुरू होते हैं, बाग़ के पेड़ एक-एक करके मरने भी लगते हैं.

इसी वजह से मौसंबी की खेती को जोखिम भरा माना जाता है. इस साल किसानों को डर है कि सूखे की वजह से मौसंबी के बाग़ भी सूख सकते हैं.

‘किसान 15 से 20 साल पीछे चला जाएगा’

पानी न मिलने से संतरे के पेड़ों की हालत कुछ ऐसी हो गई है

संतरे का एक बाग़ तैयार होने में छह साल लगते हैं. सातवें साल से फल मिलने शुरू होते हैं.

तब तक एक एकड़ के बाग़ पर नौ से 10 लाख रुपये ख़र्च हो जाते हैं. एक बार लगाया गया संतरे का पेड़ 25 साल तक फल दे सकता है. इसलिए सूखे की वजह से पेड़ों का सूखना किसानों के लिए बहुत बड़ा नुक़सान है.

महाऑरेंज के निदेशक मनोज जवंजाल को डर है कि अगर बाग़ सूख गए तो किसान 15 से 20 साल पीछे चला जाएगा.

वह कहते हैं, “इस साल केवल दो बार बारिश हुई. सितंबर का महीना आ गया, फिर भी बारिश नहीं हुई.”

“पिछले साल बारिश के मौसम में बहुत पानी बरसा था, लेकिन गर्मी भी बहुत तेज़ पड़ी. पिछले अप्रैल, मई और जून में एक बार भी बारिश नहीं हुई.”

“इस वजह से पानी तेज़ी से भाप बनकर उड़ गया और बाग़ों को बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत पड़ी. पिछली गर्मियों में कुओं की हालत इतनी ख़राब हो गई थी कि आख़िरी दौर की गर्मी में 10 फ़ीसदी बाग़ ख़राब हो गए थे.”

“कुओं में जितना पानी आना चाहिए, उतना नहीं आ रहा है. अभी हम फ़रवरी तक बाग़ों को बचा सकते हैं. फ़रवरी तक बाग़ों को कुछ नहीं होगा. असली समस्या उसके बाद शुरू होगी.”

“अगर बाग़ चले गए तो किसान 15 से 20 साल पीछे चला जाएगा. सरकार समय रहते बैठक करके योजना बनाए तो हम बहुत से बाग़ बचा सकते हैं.”

किसानों का कहना है कि अगर उनका पूरा बाग़ भी ख़राब हो जाए, तब भी उन्हें केवल दो या तीन हेक्टेयर तक के नुक़सान का मुआवज़ा मिलता है.

लेकिन बाक़ी बाग़ों में हुए नुक़सान का क्या होगा? किसान यह सवाल भी पूछते हैं कि फल न मिलने के बावजूद उन्हें बाग़ बचाने के लिए पैसा ख़र्च करना पड़ता है. उस ख़र्च का क्या होगा?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS