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एक मैसेज, एक ज़िप फ़ाइल, और कंपनी के खाते से 1.5 करोड़ रुपये ग़ायब, क्या है बॉस स्कैम?

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Source :- BBC INDIA

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एक मैसेज, एक ज़िप फ़ाइल, और फिर कुछ ही घंटों में कंपनी के खाते से 1.5 करोड़ रुपये का ट्रांसफ़र हो गया.

अहमदाबाद पुलिस ने इस अपराध के तह तक पहुंचने का दावा किया और बताया कि साइबर अपराधियों ने कंपनी के बॉस की पहचान का इस्तेमाल करके कर्मचारियों से बड़े पैमाने पर पैसे ट्रांसफ़र करवाए.

इस तरह के घोटाले में कंपनी के बॉस के नाम और प्रोफ़ाइल फ़ोटो का इस्तेमाल करके कंपनी के अकाउंटेंट या वित्त विभाग के कर्मचारी को व्हाट्सऐप पर एक संदेश भेजा जाता है.

संदेश में निर्देश दिया जाता है कि तुरंत एक निश्चित खाते में राशि ट्रांसफ़र करें. इस तरह के साइबर फ़्रॉड को ‘बॉस स्कैम’ के नाम से जाना जाता है.

भले ही संदेश बॉस के नंबर से न आया हो, लेकिन कर्मचारी के फ़ोन पर वह बॉस के नाम से दिखाई देता है. इससे कर्मचारी के सामने मैसेज को बिना वेरिफ़ाई किए पैसे ट्रांसफ़र करने का ख़तरा रहता है.

अहमदाबाद साइबर क्राइम पुलिस की जांच में इस तरह की धोखाधड़ी के पीछे फ़र्ज़ी सिम कार्ड, ओटीपी, व्हाट्सऐप अकाउंट और मैलवेयर का इस्तेमाल करने वाले एक संगठित गिरोह का पता चला है.

पुलिस ने देश के 26 राज्यों में दर्ज 251 शिकायतों की पड़ताल की, इसमें लगभग 4,500 सिम कार्ड से जुड़ी जानकारी शामिल थी.

इनमें तीन ‘बॉस स्कैम’ की शिकायतें भी शामिल थीं.

पुलिस ने बताया है कि उन्हें शुरुआती जानकारी मिली है कि इस नेटवर्क के तार भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान और हांगकांग से जुड़े हुए हैं. इस संबंध में जांच जारी है.

बॉस स्कैम का पता कैसे चला?

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अहमदाबाद साइबर क्राइम पुलिस में प्रवीण नागजीभाई बावलिया की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, 23 जून, 2026 को उन्हें एक अज्ञात मोबाइल नंबर से व्हाट्सऐप मैसेज आया.

मैसेज भेजने वाले ने ख़ुद को भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ‘रिस्क कंट्रोल’ विभाग से जुड़ा बताया.

मैसेज में बताया गया कि उनकी कंपनी के बैंक खाते में ‘असामान्य लेनदेन गतिविधियां’ हुई हैं और खाते को बैन किया जा सकता है या सस्पेंड किया जा सकता है. इस मैसेज के साथ एक ज़िप फ़ाइल भी भेजी गई थी.

बीबीसी गुजराती से बातचीत में प्रवीणभाई ने कहा, “मुझे पिछले छह महीनों से लगातार ऐसे संदेश मिल रहे थे. शुरू में मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन चूंकि ऐसे लिंक लगातार आ रहे थे, तो मैंने सोचा कि शायद ये आरबीआई के संदेश हो सकते हैं.”

“इसलिए मैंने अपनी रियल एस्टेट कंपनी के अकाउंटेंट को एक लिंक भेजा और उनसे और जानकारी इकट्ठा करने के लिए कहा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि खाता सीज़ तो नहीं किया गया है.”

उनके अनुसार, “अकाउंटेंट ने अपने डेस्कटॉप पर लिंक खोला और फ़ाइल डाउनलोड कर ली. फ़ाइल डाउनलोड होने के बाद, हैकर मेरे डेस्कटॉप से मेरे व्हाट्सऐप कॉन्टैक्ट्स और व्हाट्सऐप मैसेज देखने लगा.”

प्रवीणभाई के साथ यह घटना तब घटी जब वे उदयपुर में एक शादी में शामिल होने गए थे.

उनके अनुसार, हैकर को भी उनकी स्थिति की जानकारी थी. अगली सुबह, हैकर ने उनके नाम से उनके अकाउंटेंट को मैसेज भेजा और उनसे कोलकाता की एक गारमेंट कंपनी में तुरंत 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफ़र करने को कहा.

अकाउंटेंट ने आरटीजीएस के माध्यम से 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफ़र कर दिए.

इस लेनदेन के बारे में पता चलने पर प्रवीणभाई ने साइबर क्राइम विभाग में शिकायत दर्ज कराई.

पुलिस के अनुसार, 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई गई और धोखाधड़ी में शामिल 1 करोड़ 13 लाख 53 हज़ार 700 रुपये की राशि बरामद की गई है. जबकि लगभग 25 लाख रुपये विदेश भेजे जा चुके हैं.

पुलिस ने पश्चिम बंगाल से इरम अली पियादा और इंजामुल मोल्लाह को इस घोटाले में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किया है. पुलिस के अनुसार, मामले की जाँच जारी है.

बीबीसी ने दोनों अभियुक्तों के वकीलों या परिवारवालों से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की, लेकिन ख़बर लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका. उनका पक्ष जानने पर हम यहाँ अपडेट करेंगे.

बॉस स्कैम की कार्यप्रणाली क्या है?

साइबर हैकर

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बीबीसी ने अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच की डीएसपी लवीना सिन्हा से बात करके यह जानने की कोशिश की कि इस घोटाले को कैसे अंजाम दिया गया.

उनका कहना है कि साइबर अपराधी सबसे पहले आरबीआई या किसी सरकारी एजेंसी के अधिकारी बनकर कंपनी के सीईओ, निदेशक या कर्मचारी को व्हाट्सऐप या ईमेल के माध्यम से एक ज़िप फ़ाइल भेजते हैं.

“इस ज़िप फ़ाइल में .exe या .dll जैसे मैलेशियस सॉफ्टवेयर की फ़ाइलें होती हैं. अगर ऐसी कोई फ़ाइल कंपनी के कंप्यूटर या लैपटॉप पर व्हाट्सऐप वेब के माध्यम से चलाई जाती है, तो अपराधी व्हाट्सऐप वेब सेशन पर नियंत्रण कर सकता है.”

“फिर, कंपनी के सीईओ या निदेशक की पहचान का इस्तेमाल करके और एक प्रोफ़ाइल फ़ोटो जोड़कर, वे अपना मोबाइल नंबर बॉस के नाम पर सहेज लेते हैं.”

“नंबर सेव करने के बाद, कंपनी के लेखा या वित्त विभाग के कर्मचारी को तुरंत पैसे ट्रांसफ़र करने के लिए एक संदेश भेजा जाता है. इस प्रक्रिया में डमी सिम कार्ड और ओटीपी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.”

पुलिस के अनुसार, ग्राहकों की जानकारी के बिना उनके नाम पर मिले सिम कार्डों से मोबाइल नंबर सक्रिय करके फ़र्ज़ी सिम बनाए गए थे.

इन सिमों का इस्तेमाल विभिन्न फ़ोनों में किया गया और नंबरों की जानकारी साइबर अपराधियों को दे दी गई.

जब इस नंबर से व्हाट्सऐप अकाउंट एक्टिवेट किया गया तो ज़रूरी ओटीपी एक नकली सिम पर मिला, जिसे बाद में साइबर अपराधियों को दे दिया गया.

इससे अपराधियों को व्हाट्सऐप को अपने नियंत्रण में लेने में मदद मिली.

अहमदाबाद पुलिस की जांच के दौरान इस मामले में दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, इनमें से एक साइबर धोखाधड़ी में शामिल लोगों के संपर्क में था.

यह व्यक्ति उन्हें मोबाइल नंबर, नकली सिम कार्ड और व्हाट्सऐप को नियंत्रण लेने में मदद कर रहा था.

दूसरा अभियुक्त एयरटेल, जियो, वीआई और बीएसएनएल जैसी दूरसंचार कंपनियों के लिए सेल्स रेप्रेजेंटेटिव के रूप में काम कर रहा था.

पुलिस का आरोप है कि यह व्यक्ति ग्राहकों के बायोमेट्रिक फ़िंगरप्रिंट और टेलीकम्मुनिकेशन कंपनियों के एप्लिकेशन का इस्तेमाल करके उनके नाम पर सिम कार्ड हासिल करता था और उनकी जानकारी के बिना दूसरे सिम में मोबाइल नंबर सक्रिय करता था.

साइबरक्राइम-एज़-ए-सर्विस क्या है?

साइबर क्राइम, प्रतीकात्मक तस्वीर

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साइबर अपराध की दुनिया में अब हर अपराधी को पूरी तकनीकी संरचना ख़ुद बनाने की ज़रूरत नहीं है.

कोई व्यक्ति नकली सिम देता है, कोई व्यक्ति ओटीपी मुहैया कराता है, कोई व्यक्ति व्हाट्सऐप अकाउंट बनाता है और कोई दूसरा व्यक्ति पीड़ित से बात करके पैसे ट्रांसफ़र करता है.

अहमदाबाद पुलिस की एक प्रेस विज्ञप्ति में इस तरह की तैयार डिज़िटल सेवाओं, समूहों और संसाधनों को ‘साइबरक्राइम-एज़-ए-सर्विस’ या सीएएएस के उदाहरण के तौर पर बताया गया है.

यानी, साइबर अपराध करने के लिए ज़रूरी डिजिटल उपकरण और सेवाएं भी आसानी से उपलब्ध हो सकती हैं.

इस मामले की जांच के दौरान मिले लगभग 4,500 सिम कार्डों से मिली जानकारी के आधार पर, अहमदाबाद साइबर अपराध पुलिस ने 26 राज्यों में दर्ज 251 एनआरसीपी शिकायतों की पड़ताल की.

इन शिकायतों में 194 ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, तीन बॉस स्कैम और 29 ऑनलाइन और सोशल मीडिया से संबंधित अपराध शामिल थे.

इसके अतिरिक्त, अन्य प्रकार के साइबर अपराधों, हैकिंग, अश्लील सामग्री और बाल यौन शोषण से संबंधित शिकायतों को भी इस डेटा में शामिल किया गया था.

पुलिस ने बताया है कि जांच के दौरान 10,000 से अधिक ऐसे उपकरण बरामद किए गए जिनमें मालवेयर थे.

अभियुक्तों से सात मोबाइल फ़ोन और एक एयरटेल राउटर भी ज़ब्त किया गया है.

ज़ब्त किए गए उपकरणों में मौजूद व्हाट्सऐप चैट, ग्रुप, मोबाइल नंबर और अन्य डिज़िटल साक्ष्यों के आधार पर अन्य अभियुक्तों और नेटवर्क के मुख्य संचालकों की पहचान करने के लिए जांच जारी है.

अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच और आई4सी के तकनीकी और नेटवर्क विश्लेषण के अनुसार, इस मामले में इस्तेमाल किए गए मैलवेयर को चीन से जुड़े साइबर अपराधियों द्वारा विकसित किए जाने का संदेह है.

बॉस स्कैम से कैसे बचें?

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अहमदाबाद पुलिस ने इस तरह की साइबर धोखाधड़ी से बचने के लिए कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी है.

अज्ञात मोबाइल नंबरों या ईमेल से मिले ZIP, .exe, .dll या .apk फ़ाइलों को डाउनलोड या ओपन न करें.

इस संबंध में सिन्हा कहते हैं, “यदि आपको व्हाट्सएप या ईमेल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए कोई संदेश मिलता है, तो स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि किए बिना पैसे ट्रांसफ़र न करें.”

“यदि बॉस या सीईओ की ओर से तत्काल भुगतान करने के लिए कहा जाए, तो उन्हें कॉल करके, वीडियो कॉल करके या उनके ज्ञात या वैकल्पिक नंबर पर व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पुष्टि करें.”

वे यह भी कहते हैं, “व्हाट्सऐप से जुड़े उपकरणों को नियमित रूप से जांचें और अगर कोई अज्ञात डिवाइस कनेक्ट हो तो तुरंत लॉग आउट कर दें. व्हाट्सऐप पर टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखें.”

कंपनियों को ऐसे सॉफ़्टवेयर प्रतिबंध वाली नीतियां लागू करनी चाहिए जो अज्ञात .exe और .dll फ़ाइलों को प्रतिबंधित करती हों, और विंडोज, एंटीवायरस और एंडपॉइंट सुरक्षा को अपडेट रखना चाहिए.

इस तरह की धोखाधड़ी में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है. अहमदाबाद पुलिस ने कहा है कि तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं.

प्रवीणभाई के मामले में भी, धोखाधड़ी का पता चलने के तुरंत बाद शिकायत दर्ज की गई थी और पुलिस कार्रवाई के परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में पैसे को फ़्रीज़ या बरामद किया गया था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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