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एशियन गेम्स 2026: रिकॉर्ड टूटे…इतिहास बना, लेकिन क्या और मेडल जीत सकता था भारत?

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Source :- BBC INDIA

भारत की गोल्ड मेडलिस्ट विद्या रामराज महिलाओं की 4x400 मीटर रिले फ़ाइनल में फ़िनिश लाइन पार करते हुए जीत का जश्न मना रही हैं.

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 में भारत ने कुल 85 मेडल जीते. इनमें 21 गोल्ड, 27 सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज़ मेडल शामिल हैं.

अगर भारतीय एथलीटों की बात करें तो उन्होंने एशियन गेम्स 2026 में एथलेटिक्स (ट्रैक एंड फ़ील्ड) में कुल 24 मेडल जीते, जिसमें 1 गोल्ड, 9 सिल्वर और 14 ब्रॉन्ज़ मेडल शामिल हैं.

अगर आंकड़ों के आधार पर देखें तो यह कोई ज़बरदस्त प्रदर्शन नहीं रहा. 1974 के खेलों में तेहरान में भारतीय एथलीटों ने 15 मेडल जीते थे, जिनमें 4 गोल्ड मेडल शामिल थे.

तो क्या माना जाए कि पिछले 52 सालों में भारतीय एथलेटिक्स पिछड़ गई है या उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई?

सीमा कुमारी ने 10,000 मीटर में कांस्य पदक जीता है

कम से कम आंकड़े तो यही दास्तान बयान करते हैं. लेकिन सिर्फ नंबर या आंकड़ों के आधार पर प्रदर्शन का सही आकलन नहीं किया जा सकता, कम से कम उन खेलों का जिनमें प्रदर्शन की तुलना आराम से की जा सकती है.

हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल इत्यादि ऐसे खेल हैं जहाँ कभी-कभी व्यक्तिगत पसंद और नापसंद के आधार पर आकलन किया जाता है. जैसे कि अगर किसी व्यक्ति को विराट कोहली पसंद हैं तो वह केवल उसी की सराहना करेगा.

लेकिन एथलेटिक्स और स्विमिंग दो ऐसे खेल हैं जिनमें व्यक्तिगत परिणाम को मापा जा सकता है. और तुलना की जा सकती है. और किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले सही आकलन के लिए व्यक्तिगत प्रदर्शन को देखना ज़रूरी हो जाता है. सिर्फ पदक तालिका से काम नहीं चल सकता.

अब अगर मिल्खा सिंह, पीटी उषा और श्रीराम सिंह के ओलंपिक प्रदर्शन की बात करें तो इनमें से किसी ने ओलंपिक नहीं जीता. मिल्खा और उषा चौथे स्थान पर रहे और श्रीराम सातवें पर. लेकिन मिल्खा का रोम ओलंपिक में 400 मीटर में 44.77 का समय विश्व स्तर का था.

उषा का लॉस एंजेलिस में 400 मीटर हर्डल में 55.42 का समय अद्भुत था. इसी प्रकार श्रीराम सिंह ने मॉन्ट्रियल ओलंपिक खेलों में 800 मीटर में सातवाँ स्थान प्राप्त किया लेकिन उनका 1:45.77 का समय एशियन रिकॉर्ड था और 32 साल तक रहा.

आइची-नागोया में भारत का प्रदर्शन

 सावन बरवाल

और अब बात करते हैं नागोया की. भारतीय एथलीटों ने नागोया में पाँच राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़े, जिनमें 2 काबिल-ए-तारीफ़ थे.

सावन बरवाल को भले सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा हो लेकिन उन्होंने मैराथन दौड़ को 2 घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड में पूरा किया और अपने ही रिकॉर्ड को 21 सेकंड से तोड़ दिया.

मैराथन में भारत का यह पदक 48 साल बाद आया. इससे पहले एच.के. सीताराम ने दिल्ली के 1982 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था.

अफसोस, इस शानदार प्रदर्शन को किसी भी भारतीय पत्रकार ने सुबह उठकर रेस में जाकर कवर नहीं किया. पदक तालिका में सावन बरवाल के नाम के आगे एक मेडल तो जुड़ा होगा लेकिन यह नहीं लिखा होगा कि यह विश्व स्तर की परफॉर्मेंस थी.

जहाँ बरवाल ने स्टेडियम के बाहर कमाल किया वहीं विद्या रामराज ने नागोया के मिजुहो पार्क स्टेडियम में शानदार तरीके से इतिहास रचा.

तमिलनाडु की विद्या ने तीन पदक अपने नाम किए और 400 मीटर हर्डल में तो कांस्य पदक के साथ पीटी उषा का 42 वर्ष पुराना नेशनल रिकॉर्ड भी तोड़ दिया.

विद्या ने 54.75 का समय निकालकर पीटी उषा का 55.42 का रिकॉर्ड तोड़ा जो उषा ने 1984 में लॉस एंजेलिस ओलंपिक में बनाया था. इसके अलावा विद्या ने किरण पहल, एम. पूवम्मा और प्राची चौधरी के साथ 4×400 मीटर रिले का गोल्ड मेडल जीता.

इस रेस में विद्या ने रेस का आखिरी लेग दौड़ते हुए शानदार प्रदर्शन किया और पीछे से आकर भारत को गोल्ड दिलवाया. सत्तर के दशक में अक्सर पुरुषों की रिले रेस में श्रीराम सिंह यह कारनामा अंजाम देते थे. विद्या ने मिक्स्ड रिले में भी सिल्वर मेडल जीता.

पारुल चौधरी ने भी 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता लेकिन उनका समय 9:08.67 काफी अच्छा रहा, जो उनके अपने नेशनल रिकॉर्ड से 3.79 सेकंड बेहतर था. पारुल अच्छी एथलीट हैं लेकिन शायद उनका रनिंग स्टाइल और लंबी हाइट स्टीपलचेज़ से ज़्यादा मैराथन में सही बैठे.

अगर इस प्रकार एथलीट अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से अच्छा करे तो उसे बिल्कुल बुरा तो नहीं कहा जा सकता.

दिक्कत यह है कि अक्सर अधिकारी खेलों में जाने से पहले खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं और अक्सर कुछ मीडिया कर्मी, जो शायद हर खेल की बारीकियाँ नहीं जानते, उन अधिकारियों की बातों के आधार पर अपनी रिपोर्टों में एथलीटों से अपेक्षा बढ़ा देते हैं. और जब एथलीट उन उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते तो एथलीटों को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है.

महिलाओं की पोल वॉल्ट इसी श्रेणी में आती है. बारानिका एलंगोवन ने इस इवेंट में 4.15 मीटर की जंप लगाकर ब्रॉन्ज़ मेडल जीता, जो भारत के लिए इस इवेंट में पहला पदक है. एलंगोवन के प्रदर्शन को किसी भी हालत में ख़राब नहीं कहा जा सकता.

महिलाओं की पोल वॉल्ट हाल ही में शुरू की गई है और एलंगोवन का प्रदर्शन अच्छा माना जाना चाहिए. इसी प्रकार सर्वेश कुषारे ने पुरुषों की हाई जंप में सिल्वर मेडल जीता. इससे पहले इस इवेंट का पिछला मेडल भीम सिंह ने 1970 के बैंकॉक खेलों में जीता था.

नीरज चोपड़ा के बिना जैवलिन में भारत ने जीते दो मेडल

पुरुष जैवलिन थ्रो स्पर्धा का पदक समारोह

ओलंपिक चैम्पियन रहे नीरज चोपड़ा से पहले जैवलिन थ्रो भारतीय एथलेटिक्स की सबसे कमज़ोर इवेंट माना जाता था. इस इवेंट में पाकिस्तान का रिकॉर्ड भारत से कहीं अच्छा था.

मोहम्मद नवाज़ ने पाकिस्तान के लिए 1958 के टोक्यो एशियन गेम्स में रिकॉर्ड के साथ गोल्ड जीता था और अल्लादाद ने 1973 की एशियन चैम्पियनशिप में खिताब जीता था. नागोया में नीरज चोपड़ा के न रहते हुए भी भारत के 2 जैवलिन थ्रोअर मैदान में उतरे और दोनों ने मेडल जीते.

यशवीर ने रजत लिया जबकि रोहित यादव को कांस्य पदक मिला. यह इन एशियन गेम्स की एक बड़ी उपलब्धि है. इस बार पाकिस्तान के ओलंपिक चैम्पियन अरशद नदीम उंगली में चोट की वजह से मेडल नहीं जीत सके.

एंसी सोजन ने एक कठिन और नाटकीय मुकाबले में लॉन्ग जंप इवेंट में सिल्वर मेडल जीता. एनसी ने 6.53 मीटर की जंप लगाकर यह मेडल जीता. आखिरी राउंड तक एनसी गोल्ड मेडल की प्रबल दावेदार चल रही थीं और भारत की दूसरी एथलीट शैली सिंह कांस्य पदक की होड़ में थीं.

लेकिन छठे और आखिरी राउंड में चीन की दो एथलीटों ने भारतीय खिलाड़ियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. जहाँ मेंगी तान ने 6.46 मीटर की जंप से शैली सिंह को पछाड़ दिया वहीं वाई हुआंग ने 6.55 मीटर की छलांग लगाकर एनसी का खेल बिगाड़ दिया.

दिल्ली के तेजस्विन शंकर ने 7,934 अंकों के साथ डेकाथलॉन में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. 10 इवेंट का डेकाथलॉन एथलेटिक्स का सबसे कठिन इवेंट माना जाता है जहाँ एथलीट को दो दिन में 10 इवेंट हिस्सा लेना होता है.

हालांकि तेजस्विन का सर्वश्रेष्ठ स्कोर 8,057 है लेकिन नागोया में वह उस तक नहीं पहुँच सके और चीन के जिंगुआ चेन ने 8,012 अंकों से सिल्वर मेडल जीता. शंकर की इवेंट खत्म होते ही 1974 तेहरान एशियाई खेलों के डेकाथलॉन गोल्ड मेडलिस्ट विजय सिंह चौहान ने सोशल मीडिया पर शंकर की जमकर तारीफ़ की.

ज्योति को एशियन गेम्स भेजकर भारत ने ग़लती की?

ज्योति

हरिता भद्रा को भी 200 मीटर दौड़ में कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा. हरिता का निजी सर्वश्रेष्ठ समय 23.14 सेकंड है और उनके लिए गोल्ड या सिल्वर के बारे में सोचना मुश्किल काम था.

किसी भी एथलीट के लिए मुश्किल होता है कि हर प्रतियोगिता में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को दोहराए या उससे बेहतर प्रदर्शन करे.

हालांकि मनप्रीत कौर 18.06 मीटर गोला फेंक चुकी हैं, लेकिन नागोया में उन्हें 17.17 मीटर के साथ संतुष्ट रहकर ब्रॉन्ज़ मेडल तक ही सीमित रहना पड़ा.

लंबी दूरी के धावक गुलवीर सिंह एक ही एशियन गेम्स में तीन मेडल जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष एथलीट बने. गुलवीर ने 1,500 मीटर और 10,000 मीटर में रजत तथा 5,000 मीटर में कांस्य पदक जीता. इससे पहले पीटी उषा ने 1986 के सियोल एशियन गेम्स में चार गोल्ड और एक ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था.

और मेडल जीत सकता था भारत?

हाँ, कुछ मेडल और आ सकते थे अगर सब कुछ भारतीय खेमे की उम्मीद के अनुसार होता.

लेकिन सिर्फ उम्मीद से काम नहीं चलता. जवाबदेही भी ज़रूरी होती है.

किसी हद तक यह कहना भी ठीक होगा कि अगर एथलीटों को नागोया भेजने से पहले थोड़ी समझदारी से काम लिया गया होता तो अच्छा होता.

अब ज्योति याराजी को ही लीजिए.

यह ठीक है कि 100 मीटर हर्डल में ज्योति का नेशनल रिकॉर्ड है और 13 सेकंड से नीचे दौड़ने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं. उन्होंने पेरिस ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था.

लेकिन वह घुटने की चोट से उबर रही थीं.

उन्हें नागोया भेजने में एथलेटिक्स फेडरेशन से चूक हो गई. इवेंट से पहले वार्म-अप के दौरान ही ज्योति को घुटने में दर्द हुआ और एथलेटिक्स फेडरेशन ने उन्हें प्रतियोगिता से बाहर रखने का फैसला लिया. अगर उन्हें जापान भेजा ही न जाता तो अच्छा होता.

ट्रिपल जंप में प्रवीण चित्रावल भी चोट की वजह से प्रतियोगिता के दौरान बाहर हो गए और यशस पलाक्षा 400 मीटर हर्डल में हैमस्ट्रिंग खिंचने से बाहर हुए.

अविनाश साबले का 3,000 मीटर स्टीपलचेज़ में चौथे स्थान पर रहना ज़रूर निराशा का विषय रहा. पिछले खेलों के चैम्पियन साबले भी चोट से उबर रहे थे. फिर भी उन्होंने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और 8:21.67 का समय निकाला, जो बहुत बुरा तो नहीं था, लेकिन उन्हें मेडल नहीं दिला सका. जापान के रुजी मिउरा ने 8:17.36 के गेम्स रिकॉर्ड के साथ गोल्ड जीता.

ध्यान देने वाली बात यह है कि अब भारतीय एथलीटों के ऊपर सिर्फ चीन या जापान ही नहीं हैं.

कोरिया ने पिछले कुछ वर्षों में बहुत तरक्की की है. साथ ही 1982 के एशियन गेम्स के बाद खाड़ी के देशों ने पानी की तरह पैसा बहाकर एथलेटिक्स में अपना एक बड़ा मुकाम बना लिया है. अगर आने वाले समय में ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया ने ऑस्ट्रेलिया को एशिया में मिला लिया तो भारत के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी.

कुल मिलाकर भारतीय एथलीटों का प्रदर्शन संतोषजनक ही रहा. स्प्रिंटर्स से निराशा ज़रूर हुई. लेकिन खेल में कुछ भी पक्का नहीं होता. ऊपर-नीचे तो लगा ही रहता है. हाँ, एक बात ज़रूर है कि इस समय कोई भी भारतीय एथलीट जल्दी विश्व स्तर पर चमकने वाला नहीं दिख रहा.

एथलेटिक्स में भारत के पदक विजेता

 विद्या रामराज

गोल्ड:

महिला 4×400 मीटर रिले: विद्या रामराज, किरण पहल, एम. पूवम्मा और प्राची चौधरी

सिल्वर:

गुलवीर सिंह (10,000 मीटर, 1,500 मीटर)

मैराथन: सावन बरवाल

शॉट पुट: तेजिंदर पाल तूर

हाई जंप: सर्वेश कुषारे

लॉन्ग जंप: मुरली श्रीशंकर

जैवलिन थ्रो: यशवीर सिंह

मिक्स्ड 4×400 मीटर रिले: एम. पूवम्मा, टी.के. विशाल, विद्या रामराज, टी.एस. मनु

महिला लॉन्ग जंप: अन्सी सोजन

ब्रॉन्ज़:

5,000 मीटर: गुलवीर सिंह

डेकाथलॉन: तेजस्विन शंकर

जैवलिन थ्रो: रोहित यादव

पुरुष 4×400 मीटर रिले: धर्मवीर चौधरी, टी.एस. मनु, जे. कुमार, टी.के. विशाल

महिला 5,000 मीटर: पारुल चौधरी

महिला 10,000 मीटर: सीमा कुमारी

महिला 400 मीटर: प्राची चौधरी

महिला 200 मीटर: हरिता भद्रा

महिला 400 मीटर हर्डल्स: विद्या रामराज

महिला 3,000 मीटर स्टीपलचेज़: पारुल चौधरी

महिला पोल वॉल्ट: बारानिका एलंगोवन

महिला शॉट पुट: मनप्रीत कौर

महिला हाई जंप: पूजा सिंह

मिक्स्ड 4×400 मीटर रिले: गुरविंदर सिंह, स्नेहा, अनिमेष कुजूर, हरिता भद्रा

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS