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गरीबी ने कहीं का नहीं छोड़ा, अमेरिका-ईरान बातचीत में पाकिस्तान अलग-थलग? कैसे कतर निकला आगे

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Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते में अभी तक पाकिस्तान खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश करता रहा है। लेकिन अब पाकिस्तान इस पूरी डील में कतर का जूनियर जैसा बन गया है। इसके पीछे की वजहों में, पाकिस्तान की गरीबी और वहां की अस्थिरता और अशांति को बताया जा रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते में अभी तक पाकिस्तान खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश करता रहा है। लेकिन अब लगता है कि पाकिस्तान की इस नैरेटिव पर पकड़ ढीली पड़ने लगी है। असल में अमेरिका-ईरान की शांति वार्ता में पाकिस्तान से बड़ी भूमिका कतर की होती जा रही है। इसके साथ ही पाकिस्तान इस पूरी डील में कतर का जूनियर जैसा बन गया है। इसके पीछे की वजहों में, पाकिस्तान की गरीबी और वहां की अस्थिरता और अशांति को बताया जा रहा है।

हाशिए पर जा रहा पाकिस्तान
इस बयान में कतर और पाकिस्तान को दो मध्यस्थ देश बनाया गया है। हालांकि, मुख्य बयान जारी करके, कतर ने खुद को यहां पर आगे कर लिया है। इस बयान में कतर ने संवाद और कूटनीति में दृढ़ विश्वास जताया। इसके अलावा कतर ने सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और यूएई सहित देशों को प्रक्रिया का समर्थन करने के लिए धन्यवाद दिया। न्यूज 18 के मुताबिक कतर द्वारा जारी इन बयानों के बाद पाकिस्तान कूटनीतिक तौर पर हाशिए पर जाता नजर आ रहा है। कतर ने कहाकि लेक लूसर्न शिखर सम्मेलन उस समझौते के तहत आयोजित किया जा रहा था जो अमेरिका और ईरान के बीच हुआ था। इसका उद्देश्य एक व्यापक और स्थायी समझौते की दिशा में काम करना था। बयान में कहा गया कि अंतिम समझौते की शर्तों पर बातचीत करने के लिए विशेष तकनीकी और विशेषज्ञ कार्य समूह बनाए गए हैं।

पाकिस्तान के कमजोर आर्थिक हालात
अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में कतर ने पाकिस्तान पर बढ़त कैसे बनाई, यह एक अहम सवाल है? असल में इसके पीछे है कतर के पास उपलब्ध धन। दूसरी तरफ पाकिस्तान लगातार घरेलू आर्थिक संकट का सामना करता रहता है। अपने आर्थिक संकट से बचने के लिए पाकिस्तान बाहरी मदद पर निर्भर बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक, यह आर्थिक असंतुलन इस्लामाबाद के लिए एक बड़ी समस्या है। इसके चलते ही पाकिस्तान की बतौर मध्यस्थ अपनी पकड़ खोता जा रहा है।

भरोसे का भी संकट
इसके अलावा पाकिस्तान के साथ एक और भी परेशानी है। पाकिस्तान में घरेलू और बाहर के हालात कुछ ऐसे हैं कि उसके साथ हमेशा भरोसे का संकट बना हुआ है। असल में पाकिस्तान में सिविल-मिलिट्री संघर्ष चलता रहता है। देश के बाहर सांप्रदायिकता हावी है। यह सारी बातें इस्लामाबाद की एक सच्चे तटस्थ मध्यस्थ के रूप में विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।

वहीं, कतर ने दशकों तक अपने आप को ऐसे मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने में समय बिताया है जो वैचारिक रूप से विरोधी पक्षों से निपट सकता है। दोहा की स्थापित कूटनीतिक छवि, वित्तीय शक्ति और प्रमुख सार्वजनिक स्थिति ने इस्लामाबाद को अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया में धीरे-धीरे गौण बना दिया है।

कहां तक पहुंची बातचीत
कतर और पाकिस्तान ने कहा कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना जारी रखेंगे कि बातचीत रचनात्मक माहौल में आगे बढ़े और अंतिम समझौते तक पहुंचे। दोनों मध्यस्थों ने कूटनीति तथा संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता के लिए ईरान-अमेरिका की सराहना की। इसके साथ ही उन्होंने इस जारी प्रक्रिया का समर्थन करने के लिए अपने सहयोगियों और साझेदारों को धन्यवाद दिया। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इन वार्ताओं के परिणामों की रूपरेखा सामने रखी। कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस वार्ता का उद्देश्य इस साल की शुरुआत में अमेरिका-इजरायल के ईरान के खिलाफ शुरू किये गये युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करना है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN