Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Randhokarve.com
“अश्लीलता किसी लेख, तस्वीर या दूसरी चीज़ की ख़ूबी नहीं होती. यह केवल उस व्यक्ति के मन में होती है, जो उस पर अश्लील होने का आरोप लगाता है.”
रघुनाथ धोंडो कर्वे की पत्रिका ‘समाजस्वास्थ्य’ में यह बात एक बॉक्स में लिखी होती थी. इसके नीचे पत्रिका का बाक़ी लेख होता था.
इस बॉक्स को देखकर भी अगर पाठक को यह अंदाज़ा नहीं होता था कि आगे उसके सामने क्या आने वाला है, तो इसमें दोष किसका था?
स्वास्थ्य से जुड़ी पत्रिका ‘समाजस्वास्थ्य’ पर यह संदेश लिखा होता था. कर्वे लोगों को ख़ुश करने की चिंता किए बिना वही छापते थे, जिसे वह समाज के लिए ज़रूरी मानते थे.
पिता की तरह गणित के प्रोफेसर थे कर्वे
इमेज स्रोत, ARUN JAKHADE PADGANDHA PRAKASHAN
कहा जाता है कि सुंदरता देखने वाले की नज़र में होती है. इसी तरह यह वाक्य याद दिलाता था कि अश्लीलता भी किसी व्यक्ति की अपनी सोच और नज़रिए से पैदा होती है.
इसके बावजूद ‘समाजस्वास्थ्य’ पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे और उसके ख़िलाफ़ मुक़दमे भी हुए.
इन सभी मुश्किलों का सामना करते हुए ‘समाजस्वास्थ्य’ पत्रिका 27 साल तक चलती रही.
आज भी जिन विषयों पर लोगों के बीच खुलकर बात करना ‘पाप’ समझा जाता है, उनकी स्थिति लगभग सौ साल पहले कैसी रही होगी, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इसके बावजूद कर्वे ने इस मुश्किल काम को पूरी ताक़त से किया.
रघुनाथ धोंडो कर्वे, महर्षि धोंडो केशव कर्वे के बेटे थे. महर्षि कर्वे ने अपना पूरा जीवन महिलाओं की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया था. उसी तरह रघुनाथ धोंडो कर्वे ने यौन शिक्षा को अपने जीवन का मक़सद बनाया.
अपने पिता की तरह वह भी गणित के प्रोफ़ेसर थे.
अगर कर्वे गणित के प्रोफ़ेसर के तौर पर अपना करियर जारी रखते, तो इसमें शायद ही कोई शक है कि वह एक जाने-माने प्रोफ़ेसर और शिक्षाविद बनते. लेकिन उन्होंने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना.
आज, 14 अक्तूबर को कर्वे की पुण्यतिथि है. इसी मौक़े पर उनके काम के बारे में बताने वाला यह लेख प्रकाशित किया जा रहा है.
रघुनाथ धोंडो कर्वे की पढ़ाई
इमेज स्रोत, Getty Images
रघुनाथ धोंडो कर्वे का जन्म 14 जनवरी 1882 को हुआ था. जब वह छोटे थे, तभी उनकी मां राधाबाई का निधन हो गया था.
कर्वे बचपन से ही कम बोलने वाले और अपने में रहने वाले स्वभाव के थे. वह गणित में बहुत अच्छे थे, लेकिन इतिहास और भूगोल में उनकी पकड़ उतनी मज़बूत नहीं थी.
इसलिए इतिहास और भूगोल की तैयारी कराई गई. गणित पर ख़ास ध्यान देते हुए उनसे पिछले 10 से 12 वर्षों के प्रश्नपत्र भी हल कराए गए.
इसका नतीजा यह हुआ कि 1899 में कर्वे ने दसवीं की परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया.
कर्वे बताते थे कि इसके इनाम के तौर पर उन्हें फ़र्ग्युसन कॉलेज के हॉस्टल में रहने की अनुमति मिली थी.
अगले पांच वर्षों तक उन्होंने फ़र्ग्युसन कॉलेज में पढ़ाई की और बीए की डिग्री हासिल की.
इसके बाद उन्होंने तुरंत एमए में दाख़िला लिया, लेकिन छात्रवृत्ति बंद हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में रुक गई.
बाद में उन्होंने मुंबई में एमए में दाख़िला लिया और 1911 में अपनी पढ़ाई पूरी की. इस बीच उन्होंने फ़्रेंच भाषा पर भी अच्छी पकड़ बना ली थी.
साल 1919 में वह गणित की आगे की पढ़ाई करने के लिए पेरिस गए. वहां से 1921 में अपनी डिग्री पूरी करके लौटे.
फ़र्ग्युसन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनकी दिलचस्पी यौन शिक्षा और गर्भनिरोध के विषयों में होने लगी थी. वह कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठकर इन विषयों का अध्ययन करने लगे.
उस दौर में उन्होंने ऐसे युवाओं को देखा था, जिनके यहां हर साल बच्चे पैदा होते थे या जो यौन रोगों का शिकार हो जाते थे.
कर्वे ने समाज में यौन शिक्षा की कमी को समझा
इमेज स्रोत, Randhokarve.com
कर्वे के जीवनीकार डॉक्टर अनंत देशमुख के मुताबिक़, इससे कर्वे को समझ आया कि ये समस्याएं यौन शिक्षा की कमी और गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल की जानकारी न होने के कारण पैदा हो रही थीं.
कर्वे ने सोलापुर हाईस्कूल में नौकरी की. इसके बाद उन्होंने एल्फ़िंस्टन कॉलेज और धारवाड़ के कर्नाटक कॉलेज समेत अलग-अलग जगहों पर काम किया.
साल 1921 में उन्होंने मुंबई के भटवाड़ी इलाक़े में ‘राइट एजेंसी’ नाम से गर्भनिरोध से जुड़ी सलाह देने वाला एक केंद्र भी शुरू किया. इस काम में उनकी पत्नी मालतीबाई ने उनका साथ दिया.
उस दौर में गर्भनिरोध के बारे में जागरूकता फैलाना अनैतिक, अधार्मिक और अश्लील माना जाता था. इसके बावजूद मालतीबाई इस काम में कर्वे के साथ खड़ी रहीं.
दिवाकर बापट ने कर्वे पर लिखी अपनी किताब ‘उपेक्षित द्रष्टा’ में इसका ज़िक्र किया है.
साल 1922 में कर्वे ने मुंबई के विल्सन कॉलेज में नौकरी शुरू की.
इस नौकरी में शामिल होने से ठीक पहले उन्होंने गर्भनिरोध पर एक पुस्तिका लिखी थी. लेकिन कोई भी प्रकाशक उसे प्रकाशित करने के लिए तैयार नहीं हुआ.
इसके बाद कर्वे ने अपने पास मौजूद पैसे इस काम में लगा दिए और 1923 में वह पुस्तिका ख़ुद प्रकाशित की.
कर्वे का यह काम कॉलेज प्रबंधन की नज़र में आना स्वाभाविक था.
शुरुआत में प्रबंधन को इससे कोई आपत्ति नहीं थी कि कर्वे अपनी नौकरी के समय के अलावा क्या काम करते हैं. लेकिन उनके काम का विरोध करने वाले लोगों ने कॉलेज प्रबंधन से शिकायतें करनी शुरू कर दीं.
आख़िरकार प्रबंधन ने कर्वे से कहा कि वह या तो यह काम छोड़ दें या नौकरी छोड़ दें.
कर्वे ने 1925 में नौकरी छोड़ दी.
नौकरी छोड़ने के बाद मुश्किल हालात में घर चलाया
नौकरी छोड़ने के बाद कर्वे के पास कमाई का कोई तय ज़रिया नहीं था.
घर चलाने के लिए उन्होंने टैक्सी चलाई, ट्यूशन पढ़ाई और कंघी व साबुन जैसी चीज़ें भी बेचीं.
कर्वे के साथ काम कर चुकीं शकुंतलाबाई परांजपे ने इसके बारे में लिखा है.
यह सब करते हुए भी कर्वे ने गर्भनिरोध के विषय पर काम करना बंद नहीं किया.
वह लोगों को केवल सलाह ही नहीं देते थे, बल्कि उन्हें गर्भनिरोध से जुड़ी चीज़ें भी उपलब्ध कराते थे.
कर्वे अपने निजी जीवन में भी इन बातों का पालन करते थे. वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे हों. इसलिए वह अपनी नसबंदी कराना चाहते थे.
उस समय भारत में कोई भी डॉक्टर यह ऑपरेशन करने के लिए तैयार नहीं था.
कर्वे के भाई नैरोबी में डॉक्टर थे. कर्वे वहां गए और अपनी नसबंदी का ऑपरेशन कराया.
महर्षि कर्वे विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे और इसके लिए काम करते थे. अपनी पहली पत्नी यानी रघुनाथ धोंडो कर्वे की मां के निधन के बाद महर्षि कर्वे ने एक विधवा से शादी की थी.
उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही अपने जीवन में करके भी दिखाया.
रघुनाथ धोंडो कर्वे भी इसी तरह अपनी बातों को अपने जीवन में अपनाते थे.
‘समाजस्वास्थ्य’ की शुरुआत
इमेज स्रोत, Arun Jakhade Padmagandha Prakashan
‘समाजस्वास्थ्य’ शुरू करने से पहले कर्वे अलग-अलग पत्रिकाओं में लेख लिखा करते थे.
लेकिन उनके विचार उस समय के हिसाब से इतने प्रगतिशील थे कि कई पत्रिकाएं उनके लेख वापस भेज देती थीं.
उस समय ‘किर्लोस्कर ख़बर’ को एक प्रगतिशील पत्रिका माना जाता था.
कर्वे का लिखा लेख ‘अमर्याद संतति’ इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. इसके बाद उन्होंने ‘विनय क्या है’ नाम से एक लेख भेजा, लेकिन संपादक ने उसे वापस कर दिया.
कर्वे के लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था.
इसके बाद उन्होंने अपनी पत्रिका शुरू करने का फ़ैसला किया.
पत्रिका शुरू करने के लिए कई तरह की तैयारियां करनी थीं. कर्वे ने ज़रूरी साधन जुटाने शुरू किए और 15 जुलाई 1927 को ‘समाजस्वास्थ्य’ की शुरुआत हुई.
पत्रिका के उद्देश्य के बारे में कर्वे ने लिखा था, “इस पत्रिका का उद्देश्य व्यक्ति और समाज के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य और उनसे जुड़े उपायों पर चर्चा करना है.”
“ख़ास तौर पर उन विषयों पर लेख छापने से दूसरे पत्रकार शर्माते या डरते हैं. ये विषय कितने भी महत्वपूर्ण क्यों न हों, सामान्य पाठकों के लिए इनके बारे में जानकारी हासिल करना बहुत मुश्किल होता है. हमारा विचार इस मुश्किल को दूर करना है.”
“इसमें केवल विचारों पर चर्चा नहीं की जाएगी, बल्कि रोज़मर्रा के काम की जानकारी भी दी जाएगी.”
पत्रिका के पहले अंक का पहला लेख ‘विनय क्या है’ था.
इसी लेख के वापस आने के बाद कर्वे ने अपनी पत्रिका शुरू करने का फ़ैसला किया था. इसलिए इसे प्रकाशित करने के साथ एक तरह से वह सिलसिला पूरा हो गया.
‘समाजस्वास्थ्य’ में किन विषयों पर लिखा जाता था?
‘समाजस्वास्थ्य’ में प्रकाशित लेखों की सूची देखने पर पता चलता है कि पत्रिका आकार में भले ही छोटी थी, लेकिन इसमें कई तरह के विषयों पर बहुत गहराई से लिखा जाता था.
आम लोगों की सेहत के लिए फ़ायदेमंद रसोई की साफ़-सफ़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध तक, इसमें सभी तरह की जानकारी होती थी.
कर्वे किसी मुद्दे को केवल सेहत के नज़रिए से नहीं देखते थे. वह उसे पूरे समाज को जागरूक करने के नज़रिए से देखते थे.
उनके पूरे काम की बुनियाद तर्क और समझ पर आधारित थी.
उन्होंने अपने जीवन और लेखन से यह संदेश दिया कि किसी भी बात को विज्ञान और तर्क की कसौटी पर परखे बिना स्वीकार नहीं करना चाहिए.
दिवाकर बापट अपनी किताब में लिखते हैं, “इसके बावजूद ‘समाजस्वास्थ्य’ केवल एक व्यक्ति के सहारे चलने वाला काम था.”
“पत्रिका के लेख लिखना, दूसरों से लेख लिखवाना, छपाई के लिए प्रति तैयार करना, प्रूफ़ देखना, अंक तैयार होने के बाद ग्राहकों के नाम वाली पर्चियां लगाकर उन्हें डाकघर में डालना और अलग-अलग विक्रेताओं तक उनकी प्रतियां पहुंचाना, ये सभी काम कर्वे तय समय के मुताबिक़ करते थे.”
“लगातार करते रहने के कारण उन्हें इन सभी कामों की आदत हो गई थी.”
‘समाजस्वास्थ्य’ के ख़िलाफ़ मुक़दमे
इमेज स्रोत, Kumar Gokhale
कर्वे को ऐसे बहुत से पत्र मिलते थे, जिनमें लोग बताते थे कि उन्हें ‘समाजस्वास्थ्य’ से फ़ायदा हो रहा है.
लोग चाहते थे कि उनकी शंकाओं का जवाब पत्रिका में दिया जाए.
लेकिन ‘समाजस्वास्थ्य’ में एक सूचना लिखी होती थी कि क़ानूनी मुश्किलों के कारण सभी बातें पत्रिका में नहीं लिखी जा सकतीं. इसलिए लोग अपनी समस्या के बारे में कार्यालय के पते पर अलग से पत्र भेजें.
उस दौर के लेखक और समाज सुधारक मामा वरेरकर, इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई, श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर और रैंगलर परांजपे ने कर्वे के काम का समर्थन किया था.
लेकिन उस समय के रूढ़िवादी लोगों ने कर्वे का कड़ा विरोध किया.
उनके ख़िलाफ़ अश्लीलता के मुक़दमे दर्ज किए गए.
‘व्यभिचार के प्रश्न’ नाम के लेख को लेकर पहली बार उन पर मुक़दमा किया गया. इस मामले में उन पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया गया था.
इसके बाद कर्वे के ख़िलाफ़ एक और मुक़दमा दर्ज हुआ.
दूसरे मुक़दमे में डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर ने उनके वकील के रूप में मुक़दमा लड़ा था. इस बार कर्वे पर 200 रुपये का जुर्माना लगाया गया.
बीबीसी मराठी ने इस मुक़दमे पर अलग से एक लेख प्रकाशित किया है, जिसे यहां पढ़ा जा सकता है.
इस मुक़दमे पर अजित दलवी ने एक नाटक भी लिखा था, जिसका निर्देशन अतुल पेठे ने किया. इस नाटक का मंचन भी हो चुका है.
महिलाओं की आज़ादी और अधिकारों की वकालत
कर्वे ने महिलाओं की आज़ादी का समर्थन किया.
वह मानते थे कि महिलाओं को पुरुष प्रधान संस्कृति को आगे बढ़ाने वाला नहीं बनना चाहिए.
‘र. धों. कर्वे और स्त्री लैंगिकता’ नाम के लेख में लेखिका डॉक्टर अंजलि जोशी लिखती हैं, “कर्वे ने महिला को एक ‘व्यक्ति’ मानते हुए मानवीय नज़रिए से उसके बारे में सोचा. उनकी यही सोच उन्हें और ऊंचा दर्जा देती है.”
“उन्होंने लैंगिकता के मामले में महिला और पुरुष के बीच भेद नहीं किया. उन्होंने दोनों को एक व्यक्ति और इंसान के रूप में देखा.”
डॉक्टर जोशी लिखती हैं, “इसी वजह से कर्वे ने महिलाओं की लैंगिकता पर जानबूझकर अलग से नहीं लिखा.”
“उन्हें महिलाओं का अपना अलग समूह बनाना और उस समूह के लिए अलग मांगें रखना पसंद नहीं था.”
“उनका कहना था कि इससे महिलाओं में दूसरों की सहानुभूति पाने और ख़ुद को शोषित समझने की सोच बढ़ती है. इससे उनके कमज़ोर होने की भावना को और बढ़ावा मिलता है.”
कर्वे के विचार आज कितने ज़रूरी हैं, इस बारे में डॉक्टर जोशी कहती हैं, “हम आज भी उसी जगह पर हैं, जहां सौ साल पहले थे. बल्कि हम कुछ क़दम पीछे ही चले गए हैं.”
“आज भी वैसा ही अंधेरा है. बल्कि यह अंधेरा पहले से अधिक गहरा हो गया है.”
“इस अंधेरे में रास्ता तलाशकर आगे बढ़ने के लिए कर्वे की ताक़तवर लेखनी आज हमारे बीच नहीं है.”
“तर्क और विवेक की मशाल हर दिन कमज़ोर होती जा रही है. उसे जलाए रखने के लिए सौ साल पहले के समाज को कर्वे की जितनी ज़रूरत थी, उससे कहीं ज़्यादा आज के समाज को है.”
रघुनाथ धोंडो कर्वे का निधन 14 अक्तूबर 1953 को 71 साल की उम्र में हुआ.
उनके निधन के बाद ‘समाजस्वास्थ्य’ का प्रकाशन बंद हो गया. लेकिन उन्होंने जो बड़ी मात्रा में साहित्य लिखा, वह समाज के स्वास्थ्य का एक दस्तावेज़ बन गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
SOURCE : BBC NEWS




