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जबल अल-शेख़ में नेतन्याहू ने क्यों कहा- यहां से नहीं हटेंगे इसराइली सैनिक

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Source :- BBC INDIA

नेतन्याहू ने जबल अल-शेख़ की यात्रा का एक वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट X पर पोस्ट किया. यह तस्वीर उसी वीडियो से ली गई है.

इमेज स्रोत, Benjamin Netanyahu/ X

इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने जबल अल-शेख़ में तैनात इसराइली सैनिकों से मुलाक़ात के दौरान कहा कि इसराइल ईरान में “सत्ता को गिराने के बहुत क़रीब” पहुंच चुका है, अगर ऐसा हुआ तो “ये पूरी धुरी बिखर जाएगी.”

बशर अल-असद की सत्ता गिरने के बाद इसराइली सेना दक्षिणी सीरिया में दाख़िल हो गई थी, और तब से अब तक सीरियाई सैन्य ठिकानों पर सैकड़ों हवाई हमले कर चुकी है.

इसराइल के रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज़ ने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा को सीधे संबोधित किया. उन्होंने दमिश्क में सीरियाई नेतृत्व को संदेश दिया कि इसराइली सैनिक बफ़र ज़ोन में बने रहेंगे और वहां से पीछे नहीं हटेंगे.

सीरियाई विदेश मंत्रालय ने नेतन्याहू की इस यात्रा की निंदा की और उनके सीरियाई क्षेत्र में दाख़िल होने को “ग़ैरक़ानूनी,” “उकसाने वाला” और सीरिया की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताया.

जबल अल-शेख़ में इसराइली सेना.

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जबल अल-शेख़ है क्या और क्यों इतना ज़रूरी है?

जबल अल-शेख़, जिसे माउंट हरमन भी कहा जाता है, सीरिया और लेबनान की सीमा पर स्थित एक रणनीतिक अहमियत वाला पहाड़ है, जहां से दक्षिणी सीरिया, लेबनान और उत्तरी इसराइल के बड़े हिस्सों पर नज़र रखी जा सकती है.

यह पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम में सीरिया के बानियास और हूला मैदान से लेकर उत्तर-पूर्व में वादी अल-क़र्न तक फैली हुई है, और यह पूर्वी लेबनान पर्वत श्रृंखला का एक अहम हिस्सा है, जो लेबनान और सीरिया की सीमाओं के साथ-साथ चलती है.

इस पहाड़ के पूरब और दक्षिण में वादी अल-अजम, बिलान क्षेत्र, दमिश्क़ के पश्चिम के गांव, और क़ब्ज़े वाला गोलान इलाक़ा स्थित हैं. वहीं उत्तर और पश्चिम में लेबनान का बक़ाआ मैदान का दक्षिणी हिस्सा और वादी अल-तीम भी मौजूद हैं.

जबल अल-शेख़ की चार चोटियां हैं. इनमें सबसे ऊंची चोटी 2,814 मीटर ऊंची है. पश्चिम में दूसरी चोटी 2,294 मीटर, दक्षिण में तीसरी चोटी 2,236 मीटर, और पूरब में चौथी चोटी 2,145 मीटर ऊंची है.

“जबल अल-शेख़” नाम इसकी बर्फ़ से ढंकी चोटी से जुड़ा है, जो किसी बुज़ुर्ग के सफ़ेद बालों जैसा दिखता है. अरब इतिहासकार इसे “बर्फ़ का पहाड़” भी कहते थे. जबल अल-शेख़ का एक और नाम “माउंट हरमन” भी है.

माउंट हरमन लेवांत क्षेत्र का सबसे मशहूर पहाड़ है. यह सीरिया और लेबनान के बीच स्थित है, इसराइल के कुछ हिस्सों पर नज़र रखता है, और यह जॉर्डन से भी दिखाई देता है. “हरमन” नाम की जड़ें कनानी भाषा में हैं, जिसका अरबी में मतलब है “पवित्र स्थान” या “पावन.”

देश की आंख

इसराइल में इस पहाड़ को 'देश की आंख' भी कहा जाता है.

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इसराइल में इस पहाड़ को ‘देश की आंख’ भी कहा जाता है. इसकी ऊंचाई की वजह से यह जगह इसराइल की मुख्य अर्ली वॉर्निंग व्यवस्था के लिए बेहद अहम और रणनीतिक मानी जाती है. यह व्यवस्था 2,280 मीटर की ऊंचाई पर लगाई गई है और किसी संभावित ख़तरे की पहले ही चेतावनी देती है.

इसराइल के रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज़ ने अपने पिछले दौरे में कहा था कि उन्होंने सेना को पूरी सर्दियों के दौरान जबल अल-शेख़ की चोटी पर मौजूद रहने के लिए तैयार रहने का आदेश दिया है.

उन्होंने कहा कि सीरिया में चल रहे घटनाक्रम को देखते हुए जबल अल-शेख़ की चोटी पर इसराइली सेना का नियंत्रण बनाए रखना सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद अहम है.

रणनीतिक मामलों के जानकार अला अल-असफ़री ने बीबीसी को बताया कि जबल अल-शेख़ सीरिया का सबसे ऊंचा स्थान है. यहां से लेबनान, सीरिया और इसराइल के बड़े हिस्से दिखाई देते हैं. इसलिए आसपास के इलाक़ों पर नज़र रखने के लिए इसकी रणनीतिक जगह बेहद अहम है.

उनका कहना है कि इसराइल ने अपने लिए एक ‘सुरक्षित इलाक़ा’ बनाने के मक़सद से इस जगह पर कब्ज़ा किया है. यह इलाक़ा क़ुनेत्रा और दमिश्क के आसपास के इलाक़ों तक फैला है.

अला अल-असफ़री कहते हैं, ‘इस इलाक़े पर इसराइल का नियंत्रण होने का मतलब है कि उसकी नज़र सभी ठिकानों पर रहेगी. वह रडार से लेकर कैमरों तक, निगरानी के आधुनिक उपकरण लगा सकता है और लगातार पूरे इलाक़े पर नज़र रख सकता है.’

जबल अल-शेख़ को सीरिया की ‘दक्षिणी सुरक्षा पट्टी’ भी माना जाता है. सुरक्षा के लिहाज़ से इसका ख़ास महत्व है. इसकी अहमियत उस समय और चर्चा में आई, जब इसराइल काट्ज़ ने इसराइली सैनिकों को पूरी सर्दियों के दौरान इस इलाक़े में बने रहने का आदेश दिया.

कुछ जानकारों का मानना है कि इसराइल भविष्य में इस इलाक़े को अपने क्षेत्र में शामिल करने की कोशिश भी कर सकता है.

अला अल-असफ़री का मानना है कि सीरिया के हथियारबंद विरोधी गुट फ़िलहाल अपने पड़ोसी देशों से टकराव से बच रहे हैं. लेकिन उनके मुताबिक़, इसराइल का नियंत्रण होने के बाद सीरिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की सोच ख़त्म हो सकती है.

इसराइल का क्षेत्र बढ़ सकता है और सीरिया के बंटवारे के ज़रिए ‘नया मध्य पूर्व’ बनाने की इसराइली प्रधानमंत्री की योजना पूरी हो सकती है.

उनके मुताबिक़, यह पहाड़ बेहद महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के ऊपर स्थित है. इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहां से लगभग पूरा सीरिया, लेबनान के बड़े हिस्से और समुद्र किनारे बसा बनियास शहर दिखाई देता है. वह इस पहाड़ को सीरिया, लेबनान और इसराइल की साझा सीमाओं के लिए रणनीतिक जगह मानते हैं.

अला अल-असफ़री कहते हैं, “इसराइल की नज़र पूरे सीमा त्रिकोण पर होगी और इसका असर इस इलाक़े की सुरक्षा पर पड़ेगा.”

उनका यह भी मानना है कि ‘इस इलाक़े पर लंबे समय तक कब्ज़ा रहने से सीरिया और उसकी नई सरकार की स्थिरता कमज़ोर होगी.’

इस पहाड़ से सीरिया में दमिश्क, शाम का रेगिस्तानी इलाक़ा, गोलान और हौरान के मैदान दिखाई देते हैं. इसके अलावा अल-ख़लील के पहाड़, तिबेरियास झील, हौला का मैदान और जॉर्डन के इरबिद प्रांत का एक हिस्सा भी यहां से दिखाई देता है. दक्षिणी लेबनान, पश्चिमी लेबनान की पर्वत शृंखला और बेक़ा घाटी भी इसके सामने हैं.

यह पहाड़ सीरिया की राजधानी दमिश्क से करीब 39 किलोमीटर दूर है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक़ यह स्थिति कब्ज़े की मानी जाती है. इस वजह से दमिश्क पर इसराइली हमलों का ख़तरा बना रहता है.

प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर

जबल अल-शेख़ की चोटी.

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जबल अल-शेख़ इस क्षेत्र की सबसे अहम भौगोलिक जगहों में से एक है. यह प्राकृतिक संसाधनों से भी भरपूर है. इसकी ऊंचाई की वजह से यहां बारिश और बर्फ़ बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ता है. यह पहाड़ पूरे इलाक़े के जल स्रोतों के लिए भी अहम भूमिका निभाता है.

जल विज्ञान के प्रोफ़ेसर इलियास सलामेह कहते हैं कि जबल अल-शेख़ वाला इलाक़ा सीरिया के सबसे ऊंचे प्राकृतिक इलाक़ों में से एक है. इस पहाड़ और इसके आसपास के इलाक़ों में हर साल बड़ी मात्रा में बारिश और बर्फ़ पड़ती है.

यह पहाड़ ज़मीन के नीचे मौजूद पानी और आसपास के झरनों को पानी देने में भी अहम भूमिका निभाता है. इनमें हसबानी और बनियास नदियां भी शामिल हैं.

इलियास सलामेह कहते हैं कि जिस पक्ष का इस इलाक़े पर नियंत्रण होगा, वह सतह और ज़मीन के नीचे मौजूद जल स्रोतों को नियंत्रित कर सकता है.

हालांकि, उनका कहना है कि आधिकारिक बयानों के मुताबिक़ इसराइल का नियंत्रण अस्थायी और सैन्य मक़सद के लिए होगा. इसका मक़सद ज़्यादा जल स्रोतों पर कब्ज़ा करना नहीं है.

जल मामलों के जानकार इलियास सलामेह के मुताबिक़, जबल अल-शेख़ की बर्फ़ से ढंकी चोटियों पर जमी बर्फ़ पिघलने के बाद चट्टानों की दरारों और रास्तों से नीचे बहती है. इससे पहाड़ की ढलानों पर मौजूद झरनों को पानी मिलता है.

जबल अल-शेख़ में वसंत के मौसम में भी बर्फ़बारी होती है. इसी वजह से इसकी चोटियां साल के ज़्यादातर दिनों में बर्फ़ से ढंकी रहती हैं.

बर्फ़ की सीमा से नीचे इस इलाक़े की ज़मीन बहुत उपजाऊ है और यहां पेड़-पौधे भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. यहां अंगूर के बाग़ और चीड़, ओक और सनोबर के पेड़ बड़ी संख्या में हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अंतरराष्ट्रीय और रणनीतिक मामलों के जानकार अनस अल-क़सास कहते हैं कि इस ऊंची चोटी पर नियंत्रण रखने वाली ताक़त सभी दिशाओं में 300 किलोमीटर से भी अधिक दूरी तक निगरानी कर सकती है. वह वहां होने वाली गतिविधियों पर नज़र रखने, उन्हें पकड़ने और उनमें रुकावट डालने की क्षमता भी हासिल कर सकती है. उनके मुताबिक़ इससे चारों तरफ़ मौजूद सीरिया, लेबनान, इसराइल और जॉर्डन के लिए ख़तरा पैदा होता है.

जून 1967 की जंग में इसराइली सैनिकों ने जबल अल-शेख़ की चोटी पर कब्ज़ा कर लिया था. उन्होंने वहां एक अर्ली वॉर्निंग यूनिट तैनात की थी. इसका काम इलेक्ट्रॉनिक और संचार गतिविधियों का पता लगाना और उन पर नज़र रखना था. इसमें ख़ास तौर पर दमिश्क आने और वहां से जाने वाले संचार शामिल थे.

लेकिन अक्तूबर 1973 की जंग शुरू होने के बाद सीरियाई सैनिकों ने इस इलाक़े पर दोबारा नियंत्रण कर लिया. सोवियत संघ ने भी जबल अल-शेख़ की चोटी पर लगे अर्ली वॉर्निंग सिस्टम हटाकर उन्हें मॉस्को भेज दिया.

इसके बाद इसराइली सैनिकों ने उस लड़ाई में पहाड़ की चोटी पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया, जिसे “जबल अल-शेख़ की दूसरी लड़ाई” कहा जाता है. यह स्थिति मई 1974 तक बनी रही. इसके बाद सीरिया और इसराइल के बीच सैनिकों को अलग करने के समझौते के तहत यह इलाक़ा सौंप दिया गया.

इस समझौते के मुताबिक़, सीरिया का इलाक़ा ‘ए’ पर नियंत्रण है. यह क्षेत्र उत्तर में जबल अल-शेख़ की चोटी से लेकर दक्षिण में सीरिया-जॉर्डन सीमा पर मौजूद रक़ाद तक फैला है. इलाक़े ‘बी’ और ‘सी’ में संयुक्त राष्ट्र के निगरानी बलों और इसराइली सैनिकों की तैनाती की जगह तय की गई है. सीमा पर स्थित शेबा फ़ार्म्स की विशेष स्थिति भी इसी व्यवस्था के तहत तय की गई है.

अल-क़सास के मुताबिक़, पिछले कई वर्षों में इस समझौते का कई बार उल्लंघन किया गया है. इसमें सैन्य हथियारों का स्तर बढ़ाना और समझौते में तय सीमा से सैकड़ों मीटर आगे बढ़ना शामिल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS