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सुबह या शाम टहलने के बाद बहुत से लोग दाल, चना, मटर और दूसरी फलियां खाना पसंद करते हैं.
लोग इन्हें प्रोटीन और फ़ाइबर से भरपूर सेहतमंद खाना मानकर ख़रीदते और खाते हैं. कई पार्कों के बाहर मटर, चना, दूसरी फलियां और सोया बेचने वाली छोटी दुकानें भी दिखाई देती हैं.
लेकिन चना, मटर और दाल में वास्तव में कितना प्रोटीन होता है? इन्हें खाने से कुछ लोगों को गैस और पेट फूलने की परेशानी क्यों होती है? इस परेशानी को कैसे कम किया जा सकता है?
विशेषज्ञों की राय और अलग-अलग अध्ययनों के आधार पर इस लेख में इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश करते हैं.
दाल, चना और मटर में वास्तव में कितना प्रोटीन होता है?
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अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ के मुताबिक़, “दाल, चना और मटर जैसी चीज़ें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फ़ाइबर, विटामिन और खनिजों का अच्छा ज़रिया हैं.”
“दुनिया भर में बहुत से लोग अनाज के साथ इन्हें अपने मुख्य खाने में शामिल करते हैं. वे अपनी प्रोटीन की ज़रूरत पूरी करने के लिए भी इन पर निर्भर रहते हैं.”
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ के मुताबिक़, अनाज के बाद दाल, चना और मटर दुनिया में सबसे ज़्यादा खाई जाने वाली चीज़ों में शामिल हैं.
संस्था का कहना है, “ये ख़ास तौर पर विकासशील और कम विकसित देशों में रहने वाले ग़रीब लोगों के लिए खाने का एक अहम ज़रिया हैं.”
“इनमें अनाज के मुक़ाबले दोगुना प्रोटीन होता है.”
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रिशन यानी एनआईएन और इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर के आंकड़ों के मुताबिक़, 100 ग्राम दाल में औसतन 22 से 24 ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें 323 कैलोरी होती हैं.
लेकिन डाइटिशियन अरुण कुमार कहते हैं, “22 से 24 ग्राम प्रोटीन कच्ची दाल में होता है. दाल पकने के दौरान पानी सोख लेती है. इसलिए पकने के बाद इसमें प्रोटीन की मात्रा बदल जाती है.”
“100 ग्राम उबली हुई दाल में केवल आठ से नौ ग्राम प्रोटीन होता है.”
क्या यह वज़न कम करने वालों के लिए फ़ायदेमंद है?
डॉक्टर अरुण कुमार कहते हैं, “चावल और गेहूं जैसे अनाज में भी 330 से 350 कैलोरी होती हैं. दाल, चना और मटर जैसी चीज़ों में औसतन 323 कैलोरी होती हैं.”
“इसलिए चावल और गेहूं जैसे अनाज और दालों में कैलोरी की मात्रा का बहुत बड़ा अंतर नहीं है.”
वह बताते हैं, “ज़्यादातर दालों और फलियों में हर 100 ग्राम में करीब 60 से 62 ग्राम स्टार्च यानी कार्बोहाइड्रेट होता है.”
“चावल में करीब 75 ग्राम, गेहूं में करीब 72 ग्राम और छोटे अनाज में करीब 65 से 66 ग्राम स्टार्च होता है. इसका मतलब है कि अनाज के मुक़ाबले दालों और फलियों में स्टार्च केवल 10 से 15 फ़ीसदी कम होता है.”
अमेरिका का नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ भी कहता है कि दालों और फलियों में 60 से 65 फ़ीसदी कार्बोहाइड्रेट होता है.
लेकिन डॉक्टर अरुण कुमार कहते हैं, “इनमें करीब 15 ग्राम ऐसा स्टार्च होता है, जिसे हमारा शरीर पचा नहीं पाता. यह स्टार्च कैलोरी या ग्लूकोज़ में नहीं बदलता.”

“अगर इस न पचने वाले स्टार्च को हटा दें तो करीब 45 ग्राम ऐसा स्टार्च बचता है, जिसे शरीर पचा सकता है. इसलिए दालें और फलियां चावल और गेहूं के मुक़ाबले ख़ून में शुगर का स्तर थोड़ा कम बढ़ाती हैं.”
साल 2021 में 2,102 लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन में भी पता चला कि दालें और फलियां खाने से भोजन के बाद ख़ून में शुगर बढ़ने की रफ़्तार कम होती है.
डॉक्टर अरुण कुमार के मुताबिक़, “अगर आप वज़न कम करने के लिए दालों और फलियों को अपने खाने में शामिल करना चाहते हैं तो इन्हें स्टार्च वाली दूसरी चीज़ों की जगह खा सकते हैं.”
“लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि आप इन्हें कितनी मात्रा में खा रहे हैं. अगर आप अपने रोज़ के खाने के अलावा शाम के नाश्ते में भी चना खाते हैं तो इससे वज़न कम करने में कोई ख़ास मदद नहीं मिलेगी.”
“डायबिटीज़ वाले लोगों में दालों और फलियों से ख़ून में शुगर का स्तर चावल और गेहूं के मुक़ाबले कम बढ़ता है. हालांकि, जिन लोगों की डायबिटीज़ ज़्यादा गंभीर है, उन्हें इन्हें अपने खाने में सीमित मात्रा में शामिल करने पर विचार करना चाहिए.”
क्या दालें मांस और अंडे से मिलने वाले प्रोटीन की जगह ले सकती हैं?
हमें अलग-अलग तरह के खाने से प्रोटीन मिलता है. लेकिन केवल यह देखना काफ़ी नहीं है कि खाने में कितना प्रोटीन है.
यह भी मायने रखता है कि शरीर उस प्रोटीन का कितनी अच्छी तरह इस्तेमाल कर सकता है. इसे प्रोटीन की जैविक गुणवत्ता कहा जाता है और यह उसमें मौजूद अमीनो एसिड पर निर्भर करती है.
अमीनो एसिड वे हिस्से हैं, जिनसे प्रोटीन बनता है.
यूरोपियन फूड इन्फ़ॉर्मेशन काउंसिल के मुताबिक़, “आमतौर पर पौधों से मिलने वाले प्रोटीन के मुक़ाबले जानवरों से मिलने वाले प्रोटीन की जैविक गुणवत्ता ज़्यादा होती है.”
पोषण विशेषज्ञ तारिणी कृष्णन कहती हैं, “प्रोटीन की जैविक गुणवत्ता से पता चलता है कि शरीर खाने में मौजूद प्रोटीन का कितनी अच्छी तरह इस्तेमाल करता है और उसे इंसानी शरीर के लिए ज़रूरी प्रोटीन में बदलता है.”
वह बताती हैं, “जानवरों से मिलने वाले प्रोटीन में मांस, चिकन, मछली, अंडे, दूध, चीज़ और दही शामिल हैं. इनसे अच्छी जैविक गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है.”
“वहीं पौधों, दालों, फलियों, अनाज, मेवों, बीजों और सब्ज़ियों से मिलने वाले प्रोटीन की जैविक गुणवत्ता कम होती है.”
दूसरी ओर तारिणी कृष्णन कहती हैं, “कुछ दालों में ऐसे अमीनो एसिड होते हैं, जो चावल और दूसरे अनाज में नहीं होते.”
“इसलिए दोनों को सही मात्रा में एक साथ खाया जाए तो उनसे पूरा प्रोटीन मिल सकता है. शाकाहारी खाना खाने वाले लोगों के लिए यह फ़ायदेमंद है. उदाहरण के लिए, दाल और चावल को एक साथ खाना.”
डॉक्टर अरुण कुमार भी कहते हैं, “चिकन, अंडे और मेवों के मुक़ाबले दालें और फलियां ख़ून में शुगर के स्तर को दो से तीन गुना ज़्यादा बढ़ाती हैं.”
“दालों और फलियों से मिलने वाले हर एक ग्राम प्रोटीन के साथ ढाई से तीन ग्राम अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट भी मिलता है.”
“इसलिए केवल दालों और फलियों को मांस और अंडे की तरह पूरा प्रोटीन देने वाला खाना नहीं कहा जा सकता.”
इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं, “100 ग्राम चिकन में 28 ग्राम प्रोटीन होता है, लेकिन उसमें कार्बोहाइड्रेट बिल्कुल नहीं होता.”
दाल, चना और मटर खाने से गैस क्यों बनती है?
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दालों और फलियों में प्रोटीन होता है. लेकिन एक अध्ययन के मुताबिक़, इनमें रैफिनोज़ ओलिगोसैकराइड नाम का एक ख़ास तरह का कार्बोहाइड्रेट भी ज़्यादा मात्रा में होता है.
इसकी वजह से इंसानों और एक पेट वाले जानवरों में गैस हो सकती है.
डॉक्टर अरुण कुमार इसे समझाते हुए कहते हैं, “हमारे शरीर में वह एंज़ाइम नहीं होता, जो दालों और फलियों में मौजूद रैफिनोज़ नाम के इस कार्बोहाइड्रेट को पचा सके.”
“इसलिए हमारे पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया इसे पचाते हैं. इस दौरान बड़ी मात्रा में मीथेन जैसी गैस बनती है.”
वह यह भी कहते हैं, “जो लोग नियमित रूप से दालें और फलियां खाते हैं, उनके शरीर में बिफ़िडोबैक्टीरियम नाम के अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढ़ जाती है. इससे खाना पचने की प्रक्रिया बेहतर होती है.”
“इसलिए कोई व्यक्ति बिना गैस की परेशानी के दालों और फलियों को पचा पाएगा या नहीं, यह उसकी सेहत पर निर्भर करता है.”
तारिणी कृष्णन कहती हैं कि दालें और फलियां खाने से हर व्यक्ति को गैस या पेट फूलने की परेशानी नहीं होती.
वह कहती हैं, “हर व्यक्ति का शरीर खाने को अलग तरह से पचाता है. इसलिए दालों और फलियों को ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खाना चाहिए.”
गैस की परेशानी कैसे कम की जा सकती है?
दाल को पानी में भिगोने पर उसमें मौजूद कुछ कार्बोहाइड्रेट पानी में घुल जाते हैं. इनमें ख़ास तौर पर रैफिनोज़ ओलिगोसैकराइड शामिल है, जिससे गैस बन सकती है.
एक अध्ययन में दालों को भिगोकर उनका पानी फेंक दिया गया. इसके बाद गैस बनाने वाले इन कार्बोहाइड्रेट की मात्रा में कमी देखी गई.
दाल भिगोने से गैस बनाने वाले रैफिनोज़ नाम के कार्बोहाइड्रेट में करीब 25 फ़ीसदी कमी आई.
इसी तरह स्टैकियोज़ में करीब 25 फ़ीसदी और वर्बास्कोज़ में करीब 42 फ़ीसदी कमी आई.
डॉक्टर अरुण कुमार कहते हैं, “दालों और फलियों को लंबे समय तक भिगोने के बाद उनका पानी फेंककर पकाया जाए तो गैस की परेशानी वाले लोगों को कुछ राहत मिल सकती है.”
दूसरा तरीक़ा दालों और फलियों को अंकुरित करके खाना है. उदाहरण के लिए, साबुत मूंग को अंकुरित करके खाया जा सकता है.
अरुण कुमार कहते हैं, “अगर इन्हें अंकुरित करने के बाद उबालकर खाया जाए तो अंकुर निकलने के दौरान मुश्किल से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट टूटकर आसानी से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट में बदल जाते हैं.”
“इससे इन्हें पचाना आसान हो जाता है और गैस भी कम बनती है.”

एक अध्ययन के मुताबिक़, दालों और फलियों में खमीर उठाने की प्रक्रिया के दौरान ऐसे तत्वों में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा की कमी आती है, जो शरीर को पोषक तत्व सोखने से रोकते हैं.
इस प्रक्रिया के दौरान शरीर में काम आने वाले सक्रिय पेप्टाइड भी बनते हैं. पेप्टाइड प्रोटीन के छोटे हिस्से होते हैं.
दालों और फलियों को अंकुरित करने से उनमें मौजूद प्रोटीन को पचाना आसान हो जाता है. वहीं इन्हें भिगोने से पानी में घुलने वाले फ़ाइबर की मात्रा 33 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है.
अरुण कुमार कहते हैं, “इडली और डोसे में दाल होती है. बहुत से लोग दाल को डोसे के रूप में खाते हैं, क्योंकि इससे उन्हें गैस नहीं होती.”
इसकी वजह समझाते हुए वह कहते हैं, “दालों और फलियों को पीसकर उनका घोल बनाया जाता है और उसमें खमीर उठने दिया जाता है. इस दौरान उसमें मौजूद बैक्टीरिया और यीस्ट मुश्किल से पचने वाले कुछ कार्बोहाइड्रेट को तोड़ देते हैं.”
“इससे गैस और पेट की परेशानी निश्चित रूप से कम हो सकती है.”
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