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दिल्ली के सत्य निकेतन मार्केट इलाक़े में रविवार दोपहर एक पांच मंज़िला इमारत ढह गई, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले कई स्टूडेंट के दबे होने की आशंका जताई जा रही है.
दिल्ली पुलिस ने अब तक तीन लोगों के मौत की पुष्टि की है जबकि बचाए गए सात लोगों को एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया है.
पुलिस ने बताया कि रविवार को दोपहर 1.30 बजे बहुमंज़िला इमारत के ढहने की सूचना मिली थी. इसके बाद दमकल विभाग, पुलिस, एनडीआरएफ़ की टीमों को राहत और बचाव कार्य के लिए भेजा गया.
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी मौक़ें पर पहुंचीं. उन्होंने मीडिया से बताया कि इमारत के बेसमेंट में खुदाई चल रही थी, जिस कारण पिलर हिला और बिल्डिंग गिर गई.
घटना को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई नेताओं ने संवेदना जताई है.
बीबीसी संवाददाता शुभ राणा ने घटनास्थल पर मौजूद कुछ चश्मदीद स्टूडेंट से बात की जिनके कुछ परिचित हादसे वाली इमारत में रहते थे.
अधिकांश स्टूडेंट के बयानों से पता चला कि सत्य निकेतन में ज़्यादातर इमारतें 4 या 5 मंज़िला हैं. अलग-अलग राज्यों से आकर पास में रहने वाले स्टूडेंट डर में हैं.
कुछ स्टूडेंट ने कहा, “हम अगला निशाना हो सकते हैं और इस घटना के बाद हमारे माता-पिता हमें वापस घर बुला रहे हैं.”
स्टूडेंट्स ने क्या बताया

दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस में वेंकटेश्वर कॉलेज के स्टूडेंट सवाई शर्मा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि कॉलेज में हॉस्टल न मिलने के कारण बहुत से स्टूडेंट पीजी में रहते हैं.
उन्होंने कहा, “मेरा एक दोस्त हादसे वाली बिल्डिंग में रहता था, जो बाल बाल बच गया है. मैं अक्सर उसके यहां खाना खाने जाता था लेकिन आज मैं संयोग से बाहर था. यहां हॉस्टल की समस्या बहुत है.”
सवाई शर्मा ने कहा, “सोशियोलॉजी ऑनर्स में 75 स्टूडेंट हैं लेकिन केवल दो बच्चों को ही हॉस्टल में सीट मिलती है. बाकी सारे बच्चे यहां रहते हैं. यहां पर बेड के लिए 18 हज़ार रुपये लगते हैं. यहां रहना बच्चों की मजबूरी है.”
एक अन्य स्टूडेंट दीपेंद्र सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए दावा किया, “इस इमारत को एक साल पहले ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था. लेकिन 2026 में बच्चों का जब नया बैच आया तो बच्चे यहां फिर से रहने लगे. पता नहीं कैसे इसे ओपन कर दिया गया.”
हालांकि इस दावे की बीबीसी पुष्टि नहीं करता है.
दीपेंद्र सिंह ने आगे कहा, “कोई भी अथॉरिटी यहां कुछ नहीं करती. अगर एक कमेटी बनाकर जांच बैठाई जाए तो सत्य निकेतन इलाक़े में कई ऐसी इमारतें निकलेंगी जिन्हें तुरंत सीज़ कर दिया जाएगा.”
दीपेंद्र ने बताया, “यह बहुत भीड़भाड़ वाला इलाक़ा है और 10 मिनट की बारिश में घुटने तक पानी भर जाता है, जबकि यह साउथ कैंपस का केंद्र माना जाता है क्योंकि यहां 50,000 से अधिक बच्चे रहते हैं. 100 से ज़्यादा पीजी हॉस्टल हैं.”
साहिल नाम के एक अन्य स्टूडेंट ने कहा कि विश्वविद्यालय में हॉस्टल की सुविधा नहीं है. यहां सारी इमारतों की स्थिति एक जैसी है.
उन्होंने बताया कि हादसे वाली इमारत के अंदर उनके मोतीलाल और रामलाल कॉलेज के दोस्त रहते थे.
एक स्टूडेंट स्वाति ने बताया, “इस इमारत में बहुत से स्टूडेंट्स रहते थे. यह इसलिए गिरी क्योंकि बेसमेंट में काम चालू कर दिया था और पिलर्स मजबूत नहीं थे.”
एक अन्य स्टूडेंट आद्या ने बताया, “यहां की समस्या पर तब बात होती है जब डूसू के चुनाव होते हैं. वादा किया जाता है कि अच्छा एकोमोडेशन होंगे, अच्छी सुविधाएं होंगी. अगर हमारे कॉलेज हमें हॉस्टल दें तो बच्चे शायद ऐसी संकरी जगहों पर न रहें.”
उन्होंने बताया कि उनके पैरेंट्स बहुत चिंतित हैं क्योंकि इससे पहले उनके ही पीजी के एसी में आग लग गई थी.
‘आधे एक घंटे तक पुलिस नहीं पहुंची’

रामलाल आनंद के छात्र शिवम यादव के एक दोस्त नीरज बावा हादसे वाली बिल्डिंग में रहते थे. हादसे के वक्त नीरज अपने कमरे में थे.
शिवम यादव ने बताया, “वो मोतीलाल नेहरू कॉलेज के स्टूडेंट हैं. हादसे के वक़्त वो इमारत में ही थे तीसरी मंज़िल पर. उन्हें रेस्क्यू किया गया है और अस्पताल भेजा गया है. वो जम्मू के रहने वाले हैं.”
शिवम यादव ने कहा, “सत्य निकेतन में अधिकांश इमारतें ओवरलोडेड हैं. साउथ कैंपस के जो पांच कॉलेज हैं उसके सारे बच्चे सत्य निकेतन में रहते हैं. और इमारतों की हालत बहुत जर्जर है. कोई जांच भी नहीं की जाती है. कोई रूल्स या गाइडलाइंस नहीं है यहां पर. चार-चार पांच-पांच इंच की दीवार पर पूरी इमारत खड़ी कर दी गई है.”
शिवम यादव ने दावा किया कि इमारत के मलबे में 50 बच्चे फंसे हुए हैं.
एक छात्र ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि जब इमारत गिरी तो वो अपने दोस्तों के साथ चाय पी रहे थे.
उन्होंने बताया, “यहां आधे एक घंटे तक कोई भी पुलिस प्रशासन नहीं पहुंचा था. हमने अपने हाथ से मलबा हटाने की कोशिश की. यहां कोई नियम क़ायदा नहीं है कि पीजी में कितने बच्चे रहेंगे, इमारत की हालत क्या है.”
एक अन्य स्टूडेंट ने कहा, “बच्चे इतनी दूर से पढ़ने आते हैं, उनके लिए किसी की भी जवाबदेही नहीं है.”
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