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‘दृश्यम’ का तिलिस्म: क्यों बार-बार खिंचे चले आते हैं दर्शक?

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Source :- BBC INDIA

18 सितंबर को मुंबई में 'दृश्यम-3' फ़िल्म के प्रमोशन के दौरान (बाएं से) अजय देवगन, मृणाल जाधव, श्रिया सरन और इशिता दत्ता

पॉपुलर कल्चर और मीम्स की दुनिया में 2 अक्तूबर की तारीख़ का एक और मतलब है- ‘दृश्यम’.

अब तक तो आपको पता चल ही गया होगा कि 2 अक्तूबर को विजय सालगांवकर अपने परिवार के साथ स्वामी चिन्मयानंद जी के आश्रम में सत्संग में गया था, वहां पावभाजी खाई थी और 3 अक्तूबर को वापस आया था!

फ़िल्म की रिलीज़ की तारीख़ भी कहानी का हिस्सा बन चुकी है. अजय देवगन और तब्बू अभिनीत हिंदी फ़िल्म ‘दृश्यम’ का तीसरा और अंतिम हिस्सा अब उसी ऐतिहासिक तारीख़ यानी 2 अक्तूबर को रिलीज़ होने जा रहा है.

साल 2022 में कोविड महामारी के बाद जब सिनेमाघर दोबारा खुलने लगे, तो एक सवाल बार-बार पूछा जा रहा था- क्या दर्शक फिर से सिनेमाघरों में लौटेंगे?

ओटीटी के बढ़ते प्रभाव, दर्शकों की बदली हुई आदतों और महामारी के लंबे दौर ने फ़िल्मों के कारोबार को गहरा झटका दिया था. तब ‘दृश्यम 2’ ही वो अहम फ़िल्म थी, जिसने दर्शकों को थिएटर तक खींचकर सिनेमा की सांसें वापस लौटाई थीं.

345 करोड़ रुपये की कमाई के साथ ‘दृश्यम 2’ उस साल की दूसरी सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म थी.

आख़िर क्या जादू है एक साधारण परिवार की इस असाधारण कहानी में? क्यों लोग बार-बार इस सस्पेंस के चक्रव्यूह में खिंचे चले आते हैं?

इस सवाल का जवाब सिर्फ़ आने वाली ‘दृश्यम 3’ में नहीं, बल्कि उस पूरी कहानी में छिपा है, जो क़रीब 13 साल पहले मलयालम सिनेमा से शुरू हुई थी.

अनोखी स्क्रिप्ट

दृश्यम-2 के दौरान अभिनेत्री तब्बू और अजय देवगन

‘दृश्यम’ की मूल मलयालम फ़िल्म 2013 में आई थी. लेखक-निर्देशक जीतू जोसेफ़ ने मलयालम सुपरस्टार मोहनलाल को जॉर्जकुट्टी की भूमिका दी.

इस किरदार और इसके सस्पेंस से दर्शक इस क़दर जुड़े कि ‘दृश्यम’ उस समय तक की सबसे सफल मलयालम फ़िल्म बन गई थी.

बाद में हिंदी, तमिल, तेलुगु और कन्नड़ जैसी भारतीय भाषाओं के अलावा श्रीलंका, चीन और इंडोनेशिया में भी इसके क़ामयाब रीमेक बने. यानी कहानी ने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं आसानी से पार कर लीं.

हिंदी संस्करण 31 जुलाई 2015 को आया और बेहद सफल रहा. इसका निर्देशन निशिकांत कामत ने किया था. हिंदी दर्शकों के लिए अजय देवगन विजय सालगांवकर बने और तब्बू आईजी मीरा देशमुख.

लेकिन हर भाषा में ‘दृश्यम’ का असली हीरो उसकी स्क्रिप्ट रही. वो अनोखी स्क्रिप्ट, जिसमें आंखों देखा हमेशा सच नहीं होता.

हम वही मानते हैं, जो हमें दिखाया जाता है और यहीं से ‘दृश्यम’ का खेल शुरू होता है. विजय ने सबूत नहीं मिटाए, उसने दूसरों की याद को ही बदल दिया.

हर बार दर्शक सोचता है, “अब तो विजय फंस गया!” और हर बार कहानी उसे चौंका देती है. कमाल के सस्पेंस के साथ क़िरदारों की बेहद सादगी भी फ़िल्म को ख़ास बनाती है.

नया जॉनर- फ़ैमिली थ्रिलर

'दृश्यम 2' की कास्ट- मृणाल जाधव, अजय देवगन, इशिता दत्ता और अभिषेक पाठक

सिनेमा और ओटीटी में बेहद क़ामयाब जॉनर माना जाता है- थ्रिलर. हत्या, रहस्य, पुलिस की जांच और अपराध जैसे विषयों पर फ़िल्मों और वेब सीरीज़ की कोई कमी नहीं है.

लेकिन आमतौर पर थ्रिलर फ़िल्मों को पारिवारिक मनोरंजन नहीं माना जाता. अक्सर उनमें हिंसा, अपराध, गाली-गलौज या बोल्ड सीन होते हैं, जिन्हें आम भारतीय परिवार साथ बैठकर देखने में असहज महसूस कर सकता है.

‘दृश्यम’ ने इस समीकरण को बदल दिया और एक नया जॉनर खड़ा किया- फ़ैमिली थ्रिलर.

थ्रिलर की सबसे बड़ी चुनौती होती है कि दर्शक को बार-बार चौंकाया जाए. ‘दृश्यम’ इस नियम को भी बदलती नज़र आई. यहां सबसे बड़ा रोमांच यह नहीं है कि अपराध किसने किया. दर्शक तो यह पहले ही जानता है.

रोमांच इस बात में है कि क्या यह परिवार बच पाएगा? क्या विजय की बनाई हुई योजना में कोई ग़लती होगी? यानी फ़िल्म रहस्य छिपाने के बजाय रहस्य खुलने का डर पैदा करती है.

इस शृंखला की एक कम चर्चित खूबी यह है कि इसका नायक बार-बार जीतकर भी राहत महसूस नहीं करता.

एक सामान्य थ्रिलर में ‘राज़ खुलने’ का डर दर्शकों के लिए रोमांच होता है. ‘दृश्यम’ में वही डर क़िरदारों के लिए मानसिक बोझ है. यही फ़र्क़ फ़िल्म को सस्पेंस से आगे ले जाकर एक मनोवैज्ञानिक कहानी बना देता है.

किसी भी फ़िल्म को लंबे समय तक याद रखने के लिए सिर्फ़ अच्छी कहानी काफ़ी नहीं होती. दर्शक का भावनात्मक जुड़ाव भी ज़रूरी होता है.

‘दृश्यम’ में यह जुड़ाव बहुत मज़बूत है. यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी नहीं है, जिसके पास बहुत पैसा, ताक़त या राजनीतिक पहुंच है. यह एक आम परिवार है, जो असाधारण संकट में फंस गया है.

यही जज़्बात दर्शकों को इस कहानी और क़िरदारों से जोड़ देते हैं.

कहानी इतनी ‘भारतीय’ क्यों लगती है?

10 जुलाई 2015 को मुंबई में निशिकांत कामत की फ़िल्म 'दृश्यम' के पोस्टर और गाने के लॉन्च के दौरान बॉलीवुड कलाकार तब्बू, अजय देवगन, श्रिया सरन, इशिता दत्ता और बेबी मृनाली

‘दृश्यम’ की सफलता की एक बड़ी वजह यह भी है कि यह सिर्फ़ भारतीय भाषा में बनी फ़िल्म नहीं है, बल्कि पूरी तरह भारतीय समाज और संस्कृति में रची-बसी कहानी है. लेकिन इसके जज़्बात हर किसी के हैं.

भारतीय समाज में परिवार की भूमिका बहुत बड़ी है. माता-पिता के लिए बच्चे सिर्फ़ बच्चे नहीं होते. उनकी सुरक्षा, भविष्य और सम्मान को लेकर भावनाएं बहुत गहरी होती हैं.

ऐसे में जब कहानी एक पिता को अपने परिवार की रक्षा के लिए क़ानून से टकराते हुए दिखाती है, तो दर्शक उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है.

इस थ्रिलर में बड़े गैजेट्स, ख़तरनाक स्टंट या मसाला फ़िल्मों वाला ग्लैमर भी नहीं है. विजय सालगांवकर कोई बहुत अमीर या ताक़तवर आदमी नहीं है.

वो न पुलिस वाला है, न जासूस और न ही मारधाड़ करने वाला हीरो. वो चौथी फ़ेल, केबल ऑपरेटर है.

वही आदमी, जिसे हम अपनी गली में सुबह दूध लेते, बच्चों को स्कूल छोड़ते और मोहल्ले में सबसे हंसकर मिलते देखते हैं. एक बिल्कुल साधारण व्यक्ति.

उसकी ताक़त उसका दिमाग़ है, जो पुलिस से दो क़दम आगे सोचता है. वो अपनी पत्नी और बेटियों को सिर्फ़ बचाता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी योजना का हिस्सा भी बनाता है. मुसीबत में पूरा परिवार एक-दूसरे पर भरोसा करके खड़ा रहता है.

‘दृश्यम’ दर्शक से एक नैतिक सवाल भी पूछती है- विजय ने जो किया, वह सही है या ग़लत?

फ़िल्म इसी नैतिक उलझन को बहुत प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल करती है.

एक ऐसी फ़िल्म, जो हत्या से शुरू होती है, आख़िरकार परिवार के बारे में बन जाती है. यह पुलिस और एक अपराधी पिता के बीच की जंग है, लेकिन दर्शक का दिल एक पिता के साथ है.

‘दृश्यम’ की क़ामयाबी शायद इसी सवाल पर टिकी है- अगर आपके परिवार के सामने ऐसी स्थिति आ जाए, तो आप क्या करेंगे?

यही सवाल फ़िल्म को एक सामान्य क्राइम थ्रिलर से आगे ले जाकर एक पारिवारिक फ़िल्म बना देता है.

‘सिनेमा’ है विजय का हथियार

तब्बू, अजय देवगन और श्रिया सरन

‘दृश्यम’ की सबसे खूबसूरत परतों में से एक है इसके हीरो का मसाला फ़िल्मों के प्रति प्रेम. यहां हीरो फ़िल्मों का दीवाना है. जॉर्जकुट्टी/विजय ने ज़िंदगी की पढ़ाई किसी कॉलेज में नहीं, बल्कि फ़िल्मों से की है. यही बात ‘दृश्यम’ को एक दिलचस्प संदर्भ भी देती है.

जिस लोकप्रिय सिनेमा को अक्सर गंभीर बुद्धिजीवी ‘हल्का’ मनोरंजन मानते हैं, ‘दृश्यम’ उसी सिनेमा को अपने नायक की सबसे बड़ी ताक़त बना देती है.

फ़िल्मों से वह लोगों के व्यवहार को समझता है, पुलिस की तफ़्तीश के बारे में जानकारी हासिल करता है और यह समझता है कि किसी अपराध के बाद जांच किस तरह आगे बढ़ सकती है.

‘दृश्यम 2’ तक आते-आते विजय ख़ुद फ़िल्म निर्माता भी बन जाता है. अपनी इस नई पहचान का इस्तेमाल भी वह अपने प्लान में बख़ूबी करता है.

हर बार नए मोहरे और दांव

अजय देवगन

‘दृश्यम’ चाल और मात की एक नई दिमाग़ी जंग है, जहां हर बार मोहरे और दांव बदल जाते हैं. ‘दृश्यम 2’ के सामने चुनौती थी कि वह फिर से वही रोमांच कैसे पैदा करे.

फ़िल्म ने प्रभावशाली अंदाज़ में इसका जवाब दिया. इस बार सवाल था- क्या अतीत कभी पूरी तरह दफ़्न हो सकता है? अंत में लाश छिपाने से लेकर उसे ठिकाने लगाने तक का प्लान बेहद रोमांच से भरा था.

लेकिन ‘दृश्यम 3’ तक आते-आते हालात बदल गए.

मलयालम में बनी ‘दृश्यम 3’ मई 2026 में रिलीज़ हो चुकी है. फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर बड़ी क़ामयाबी हासिल की है, लेकिन समीक्षकों की नज़र में ‘दृश्यम 3’ पहली दो फ़िल्मों की तरह खरी नहीं उतरी.

‘दृश्यम 3’ (मलयालम) की समीक्षा करते हुए ‘मिड-डे’ अख़बार ने लिखा, “पहली नज़र में ऐसा लग सकता है कि तीसरी फ़िल्म के ट्विस्ट और मोड़ उतने उलझे हुए या प्रभावशाली नहीं हैं, जितने कि पिछले भागों में थे. लेकिन असल बात यही है! पिछली फ़िल्मों के उलट, ‘दृश्यम 3’ में जॉर्जकुट्टी कभी भी पूरी तरह से कहानी की कमान अपने हाथ में नहीं रख पाते हैं.”

वहीं, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने ‘दृश्यम 3’ को “जीतू जोसेफ़ की इस सुपरहिट फ़्रैंचाइज़ी की सबसे कमज़ोर कड़ी” बताया.

अजय देवगन की हिंदी ‘दृश्यम’ के पहले दो भागों में जीतू जोसेफ़ की मूल मलयालम फ़िल्मों की कहानी को ही पूरी तरह अपनाया गया था.

फिर ख़बर आई कि हिंदी की ‘दृश्यम 3’ की कहानी में बदलाव किया गया है. फ़िल्म के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में अजय देवगन ने भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि ‘दृश्यम: द कंक्लूजन’ को एक बिल्कुल नई पटकथा के साथ तैयार किया गया है. यह मौजूदा कहानी में मामूली बदलाव करने जैसा मामला बिल्कुल नहीं है. हिंदी संस्करण मलयालम ‘दृश्यम 3’ से पूरी तरह अलग है.

सबसे अहम बात यह है कि ‘दृश्यम: द कंक्लूजन’ इस सीरीज़ की आख़िरी फ़िल्म होगी. हर अच्छी कहानी का एक मुकाम होता है, जहां उसे रुक जाना चाहिए.

‘दृश्यम’ इसलिए भी याद रहे कि इसकी कहानी को हिट फ़िल्मों के नाम पर बेवजह नहीं खींचा गया, बल्कि सही वक़्त पर विराम दिया गया.

तेरह साल के सफ़र के बाद कहानी का पर्दा गिरेगा. उम्मीद है ‘दृश्यम’ के तिलिस्म में चाल आख़िरी होगी और अंत याद रह जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS