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अक्तूबर में होने वाले प्रतिष्ठित ‘बीएफ़आई लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में हिंदी सिनेमा की क्लासिक फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ एक नए 4K रेस्टोरेशन के साथ बड़े पर्दे पर लौटने जा रही है.
18 अक्तूबर 2026 को सेंट्रल लंदन के बीएफ़आई आईमैक्स में होने वाली इस ख़ास स्क्रीनिंग के सभी टिकट करीब एक महीने पहले ही पूरे बिक चुके हैं. टिकटों का ‘सोल्ड आउट’ होना इस बात की गवाही है कि रिलीज़ के 54 साल बाद भी ‘पाकीज़ा’ का जादू बरक़रार है. गुज़रा वक़्त उसकी चमक को धुंधला नहीं कर पाया.
निर्देशक कमाल अमरोही की इस क्लासिक फ़िल्म का संरक्षण ‘फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन’ ने अमरोही परिवार के सहयोग से किया है. इस नए वर्ज़न का वर्ल्ड प्रीमियर फ्रांस के ल्यों में ‘फेस्टिवल ल्यूमिएर’ में होगा, जिसके बाद इसे ‘बीएफ़आई लंदन फिल्म फ़ेस्टिवल’ में दिखाया जाएगा.
‘पाकीज़ा’ और इसकी ‘साहिबजान’ अभिनेत्री मीना कुमारी से जुड़ी बहुत सी कहानियां है जिनमें से कुछ सबने कभी ना कभी सुनी हैं. फिर भी उन्हें बार-बार याद किया जाता है, ताकि वक्त की धूल में वे कहीं खो न जाएं.
‘पाकीज़ा’ का पूरा सफ़र किसी इम्तिहान से कम नहीं था
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‘पाकीज़ा’ को मुकम्मल होने में 15 साल का लंबा अरसा लगा. इसकी शुरुआत 1957 में हुई थी. मगर फ़िल्म से पहले कमाल अमरोही और मीना कुमारी की कहानी का आग़ाज़ हुआ था.
1949 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ‘महल’ से कमाल अमरोही बड़े निर्देशक बन गए. वे मशहूर स्क्रिप्टराइटर भी थे और ‘मुगल-ए-आज़म’ के लेखकों में शामिल थे. दूसरी तरफ, मीना कुमारी उभरती हुई अभिनेत्री थीं जो बचपन से ही फ़िल्मों में काम कर रही थीं. दोनों के बीच प्यार हुआ और वैलेनटाइन्स डे के दिन, 14 फरवरी 1952 को दोनों ने शादी कर ली.
कमाल उम्र में मीना से बड़े थे और इससे पहले उनकी दो शादियां हो चुकी थीं. कमाल मीना को प्यार से मंजू बुलाते थे और मीना उन्हें चंदन कहकर पुकारती थीं.
कमाल ने मीना कुमारी के साथ पहले ‘दायरा’ (1954) बनाई, जो सफल नहीं रही. इस बीच मीना कुमारी ‘बैजू बावरा'(1953) और दिलीप कुमार के साथ ‘आज़ाद’ जैसी फिल्मों से बड़ी स्टार बन चुकी थीं और पहला फ़िल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड भी उन्हें ही मिला था.
कमाल अमरोही का ‘ताज महल’
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कमाल ने मीना कुमारी को ध्यान में रखकर ही ‘पाकीज़ा’ की कहानी लिखी थी. 17 जनवरी 1957 को एक भव्य मुहूर्त के साथ उन्होंने ‘पाकीज़ा’ को लॉन्च किया.
‘पाकीज़ा’ उनके सपनों की फ़िल्म थी. मीना कुमारी पर विनोद मेहता की लिखी किताब में दर्ज है, “शाहजहां ने अपनी पत्नी के लिए ताजमहल बनवाया था. कमाल साहब भी ‘पाकीज़ा’ के साथ कुछ ऐसा ही करना चाहते थे.”
शुरुआत में कमाल अमरोही पाकीज़ा में ख़ुद अभिनय भी करना चाहते थे. लेकिन वक्त बीतने के साथ उन्होंने ये इरादा छोड़ दिया.
ब्लैक एंड व्हाइट से सिनेमास्कोप तक का सफ़र
शुरुआत में ‘पाकीज़ा’ ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के रूप में बननी थी, लेकिन बाद में इसे रंगीन करने का फैसला हुआ. इसके बाद कमाल अमरोही ने इसे सिनेमास्कोप में बनाने का फै़सला किया जिससे फ़िल्म में देरी होती गयी.
हालांकि देश की पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म, निर्देशक गुरु दत्त की ‘कागज़ के फूल’ (1959) बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गयी थी, लेकिन कमाल अमरोही पीछे नहीं हटे. उन्होंने लंदन के एमजीएम स्टूडियो से सिनेमास्कोप लेंस किराए पर लिए, जिसका किराया ही 50,000 रुपये प्रति माह था जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी.
शुरुआती शूटिंग
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सिनेमास्कोप लेंस आने के बाद कमाल अमरोही ने मीना कुमारी के कई अहम सीन की शूटिंग कर ली. संगीतकार गुलाम मोहम्मद के संगीतबद्ध बेहद मशहूर तीन मुजरा गीतों: ‘इन्ही लोगों ने’, ‘ठाड़े रहियो’ और ‘चलते-चलते’ को भी कमाल ने बेहद खूबसूरती से शूट कर लिया. फिल्म के इन दृश्यों में ही मीना कुमारी सबसे ज़्यादा खूबसूरत नजर आती हैं. हालांकि अब तक फिल्म के हीरो का फ़ैसला नहीं हुआ था.
परफ़ेक्शन की दीवानगी
शुरुआती दृश्य शूट होने के बाद कमाल अमरोही को लगा कि लेंस का फोकस कुछ ठीक नहीं है. कैमरामैन जोसेफ़ विर्सचिंग ने कहा कि फोकस तो बिलकुल ठीक है. लेकिन कमाल नहीं माने. दूसरे लैब में जांच कराई गई. रिपोर्ट आई के फोकस सही है. लेकिन कमाल अड़ गए. फुटेज एमजीएम के पास लंदन भेजी गई. वहां भी फोकस सही पाया गया. लेकिन कमाल नहीं माने. आखिरकार हॉलीवुड की एक लैब में पता चला कि फोकस में वाकई 1/1000 मिलीमीटर का फर्क था. कमाल अमरोही की तेज़ नज़र ने यह बारीक गलती भी पकड़ ली थी. उनकी तारीफ़ करते हुए एमजीएम ने बाकी शूटिंग के लिए लेंस का किराया भी माफ कर दिया.
दस लाख का ‘बाज़ार-ए-हुस्न’
फिल्म के ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ सेट को बनाने में 10 लाख रुपये से ज़्यादा खर्च हुए. चार मंज़िला इस सेट पर 600 लोग आठ महीने तक दिन-रात काम करते रहे. इसे असली दिखाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों की कई दुकानों को वहां लाकर बसाया गया था. ये दुकानें एक साल से ज़्यादा समय तक सेट पर रहीं. इस सेट पर मुजरे की शूटिंग के लिए सैकड़ों डांसर्स को कई महीनों तक खास तौर पर तैयार किया गया था.
कमाल-मीना का अलगाव
समय तेज़ी से बीत रहा था, लेकिन ‘पाकीज़ा’ की रफ्तार बहुत धीमी थी. ‘पाकीज़ा’ बनते-बनते कमाल अमरोही और मीना कुमारी के रिश्ते भी बिगड़ने लगे. मार्च 1964 में दोनों अलग हो गए.
कमाल अमरोही से अलग होने के बाद के इस दौर में मीना कुमारी ने बहुत ज़्यादा शराब पीना शुरू कर दिया. लेखक मेघनाद देसाई अपनी किताब ‘पाकीज़ा- एन ओड टू ए बाईगॉन वर्ल्ड’ में लिखते हैं: “उन दिनों बॉम्बे में शराबबंदी लागू थी, लेकिन यह पाबंदी भी मीना कुमारी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक शराब हासिल करने से रोक नहीं पाई.”
मीना कुमारी की मौत पर उनकी करीबी दोस्त रही अभिनेत्री नरगिस ने लिखा था, “शराब में खुद को डुबोते हुए, वो आत्म विनाश की राह पर चल पड़ी थी. उसने ज़िंदगी में अपनी दिलचस्पी ही खो दी थी.”
हालात बिगड़े और 1968 में इलाज के लिए उन्हे लंदन जाना पड़ा. इसके बाद जेनेवा में उन्होंने कई हफ़्ते बिताए. उन्हें कुछ वक्त के लिए राहत तो ज़रूर मिली, लेकिन उनके लिवर की बीमारी ने कभी उनका पूरी तरह पीछा नहीं छोड़ा. पाकीज़ा अब तक अधूरी थी.
कमाल अमरोही की मीना कुमारी को चिट्ठी
25 अगस्त 1968 को कमाल अमरोही ने अपनी अलग रह रही पत्नी मीना कुमारी को एक चिट्ठी लिखी. विनोद मेहता की किताब मीना कुमारी-द क्लासिक बायोग्राफी-के मुताबिक कमाल अमरोही ने लिखा कि अब सिर्फ ‘पाकीज़ा’ को पूरा करना बाकी है. मीना कुमारी ने कहा था कि जब तक उन्हें तलाक नहीं मिलता, वे फ़िल्म पूरी नहीं करेंगी.
कमाल अमरोही ने लिखा कि अगर मीना चाहें तो वे उन्हें तलाक देने के लिए तैयार हैं. इसके बाद भी अगर वे ‘अपनी पाकीज़ा’ को पूरा करने में मदद करेंगी, तो उन्हें खुशी होगी.
उन्होंने आगे लिखा कि ‘पाकीज़ा’ से कई लोगों का भविष्य जुड़ा है और बहुत से लोगों की उम्मीदें भी. इसे अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए. आखिर में उन्होंने लिखा, “फ़िल्म एक डूबते हुए जहाज की तरह है और उन्हीं की मदद से इसे किनारे तक पहुंचाया जा सकता है.”
जब नरगिस और सुनील दत्त ने मीना कुमारी को मनाया
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नरगिस ने लिखा कि कमाल अमरोही चाहते थे कि सुनील दत्त पाकीज़ा में काम करें. नरगिस और सुनील दत्त ने ‘पाकीज़ा’ की कुछ फुटेज देखी और मीना कुमारी के शानदार दृश्य देखकर हैरान रह गए. मीना कुमारी की मौत पर लिखे अपने लेख, ‘मीना, मौत मुबारक हो’ (शमा मैगज़ीन, जून 1972) में नरगिस कहती हैं कि वो अपनी करीबी दोस्त मीना कुमारी से मिलीं और उनसे कहा, “मंजू, अगर यह फ़िल्म अधूरी रह गई तो यह बहुत बड़ी त्रासदी होगी. तुम्हारे वापस लौटने का इंतज़ार करते-करते थक चुके कमाल साहब अब किसी दूसरी अभिनेत्री की तलाश करने लगे हैं. अगर तुम राजी हो, तो मैं उनसे बात करके तुम्हारी वापसी का रास्ता आसान कर सकती हूं.”
इस बार मीना ने बस इतना कहा, “आप जैसा कहेंगी, मैं वैसा ही करूंगी.”
नरगिस ने लिखा, “मैंने इस बारे में कमल साहब से बात की थी. उनका कहना था कि मीना का इस प्रोजेक्ट से दोबारा जुड़ने के लिए राज़ी होना सबसे बेहतरीन स्थिति है, लेकिन इसकी कुछ शर्तें होंगी. उन्हें अपनी जीवनशैली को सुधारना होगा, फिट होना होगा और शराब छोड़नी होगी. मीना की तरफ से, मैंने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया.”
मीना कुमारी की ‘पाकीज़ा’ में वापसी
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कमाल अमरोही और मीना कुमारी की भावुक मुलाकात हुई. कमाल ने मीना कुमारी को सोने की एक गिन्नी दी और 30 जनवरी 1969 को फ़िल्म इंडस्ट्री की चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘जर्नल ऑफ़ द फ़िल्म इंडस्ट्री’ में उनकी वापसी का एलान हो गया.
फ़िल्म के हीरो पहले धर्मेन्द्र होने थे. मगर मीना के साथ उनके अफ़ेयर के चर्चे हुए तो उनकी जगह राजकुमार को साइन किया गया. अब तक फ़िल्म के असली सिनेमैटोग्राफ़र जोसेफ़ विर्सचिंग का निधन हो गया था. उनकी जगह नए कैमरामैन जाल मिस्त्री बने. फिल्म का बेमिसाल संगीत रचने वाले संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद भी अपने जीवन की सबसे बड़ी सफलता देखे बिना 1968 में चल बसे.
16 मार्च 1969 को, पति से अलग होने के पांच साल बाद, पैंतीस वर्ष की मीना कुमारी फिर ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग के लिए लौटीं. कमाल अमरोही ने उनका शानदार स्वागत किया. उन्होंने मीना के आने की खुशी और सुलह के तौर पर एक पेड़ा खिलाया और उनके स्टूडियो पहुंचने की एक छोटी-सी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बनवायी.
अब तक हिंदी सिनेमा काफी बदल चुका था. राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार बन चुके थे और अभिनेत्रियों की एक नई पीढ़ी भी पर्दे पर आ चुकी थी. मीना कुमारी ख़ुद अब ‘मेरे अपने’ और ‘दुश्मन’ जैसी फ़िल्मों में उम्रदराज़ और गंभीर किरदार निभाने लगी थीं.
मार्च 1969 से दिसंबर 1971 तक कमाल अमरोही और मीना कुमारी ने लगातार ‘पाकीज़ा’ पर काम किया. फ़िल्म के आखिरी तीन साल बेहद तेज़ी से काम करते हुए गुजरे.
बिगड़ते स्वास्थ्य के साथ शूटिंग
कई साल पहले शूट किए गए दृश्यों के मुकाबले अब मीना कुमारी का वज़न बढ़ गया था. उनके चेहरे में भी फर्क साफ़ नज़र आने लगे था. वर्षों की बीमारी और शराब ने उनके शरीर को बेहद कमजोर कर दिया था. अशोक कुमार और राज कुमार के साथ मीना कुमारी के जो रोमांटिक सीन फ़िल्माए गए उनमें बेहद कम क्लोज़ अप शॉट रखे गए.
कमाल अमरोही ने रोशनी और परछाइयों से साथ लॉन्ग शॉट्स की मदद से बेहद सुंदरता से उन्हें पर्दे पर पेश किया.यह बात मशहूर है कि फिल्म के गीत, ‘आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे,’ गाने के दौरान मीना कुमारी की जगह पद्मा खन्ना ने ‘साहिबजान’ बनकर बॉडी डबल के तौर पर काम किया था. सिर्फ कुछ शॉट मीना कुमारी के चेहरे के लिए गए थे.
दिसंबर 1971 में पाकीज़ा की शूटिंग पूरी हो गयी. लेकिन तब तक मीना कुमारी का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया. ज़्यादा शराब पीने की वजह से उनके लिवर ने जवाब देना शुरू कर दिया था. लिवर सिरोसिस की बीमारी से बेहद कमज़ोर हो चुकी थीं.
‘पाकीज़ा’ का प्रीमियर
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पाकीज़ा 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई, मगर एक शाम पहले यानी 3 फ़रवरी को बॉम्बे के मशहूर मराठा मंदिर में इसका भव्य प्रीमियर रखा गया. फिल्म की रील्स के डिब्बे एक पालकी में थिएटर तक लाए गए थे. करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से बनी, सिनेमास्कोप और ईस्टमैनकलर से सजी ‘पाकीज़ा’ आखिरकार 15 साल बाद पर्दे तक पहुंची थी.
अपनी जिंदगी के आखिरी प्रीमियर में मीना कुमारी सफेद साड़ी पहने बेहद सादगी और गरिमा के साथ पहुंचीं. हीरो राज कुमार ने मीडिया के कैमरों के सामने उनके हाथ पर किस किया और फिर मीना उनके साथ फ़िल्म देखने अंदर चली गईं. 38 साल की मीना कुमारी सबसे आगे बैठी थीं. सामने पर्दे पर उनका बरसों पुराना खूबसूरत सपना मुकम्मल हो गया था.
पाकीज़ा के रिव्यू में कहा “पैसों की भव्य बर्बादी”
लेकिन फ़िल्म समीक्षकों के पैमाने पर खरी नहीं उतरी. ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने इसे ‘पैसों की भव्य बर्बादी’ कहा तो ‘फिल्मफेयर’ के आलोचक ने इसे पांच में सिर्फ एक स्टार दिया. कई आलोचकों को एक तवायफ की कहानी ‘पुराने ज़माने की’ और साधारण लगी.
शुरुआती कुछ हफ्तों में पाकीज़ा की कमाई भी बहुत धीमी रही. इंडस्ट्री ने तो इसे फ्लॉप कहना शुरू कर दिया था.
“अब वक्त आ गया है”
मार्च 1972 के तीसरे हफ़्ते में मीना कुमारी की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी. उन्हें मुंबई के सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल ले जाया गया. उनके लीवर में इंफेक्शन बेहद बढ़ गया था. उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी. 25 मार्च को दर्द कुछ कम हुआ तो मीना ने अपनी बड़ी बहन खुर्शीद से कहा, “आपा, अब वक्त आ गया है. शायद यह सही समय भी है. मेरा कोई काम अधूरा नहीं है. कमाल साहब की ‘पाकीज़ा’, प्रेमजी की ‘दुश्मन’ और सावन की ‘गोमती के किनारे’ सब पूरी हो चुकी हैं. अब कोई यह नहीं कह सकेगा कि मीना अपना काम अधूरा छोड़कर चली गई.”
फिर उन्होंने बहन और उनके बच्चों की चिंता करते हुए कहा कि जितना संभव था, उन्होंने उनके लिए कर दिया है. अब आगे की ज़िम्मेदारी खुर्शीद की है. आखिर में उन्होंने कहा, “अब मैं मरने के लिए तैयार हूं.”
“मैं मरना नहीं चाहती”
29 मार्च की रात तक वो दर्द से बुरी तरह तड़प रही थीं. वो ज़ोर से चीखीं. उनकी चीख सुनकर बड़ी बहन खुर्शीद दौड़कर अंदर आईं. मीना ने हाथ फैलाकर उन्हें अपनी ओर बुलाया और रोते हुए कहा, “आपा, आपा… मैं मरना नहीं चाहती.”
लेकिन इससे पहले कि खुर्शीद उन्हें संभाल पातीं, मीना का सिर एक तरफ झुक गया. वे कोमा में चली गईं. दो दिन बाद, 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
“मीना कुमारी की मज़ार” पाकीज़ा
पूरा देश उनकी मौत की ख़बर से स्तब्ध था लेकिन अपनी मौत से मीना मानो ‘पाकीज़ा’ की किस्मत लिख गईं थीं. देशभर के सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी. पाकीज़ा में गौहर जान का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री नादिरा ने कहा, “सिनेमाघरों में लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था. वो लोग ‘पाकीज़ा’ देखने नहीं, मानो मीना कुमारी की मज़ार पर आ रहे थे.”
‘पाकीज़ा’ ऐसी चली कि 1972 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो गई.
आज ‘पाकीज़ा’ भारतीय सिनेमा की अमर विरासत है. तवायफों पर अनगिनत फिल्में बनीं, मगर इसकी बुलंदी कोई नहीं छू सका.
‘पाकीज़ा’ नहीं है मीना कुमारी की अंतिम फ़िल्म
आमतौर पर ‘पाकीज़ा’ को ही मीना की आखिरी फ़िल्म भी मान लिया जाता है. लेकिन उनकी अंतिम फ़िल्म थी निर्देशक सावन कुमार की ‘गोमती के किनारे’ जो उनकी नवंबर 1972 को रिलीज़ हुई थी. इसमें उनका रोल एक तवायफ़ का ही था. लेकिन ये फ़िल्म सफल नहीं रही थी.
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