Source :- LIVE HINDUSTAN
यमन के हूती लड़ाके अक्सर चप्पल, कुर्ते और पारंपरिक कपड़ों में क्यों नजर आते हैं? सेना जैसी वर्दी से दूर हूतियों की यह पहचान कैसे बनी और एक स्थानीय आंदोलन मिसाइलों व ड्रोन से लैस ताकतवर संगठन कैसे बना? जानिए हूतियों का इतिहास।
यमन के हूती विद्रोहियों की तस्वीरें आपने जरूर देखी होंगी। हाथ में बंदूक, कंधे पर गोला-बारूद, सिर पर पारंपरिक कपड़ा और पैरों में अक्सर साधारण चप्पल। पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे कोई सामान्य ग्रामीण लड़ाका हो। लेकिन यही हूती आज ड्रोन, मिसाइल और दूसरे आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल के लिए दुनिया भर में चर्चा में हैं। तो सवाल उठता है कि आखिर इतने आधुनिक हथियार रखने वाले हूती लड़ाके सेना जैसी वर्दी और जूते क्यों नहीं पहनते? इसका जवाब समझने के लिए हूतियों की पूरी कहानी को थोड़ा पीछे जाकर समझना होगा।
हूती आखिर हैं कौन?
हूतियों का आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह है। यह आंदोलन यमन के उत्तरी इलाके, खासकर सादा प्रांत में जायदिया शिया समुदाय के बीच उभरा। इस आंदोलन की जड़ें 1990 के दशक में दिखाई देती हैं। उस समय हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती के नेतृत्व में ‘बिलीविंग यूथ’ यानी ‘युवा विश्वासियों’ का आंदोलन शुरू हुआ। इसका शुरुआती जोर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने तथा उत्तरी यमन में बढ़ते सलाफी प्रभाव का विरोध करने पर था। बाद में यही आंदोलन हथियारबंद संघर्ष की तरफ बढ़ा और अपने नेता के नाम पर ‘हूती’ कहलाने लगा।
फिर चप्पल और पारंपरिक कपड़े की कहानी क्या है?
यह समझना जरूरी है कि चप्पल हूतियों की कोई आधिकारिक सैन्य पहचान या अनिवार्य ड्रेस नहीं है। हूती आंदोलन की शुरुआत किसी नियमित सेना की तरह नहीं हुई थी। यह स्थानीय धार्मिक-सामाजिक आंदोलन से विकसित होकर विद्रोही और फिर एक संगठित सैन्य-राजनीतिक ताकत बना। यमन के ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक कपड़े और साधारण चप्पल आम पहनावा हैं। इसलिए हूती लड़ाकों की बड़ी संख्या उसी स्थानीय पोशाक में नजर आती है।
दूसरी वजह उनकी गुरिल्ला युद्ध की जड़ें हैं। हूतियों ने लंबे समय तक यमन के पहाड़ी इलाकों में लड़ाई लड़ी। ऐसे युद्ध में किसी नियमित सेना की तरह हमेशा एक जैसी वर्दी पहनना जरूरी नहीं होता। स्थानीय कपड़ों में रहना लड़ाकों को आम आबादी के बीच घुलने-मिलने में भी मदद कर सकता है। यानी तस्वीर में चप्पल दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि उनके पास सैन्य क्षमता नहीं है। हूतियों की सैन्य ताकत और उनका पहनावा दो अलग चीजें हैं।
कहानी 2004 में बदल गई
हूती आंदोलन और यमन की सरकार के बीच तनाव 2004 में खुले सैन्य संघर्ष में बदल गया। तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार ने हुसैन अल-हूती को गिरफ्तार करने की कोशिश की। इसके बाद संघर्ष भड़क उठा। सितंबर 2004 में हुसैन अल-हूती मारे गए, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ। इसके बाद सरकार और हूतियों के बीच कई दौर की लड़ाई हुई। यहीं से एक स्थानीय धार्मिक-सामाजिक आंदोलन धीरे-धीरे सशस्त्र विद्रोही संगठन में बदलता गया।
2011 की अरब स्प्रिंग ने मौका दिया
2011 में अरब दुनिया में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हुई। यमन भी इससे अछूता नहीं रहा। लंबे समय तक सत्ता में रहे अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ी। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद भी यमन में राजनीतिक अस्थिरता खत्म नहीं हुई। सरकार कमजोर होती गई और अलग-अलग राजनीतिक तथा सैन्य गुटों के बीच संघर्ष बढ़ता गया। इसी माहौल में हूतियों ने अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया।
2014 में हूतियों ने सना पर कब्जा कर लिया
हूतियों के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ 2014 में आया। हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और यमन की सत्ता व्यवस्था को ही चुनौती दे दी। इसके बाद देश में संघर्ष और तेज हो गया। दिलचस्प बात यह है कि कभी जिन अली अब्दुल्ला सालेह के खिलाफ हूती लड़ रहे थे, बाद में उन्हीं के साथ हूतियों ने राजनीतिक-सैन्य गठजोड़ किया। हालांकि यह गठजोड़ ज्यादा लंबा नहीं चला और 2017 में सालेह की हत्या कर दी गई।
फिर सऊदी अरब युद्ध में क्यों आया?
2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक गठबंधन ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया। इसका घोषित उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को फिर से सत्ता में लाना था। इसके बाद यमन का संघर्ष एक स्थानीय गृहयुद्ध से आगे बढ़कर क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का हिस्सा बन गया। हूतियों ने पहाड़ी और उत्तरी यमन के इलाकों में अपनी पकड़ बनाए रखी। उनके लिए यमन का कठिन पहाड़ी भूगोल एक बड़ा रणनीतिक फायदा साबित हुआ।
ईरान का नाम यहां क्यों आता है?
हूतियों को ईरान से सैन्य और अन्य प्रकार का समर्थन मिलने की बात लंबे समय से सामने आती रही है। ईरान उन्हें हथियार, तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण देने से जुड़ा रहा है, हालांकि तेहरान हूतियों को सीधे नियंत्रित करने से इनकार करता रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हूतियों को केवल ईरान की कठपुतली समझना भी पूरी तस्वीर नहीं है। उनका अपना स्थानीय इतिहास, नेतृत्व और यमनी राजनीतिक एजेंडा है। ईरान का समर्थन महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन हूती अपनी स्वतंत्रता पर जोर देते हैं।
चप्पल पहनने वाला लड़ाका मिसाइल कैसे चला रहा है?
यही हूतियों की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। किसी संगठन की व्यक्तिगत लड़ाकू की शक्ल-सूरत और उसकी सैन्य तकनीकी क्षमता एक जैसी नहीं होती। हूती संगठन ने वर्षों के संघर्ष में रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन और दूसरे हथियारों की क्षमता विकसित की है। ईरान से मिली तकनीकी और सैन्य मदद ने भी उनकी क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभाई है।
इसीलिए एक हूती लड़ाका जमीन पर पारंपरिक यमनी पोशाक और चप्पल में दिखाई दे सकता है, जबकि संगठन के पास दूसरी तरफ लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन और मिसाइल मौजूद हो सकते हैं।
हूती नियमित सेना क्यों नहीं दिखते?
क्योंकि हूती मूल रूप से यमन की सरकारी सेना नहीं हैं। वे एक राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य आंदोलन के रूप में विकसित हुए हैं। उनके लड़ाकों में स्थानीय जनजातीय और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग बड़ी संख्या में रहे हैं।
उनका पूरा सैन्य ढांचा भी पारंपरिक राष्ट्रीय सेना जैसा नहीं है। इसमें नियमित सैन्य इकाइयों के साथ स्थानीय लड़ाके और अलग-अलग प्रकार की सैन्य संरचनाएं शामिल रही हैं। इसलिए हर हूती लड़ाके से एक जैसी वर्दी, बूट और सैन्य अनुशासन वाली शक्ल की उम्मीद करना सही तस्वीर नहीं होगी।
लेकिन क्या हूती सिर्फ चप्पल और बंदूक वाले लड़ाके हैं?
बिल्कुल नहीं। आज हूती एक ऐसा संगठन बन चुके हैं जिसके पास राजनीतिक ढांचा, क्षेत्रीय नियंत्रण और महत्वपूर्ण सैन्य क्षमता है। वे मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल कर चुके हैं और लाल सागर की जहाजरानी को प्रभावित करने की क्षमता भी दिखा चुके हैं।
2023 के अंत से लाल सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्र में हूती हमलों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जहाजरानी पर बड़ा असर डाला। हाल के महीनों में उनका संघर्ष फिर क्षेत्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ा है।
सितंबर 2026 में संघर्ष और ज्यादा गंभीर हुआ है। रॉयटर्स के मुताबिक हूती बलों ने रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया और लाल सागर के महत्वपूर्ण इलाकों में अपनी स्थिति मजबूत की है।
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