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बंधुआ मजदूर बनकर गए दादा, तमिल माहौल में परवरिश; शांति का नोबेल पाने वाली नवी पिल्लई कौन हैं

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Source :- LIVE HINDUSTAN

नवी पिल्लई का जीवन रंगभेद के दौर में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के संघर्ष और न्याय के लिए लड़ाई से जुड़ा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए काम किया।

नवनेथम नवी पिल्लई को साल 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। भारतीय मूल की नवी पिल्लई संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख रह चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की जज भी हैं। उन्हें यह सम्मान शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए मिला है। नवी पिल्लई का भारत से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नाता है, क्योंकि वे भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी नागरिक हैं। उनके दादा 1890 के दशक में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान भारत से बंधुआ मजदूर के रूप में गन्ने के खेतों में काम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए थे।

नवी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक प्रवासी तमिल हिंदू परिवार में हुआ। उनके पिता नारायणसामी बस ड्राइवर थे और उनकी मां शांतमा नायडू ने उन्हें पारंपरिक मूल्यों के साथ पाला, जिसने उनके जीवन को एक मजबूत आधार दिया। भारत की इस विरासत और पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ पिल्लई रंगभेद के कठोर दौर में भी आगे बढ़ीं और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने वाली भारतीय मूल की पहली महिलाओं में से एक बनकर उभरीं।

नवनेथम नवी पिल्लई का संघर्ष भरा जीवन

नवनेथम नवी पिल्लई का जीवन रंगभेद के दौर में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के संघर्ष और न्याय के लिए उनकी लंबी लड़ाई से जुड़ा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए काम किया है। नोबेल समिति के मुताबिक, नवी पिल्लई का काम उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है, जो दुनिया को अधिक शांतिपूर्ण बनाना चाहते हैं। दुनिया में युद्ध और संघर्ष बढ़ रहे हैं। जजों और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ी संस्थाओं को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में यह पुरस्कार याद दिलाता है कि हिंसा के बिना विवादों को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान जरूरी है।

नवनेथम नवी पिल्लई को पुरस्कार मिलने की सूचना देने के लिए समिति उनसे संपर्क नहीं कर पाई थी। इस साल नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 उम्मीदवारों के नामांकन मिले थे। इनमें एक चौथाई से कुछ अधिक नाम संस्थाओं के थे। पुरस्कार के लिए नामांकन करने का अधिकार राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, विदेश नीति संस्थानों के प्रमुखों, पूर्व नोबेल विजेताओं और नोबेल समिति के सदस्यों समेत कुछ चुनिंदा लोगों और संस्थाओं को होता है।

नोबेल शांति पुरस्कार के बारे में जानिए

नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत 1901 में हुई थी। अब तक यह 112 व्यक्तियों और 28 अलग-अलग संस्थाओं को दिया जा चुका है। रेड क्रॉस को यह सम्मान तीन बार, जबकि संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी को दो बार मिल चुका है। हालांकि, 19 बार ऐसा भी हुआ है, जब यह पुरस्कार नहीं दिया गया। इनमें से ज्यादातर मौके दोनों विश्व युद्धों के दौरान आए। साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी यह पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया था। महात्मा गांधी को 12 बार नामांकित किया गया, लेकिन उन्हें कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। इस साल पुरस्कार के तहत 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना की राशि दी जाएगी, जो करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN