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नई दिल्ली में चल रहे 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणापत्र में मिडिल-ईस्ट (मध्य-पूर्व) को लेकर अपनाया गया रुख़ चर्चा का विषय बना हुआ है.
इस घोषणा पत्र में इसराइल का नाम लिए बगैर फ़लस्तीन और लेबनान का ज़िक्र किया गया है और मध्य-पूर्व के तनावपूर्ण हालात के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई.
दिलचस्प ये था कि अमेरिका के साथ युद्ध में एक दूसरे के विपरीत दो छोर पर खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात भी मध्य-पूर्व के हालात शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की अपील करने वाले देशों में शामिल थे.
ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी टैरिफ़ का नाम नहीं लिया गया है लेकिन कहा गया है कि कई देशों को ‘अन्यायपूर्ण और एकतरफ़ा संरक्षणवादी कदमों’ से नुकसान हो रहा है.
घोषणापत्र का इशारा डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों पर लगाए गए टैरिफ़ की ओर था.
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव पर चिंता और इसराइल को संदेश
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घोषणा-पत्र में मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव पर “गहरी चिंता” जताई गई है. ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल देशों की ओर से पहले फ़लस्तीन और फिर अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध से घिरे मध्य-पूर्व के संकट को अधिकतम संयम और कूटनीति के ज़रिए सुलझाने की अपील की गई.
हालांकि घोषणापत्र में किसी देश को जिम्मेदार ठहराने से बचा गया है लेकिन इसमें सिविल इन्फ़्रास्ट्रक्चर और संरक्षित परमाणु संयंत्रों पर हमले की निंदा की गई है.
घोषणा-पत्र में ग़ज़ा और कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई गई.
इसमें ग़ज़ा में सीजफ़ायर बनाए रखने और बगैर किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई.
इसमें फ़लस्तीनियों को जबरन विस्थापित किए जाने का विरोध किया गया है.
इसमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के ऐसे सभी उल्लंघनों की निंदा की गई है, जिनमें युद्ध के हथियार के रूप में लोगों को भूखा रखना, आम लोगों और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाना, स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले के साथ मानवीय मदद पहुंचाने में गैरकानूनी बाधाएं डालना शामिल है.
घोषणा-पत्र में यूएनआरडब्ल्यूए यानी संयुक्त राष्ट्र की फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए राहत और कार्य एजेंसी के समर्थन की पुष्टि की गई है.
इसराइल का नाम लिए बगैर फ़लस्तीन और लेबनान की चर्चा
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घोषणा पत्र में दक्षिण अफ़्रीका की ओर से इसराइल के ख़िलाफ़ दायर मामले में अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत के अंतरिम आदेशों का भी ज़िक्र किया गया.
अदालत ने इन आदेशों में इसराइल की उस कानूनी ज़िम्मेदारी को दोहराया था कि वह ग़ज़ा में मानवीय मदद की सप्लाई सुनिश्चित करे.
घोषणा-पत्र में दो-राष्ट्र समाधान (टू-नेशन थ्योरी) के समर्थन को दोहराया गया.
इसके तहत 1967 की सीमाओं के भीतर एक फ़लस्तीनी राष्ट्र और उसकी राजधानी के तौर पर पूर्वी यरूशलम की बात कही गई.
इसमें इसराइल से लेबनान में युद्धविराम का पालन करने और लेबनान के बचे हुए इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने की अपील की गई.
साथ ही, सीरिया में सभी पक्षों को शामिल करने वाले राजनीतिक बदलाव का आह्वान किया गया.
‘इसराइल को ये पसंद नहीं आएगा’
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घोषणापत्र में मध्य-पूर्व के हालात का ज़िक्र के बारे में थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया मामलों के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन ने लिखा, ” दिल्ली घोषणा में फ़लस्तीनी मुद्दे के समर्थन में कड़े शब्दों वाले चार पैराग्राफ़ हैं. इसराइल भारत के प्रमुख साझेदारों में से एक है. लेकिन ब्रिक्स में शामिल हुए नए सदस्यों और खुद भारत के रुख़ को और ग्लोबल साउथ में फ़लस्तीनी मुद्दे की व्यापक स्वीकार्यता को देखते हुए, ब्रिक्स में आम सहमति बनाए रखने के लिए एक ये एक समझदारी भरा कदम था.”
उन्होंने लिखा, ” भारत रणनीतिक स्वायत्तता की बात करता है. इसके तहत वो अलग-अलग खेमों के देशों के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखता है. ये रणनीतिक स्वायत्तता उसे अलग-अलग विचारों वाले देशों के समूह के बीच आम सहमति बनाने में मददगार स्थिति में रखती है. ब्रिक्स के ज्यादातर देश भारत के क़रीबी साझेदार हैं और ब्रिक्स में भारत के एकमात्र प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ भी तनाव कम हुआ है.”
हालांकि थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूट के फ़ेलो मनोज केवलरमानी ने ब्रिक्स देशों को घोषणापत्र में ‘यूक्रेन का ज़िक्र’ तक न करने पर निराशा जताई है.
उन्होंने ईरान पर हमले को लेकर नरम रुख़ की आलोचना की है.
उन्होंने लिखा, ”ईरान पर हुए हमलों के मामले में भी घोषणा-पत्र पिछले साल रियो में अपनाई गई भाषा से पीछे हटता दिखता है. 2025 में ईरान पर हुए हमलों की निंदा की गई थी. लेकिन इस दस्तावेज़ में न तो अमेरिका-इसराइल की कार्रवाई की निंदा की गई है और न ही क्षेत्र के देशों को निशाना बनाकर ईरान की ओर से किए गए हमलों की.”
”पूरे घटनाक्रम को सिर्फ़ “मध्य-पूर्व/पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ना” बताया गया है. इसके बाद “अपने-अपने राष्ट्रीय रुख़ को याद करते हुए” जैसी शर्त जोड़ी गई है.
”इससे देशों के बीच मतभेद के लिए गुंजाइश बनी रहती है और इस मुद्दे पर एक साझा ब्रिक्स रुख़ सामने रखने के बजाय चिंता की कमज़ोर और नरम अभिव्यक्ति दिखाई देती है.”
‘द हिंदू’ की डिप्लोमेटिक अफ़ेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा, ”ईरान और यूएई की सहमति की वजह से पश्चिम एशिया से जुड़े पैराग्राफ़ में अमेरिका-ईरान युद्ध या क्षेत्र में ईरान के हमलों का कोई ख़ास जिक्र नहीं किया गया है. वहीं, लेबनान और ग़जा में इसराइल के हमलों की कड़ी आलोचना की गई है.”
अमेरिकी थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में ग्रेटर एशिया के सीनियर फ़ेलो केन मोरियासु ने पूछा भारत-इसराइल रिश्ते कितने मजबूत हैं?
उन्होंने एक्स पर लिखा, ” भारत की अध्यक्षता में जारी ब्रिक्स की संयुक्त घोषणा में फ़लस्तीनियों की ” घर वापसी के अधिकार” का समर्थन किया गया है.
” घोषणा में कहा गया है कि इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष का न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान तभी संभव है, जब फ़लस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों को पूरा किया जाए, जिसमें आत्मनिर्णय और वापसी का अधिकार भी शामिल है.”
”यह भाषा 2025 में जारी रियो घोषणा में भी शामिल थी, लेकिन 2024 की कज़ान घोषणा या उससे पहले की ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों की घोषणाओं में इसका उल्लेख नहीं था.”
”भारत ने छह महीने पहले ही इसराइल के साथ अपने रिश्तों को बढ़ाकर “विशेष रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया था. इसके बावजूद उसने ब्रिक्स की इस भाषा को बरकरार रखने का फैसला किया.”
”मुझे यह बहु-आयामी विदेश नीति पसंद है. लेकिन इसराइल को यह पसंद नहीं आएगा.”
‘एकतरफ़ा प्रतिबंधों’ को लेकर अमेरिका पर निशाना
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ब्रिक्स घोषणा में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन अमेरिका की ओर से एकतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंधों और शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की आलोचना की गई.
घोषणा में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफ़ा प्रतिबंधों की निंदा की जाती है. इनका व्यापक नकारात्मक असर होता है और इनसे गरीब लोगों पर असमान रूप से ज्यादा असर पड़ता है.
घोषणा में अमेरिका का नाम भले ही नहीं लिया गया, लेकिन यह साफ़ है कि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना सबसे ज्यादा प्रतिबंध लगाने वाले देशों में अमेरिका प्रमुख है.
उसने ब्रिक्स के दो सदस्य देशों- रूस और ईरान पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं.
घोषणा में कहा गया कि ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के ख़िलाफ़ लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करते हैं, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना लगाए गए प्रतिबंध भी शामिल हैं.
इस भाषा से रूस और ईरान की अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय से चली आ रही आलोचना साफ़ झलकती है.
अमेरिकी टैरिफ़ की आलोचना
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इस घोषणापत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ की सीधे चर्चा नहीं की गई है लेकिन डब्ल्यूटीओ के नियमों के ख़िलाफ़ जाने वाले एकतरफा टैरिफ़ और गैर-टैरिफ़ कदमों की निंदा की गई है
इसे अमेरिका की टैरिफ़ और आर्थिक दबाव की नीति के ख़िलाफ़ एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी टैरिफ़ का असर रूस को छोड़कर लगभग सभी ब्रिक्स देशों से होने वाले आयात पर पड़ा है.
ईरान को टैरिफ़ के साथ व्यापक प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ा है.
ट्रंप कई बार ब्रिक्स को “अमेरिका विरोधी” बता चुके हैं और ब्रिक्स के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दे चुके हैं.
भारत ने रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका की ओर से लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को “अनुचित, अन्यायपूर्ण और अविवेकपूर्ण” बताया है और कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा.
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