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भारत का जेन-ज़ी किन मुश्किलों से जूझ रहा है

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Source :- BBC INDIA

मुंबई में 26 जुलाई, 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद, शिवाजी पार्क में युवाओं और समर्थकों ने जश्न मनाया

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नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटे जेन ज़ी का आंदोलन ख़त्म हो चुका है.

लेकिन सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में गड़बड़ी के ख़िलाफ़ ऐसा ही एक आंदोलन झारखंड की राजधानी रांची में जारी है.

इन दोनों आंदोलनों के केंद्रीय सवाल एक जैसे हैं.

ये सवाल जेन ज़ी समेत उस पूरी युवा पीढ़ी के हैं, जिसके दम पर भारत अपने डेमोक्रेटिक डिविडेंड का फ़ायदा उठाकर विकसित देशों में शुमार होने की बात करता है.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि डेमोग्राफ़िक डिविडेंड का फ़ायदा तभी मिलता है जब ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के पास अच्छी नौकरियां हों.

इससे लोगों की परचेजिंग पावर में इजाफ़ा होता है. गुड्स और सर्विसज़ की खपत बढ़ने से सरकार के पास टैक्स के तौर पर ज़्यादा पैसा आता है.

सरकार के खजाने में ज्यादा पैसा उसे एजुकेशन, इन्फ़ास्ट्रक्चर, हेल्थ सेक्टर में बड़ा निवेश करने के प्रेरित करता है. इस तरह के निवेश से देश में समृद्धि आती है और लोगों का जीवनस्तर ऊंचा होता है.

डेमोग्राफ़िक डिविडेंड डैमेज

डेमोग्राफिक

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विशेषज्ञों की नज़र में जिन देशों ने अपने डेमोग्राफ़िक डिविडेंड का फ़ायदा उठाया है वो अब कम या मिडिल इनकम देशों से ऊपर उठकर हाई इनकम देशों की कैटेगरी में पहुंचने की यात्रा पर हैं.

चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश इसके उदाहरण हैं.

15 से 64 साल तक की उम्र के लोगों को कामकाजी आबादी में गिना जाता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में 100 करोड़ लोग कामकाजी उम्र के हैं. लेकिन इनमें से 67 करोड़ लोगों के पास ही रोजगार है.

भारत अपनी इस बड़ी कामकाजी आबादी के लिए रोजगार जुटाने में पिछड़ता जा रहा है.

इकोनॉमी, पब्लिक पॉलिसी, लेबर मार्केट और एजुकेशन सिस्टम को समझने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में युवाओं के सामने अच्छी ज़िंदगी के अवसर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं.

ख़ासकर ऐसे युवाओं के लिए अच्छी नौकरियों की कमी होती जा रही है, जिनके पास ग्रेजुएशन और इससे बड़ी और प्रोफे़शनल डिग्रियां हैं.

भारत में ग्रेजुएशन और इससे बड़ी डिग्रियां अच्छी ज़िंदगी की गारंटी मानी जाती रही हैं.

लेकिन दिक्कत ये है कि देश में सरकारी नौकरियों की कमी तो है ही, ग्रेजुएट्स या बड़ी डिग्रियों वाली नौजवानों को रोजगार देने वाले प्राइवेट सेक्टर में भी पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं.

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने हाल में इकोनॉमिक्स टाइम्स में लिखा, ” अच्छी डिग्रियां अब अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं है. देश में कोई जेन ज़ी अपनी पहली सैलरी में इनकम टैक्स नहीं देता. उनकी कमाई ही इतनी नहीं है.”

वो लिखते हैं, ”पहले युवाओं के लिए आईटी की नौकरियां बड़ा सहारा थीं. अब उनकी जगह एआई ले रहा है. वहीं मैन्युफैक्चरिंग में वेतन बहुत कम है. यहां तक कि ऐपल और सैमसंग की फ़ैक्ट्रियों में काम करने वालों को भी कई बार अमीर परिवारों के घरों में काम करने वालों से कम पैसा मिलता है. नेपो किड्स को छोड़कर पूरी जेन ज़ी पीढ़ी इसे झेल रही है जो अंसतोष की बड़ी वजह है.”

”जेन ज़ी के बेहतर नौकरी और अच्छी ज़िंदगी के सपने टूटते दिख रहे हैं.”

करोड़ों नौकरियों के वादे का क्या हुआ?

नरेंद्र मोदी

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लेकिन दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत ‘जॉबलेस ग्रोथ’ की कहानी बनता जा रहा है.

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट बताती है कि ग्रेजुएट्स बेरोजगारों की तादाद 40 फ़ीसदी तक है. जबकि जेन ज़ी बेरोजगारी की संख्या 15 से 25 फ़ीसदी तक है.

‘द प्रिंट’ की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो डॉ. बिदिशा भट्टाचार्या कहती हैं, ” ये आंकड़ा साफ़ तौर पर जॉबलेस ग्रोथ की ओर इशारा करता है. देश का जीडीपी तो बढ़ रहा है लेकिन उस हिसाब से रोजगार नहीं पैदा हो रहे हैं. अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘लो इंप्लॉयमेंट ऑफ इलास्टिसिटी ऑफ़ ग्रोथ’ कहते हैं. यानी देश अमीर हो रहा है लेकिन लोगों को उस अनुपात में नौकरियां नहीं मिल रही हैं.”

बिदशा भट्टाचार्या

सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले तीन साल में भारत में नौ करोड़ ग्रेजुएट और जुड़े हैं. लेकिन इनमें से 4.9 करोड़ ग्रेजुएट्स ही श्रम बाज़ार में आए हैं. यानी वो रोजगार चाहते हैं. इनमें से जो बेरोजगार हैं उनकी लगभग 1.2 करोड़ है. इसका मतलब ये है कि हर चार डिग्री होल्डर में से एक बेरोजगार है.

बिदिशा भट्टाचार्या कहती हैं, ” कामकाजी उम्र के नौजवानों को काम न मिलने से हमारा डेमोक्रेटिक डिविडेंड एक बोझ बनता जा रहा है. हमारी अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है. अगर लोगों के पास रोजगार नहीं होगा तो उनकी खपत क्षमता घटेगी और फिर मांग नहीं बढ़ेगी. ये हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक साबित होगी.”

मैन्युफ़ैक्चरिंग में मात से खाली हैं हाथ

मैन्युफैक्चरिंग में मात

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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में नौकरियां पैदा करने के लिए मजबूत मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षमता सबसे कारगर साबित हो सकती थी.

लेकिन यह देश मैन्युफैक्चरिंग में मजबूती हासिल नहीं कर पाया.

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ये है कि साल दर साल इसमें गिरावट ही आ रही है.

हालांकि विदिशा भट्टाचार्जी कहती हैं इसकी ऐतिहासिक वजहें हैं.

उनके मुताबिक़ 1991 में जब आर्थिक सुधार शुरू हुए तो भारतीय अर्थव्यवस्था सीधे कृषि से सर्विस सेक्टर में पहुंच गई.आम तौर पर अर्थव्यवस्था पहले कृषि, फिर मैन्युफ़ैक्चरिंग और फिर सर्विस सेक्टर की ओर बढ़ती है. लेकिन भारत के मामले में मैन्युफैक्चरिंग का लिंक छूट गया. लिहाजा कमजोर मैन्युफै़क्चरिंग क्षमता की वजह से हम ज़्यादा नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहे हैं.”

वरिष्ठ अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि आईटी और फ़ाइनेंशियल सेक्टर में रोजगार के मौके सिकुड़ते जा रहे हैं क्योंकि वहां एआई का असर दिखने लगा है. जबकि मैन्युफ़ैक्चरिंग और इन्फ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर में ऑटोमेशन और मैकेनाइजेशन का जोर है.

वो कहते हैं, ”पहले एक सड़क बनाने में बड़ी संख्या में लोगों को काम मिलता था लेकिन अब वहां बुलडोजर, क्रेन और जेसीबी से काम हो रहा है.”

अरुण कुमार कहते हैं, ” संगठित क्षेत्र में नौकरियां नहीं हैं और सरकार असंगठित क्षेत्र पर ध्यान नहीं दे रही हैं. जहां बड़ी तादाद में रोजगार पैदा हो सकता है. देश में छोटे, मझोले और सूक्ष्म उद्योग (एमएसएमई) की हालत ख़राब हो रही है लेकिन मोदी सरकार की गलत नीतियों की वजह से ये सेक्टर बर्बाद हो रहा है. पारंपरिक तौर पर ये सेक्टर सबसे ज्यादा रोजगार पैदा होने वाला रहा है.”

एजुकेशन सिस्टम और स्किल का सवाल

इंडिया यूथ

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रोज़गार की कमी के लिए भारत के एजुकेशन सेक्टर और कौशल विकास की लचर हालत को भी दोषी ठहराया जा रहा है.

बिदिशा भट्टाचार्या कहती हैं, ”स्टूडेंट्स प्राइवेट सेक्टर से छोटे-छोटे कोर्स कर लेते हैं लेकिन रोजगार पाने में ये ज्यादा कारगर साबित नहीं होते. भारत में जो नई नौकरियां आ रही हैं उनके लिए बेहतर स्किल वाले लोगों की ज़रूरत है.”

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का यूनिवर्सिटी एजुकेशन सिस्टम उन्हें इसके लिए तैयार नहीं कर पा रहा है. इसलिए एजुकेशन सिस्टम में काफ़ी सुधार की जरूरत है.

देश में रोज़गार को लेकर युवाओं का जो आक्रोश दिख रहा है, उसमें इस स्किलिंग समस्या की भी बड़ी भूमिका है.

जाने-माने डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट संतोष मेहरोत्रा युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी के लिए पूरी तरह भारत के मौजूदा एजुकेशन सिस्टम को दोषी मानते हैं.

वो कहते हैं, ”देश में जेन ज़ी के आंदोलन इसलिए हो रहे हैं क्योंकि यूनिवर्सिटी में जो सिलेबस उन्हें पढ़ाया जाता है तो वो उन्हें जॉब मार्केट के लिए ठीक से तैयार नहीं करता है. दूसरे, जब वो नौकरियों या हायर एजुकेशन के लिए जिन परीक्षाओं में बैठते हैं तो पाते हैं कि उन्हें आयोजित कराने वाली एजेंसियां नाकारा हैं और पेपर लीक हो रहे हैं. दरअसल इन एजेंसियों की बनावट में ही भ्रष्टाचार निहित है.”

संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, ”देश में प्रतियोगी परीक्षाएं कराने वाली नेशनल टेस्ट एजेंसी (एनटीए) में पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं. जो हैं वो या तो डेप्यूटेशन पर हैं या फ़िर अस्थायी. इसलिए इतने बड़े देश में परीक्षाएं कराने के लिए प्राइवेट एजेंसियों की मदद लेनी पड़ती है और यहां भ्रष्टाचार की आशंकाएं काफ़ी बढ़ जाती है.”

 संतोष मेहरोत्रा

संतोष मेहरोत्रा के मुताबिक़ देश के गैर कृषि क्षेत्र में हर साल सवा करोड़ नौकरियां पैदा करने की जरूरत है लेकिन इसकी आधी ही नौकरियां पैदा हो रही हैं. ऐसे में असंतोष लाजिमी है. जेन ज़ी आंदोलन के तौर पर यही असंतोष सड़कों पर दिख रहा है.

प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा के मुताबिक़ 2012 के मुक़ाबले 2017-18 के बीच ‘ग्रेजुएट बेरोजगारी’ की तादाद दोगुनी हो गई थी. बेरोजगारों की इस बढ़ती तादाद के मुक़ाबले रोजगार आधा भी नहीं पैदा हो रहा है.

देश में सरकारी कौशल विकास कार्यक्रम नतीजे नहीं दे पा रहे हैं. पिछले एक दशक में जिन 1.6 करोड़ लोगों को प्रशिक्षण दिया गया, उनमें से केवल 15 फ़ीसदी को ही रोज़गार मिला.

प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा सरकार के स्किलिंग प्रोग्राम की भी आलोचना करते हैं.

उनका कहना है कि स्किलिंग प्रोग्राम को ‘सरकारी बाबू’ चला रहे हैं, जिन्हें पता ही नहीं है कि इंडस्ट्री के नए उभरते क्षेत्रों के लिए किस तरह की स्किल की जरूरत है.

उनका कहना है कि जो लोग इंडस्ट्री चला रहे हैं उनके हाथ में फ़ैसले लेने की ताक़त नहीं है. जहां प्राइवेट सेक्टर और एम्प्लॉयर को फ़ैसले लेने चाहिए, वहां सरकारी बाबू फ़ैसले ले रहे हैं.

संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, ”हाई स्किल वाले आईटी और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे सेक्टर में ग्रोथ घट गई है. इसलिए भी ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी बढ़ी है. हालात इतने ख़राब हैं कि निराश होकर बड़ी तादाद में ऐसे युवा रोजगार ढूंढना छोड़ चुके हैं. हमारे आंकड़ों के मुताबिक़ 2012 में ऐसे बेरोजगारों की संख्या 5 करोड़ थी और अब ये बढ़कर दस करोड़ हो गई है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS