Home National news hindi मनीज़ा बख़्तारी: अफ़ग़ानिस्तान राजनयिक जिन्होंने तालिबान शासन में भी नहीं छोड़ा पद,...

मनीज़ा बख़्तारी: अफ़ग़ानिस्तान राजनयिक जिन्होंने तालिबान शासन में भी नहीं छोड़ा पद, एक कमरे से चला रही हैं दूतावास

7
0

Source :- BBC INDIA

ManizhaBakhtari

पढ़ने का समय: 7 मिनट

साल 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार गिर गई और तालिबान ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया तो तालिबान अधिकारियों ने मनीज़ा बख़्तारी से अपना पद छोड़ने के लिए कहा.

लेकिन ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत मनीज़ा बख़्तारी ने तालिबान की यह मांग मानने से इनकार कर दिया. इसी वजह से उन्हें ‘आख़िरी राजदूत’ भी कहा जाता है.

बीबीसी न्यूज़ के साथ एक इंटरव्यू में मनीज़ा बख्तारी ने बताया कि साल 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार गिर गई और तालिबान सत्ता में आया तो वह क़रीब 24 घंटों तक बहुत परेशान रहीं. इस दौरान वे लगातार सोचती रहीं कि अब उन्हें क्या करना चाहिए.

वह कहती हैं, “जिस समूह को हम एक दिन पहले तक चरमपंथी कहते थे, वही अब देश चला रहा था.”

‘मुझे चुनी हुई सरकार ने भेजा, मैं पद क्यों छोड़ूं’

Taliban in Afghanistan 1996

मनीज़ा बख़्तारी के मुताबिक़, उन्हें लगा कि महिला होने की वजह से तालिबान सरकार उन्हें ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत के पद से हटाना चाहेगी.

उनके मन में यह सवाल भी था कि अगर वह तालिबान की मांग मानकर पद छोड़ देती हैं तो दूतावास और वहां रखे संवेदनशील दस्तावेज़ों का क्या होगा?

आख़िरकार उन्होंने पद पर बने रहने का फ़ैसला किया.

वह कहती हैं, “मुझे एक चुनी हुई सरकार ने अपने देश और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेश भेजा था. फिर मैं पद क्यों छोड़ूं?”

हालांकि, तालिबान अधिकारियों ने कुछ साल पहले ही उन्हें उनके पद से हटा दिया था, लेकिन मनीज़ा बख़्तारी विरोध के तौर पर अब भी ख़ुद को अफ़ग़ानिस्तान का राजदूत मानती हैं.

वह ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान का दूतावास अपने सिद्धांतों और शर्तों के मुताबिक़ चला रही हैं.

बीबीसी न्यूज़ ने हाल ही में एक इंटरव्यू के ज़रिए उनकी कहानी जानने की कोशिश की.

जब मनीज़ा बख़्तारी को अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा

Manizha Bakhtari

मनीज़ा बख़्तारी का जन्म अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हुआ था. वह बताती हैं कि उनका परिवार जिस अपार्टमेंट में रहता था, वह एक ऐसे इलाक़े में था जहां ज़्यादातर मध्यवर्गीय परिवार रहते थे.

उनके पिता अफ़ग़ानिस्तान के जाने-माने कवि, लेखक और विचारक थे. साहित्यिक और राजनीतिक हलक़ों में उनकी अच्छी पहचान थी.

वह अपनी मां के बारे में बताती हैं, “हालांकि मेरी मां उन हलक़ों में बहुत मशहूर नहीं थीं, लेकिन वह अफ़ग़ानिस्तान के उस शिक्षित समाज का हिस्सा थीं जिसने आधुनिकता को अपनाया था. उनके कपड़े उस दौर की दूसरी महिलाओं के मुक़ाबले काफ़ी आधुनिक थे. वह ऑड्री हेपबर्न की तरह अपने बाल संवारती थीं.”

मुजाहिदीन का उभार और परिवार पर असर

@ManizhaBakhtari

जब उनसे पूछा गया कि मुजाहिदीन के उभार ने अफ़ग़ानिस्तान और उनके परिवार की ज़िंदगी को किस तरह प्रभावित किया, तो उन्होंने बताया कि उस दौर में उनके पिता को उनके विचारों की वजह से जेल में डाल दिया गया था.

वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि उस समय मेरी उम्र सिर्फ़ सात साल थी. मुझे पता था कि पिता घर पर नहीं हैं. मेरी मां ने एक कहानी बनाई कि हमारे पिता हमारे लिए खिलौने और कपड़े लेने गए हैं, लेकिन हम सच जानते थे क्योंकि हम अपनी मां को रोते हुए देखते थे और उनकी आंखें लाल होती थीं.”

मनीज़ा बख़्तारी बताती हैं कि 1990 के दशक में जब तालिबान की सेना काबुल में दाख़िल हुई तो उनके पिता को तुरंत ख़तरा महसूस होने लगा. उन्होंने फ़ैसला किया कि उन्हें जल्द से जल्द देश छोड़ देना चाहिए.

उनके पिता उन्हें और उनकी बहन को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन तब तक मनीज़ा की शादी हो चुकी थी और उनका अपना परिवार था. इसलिए वह अफ़ग़ानिस्तान में ही रुक गईं.

1996 में जब तालिबान ने पहली बार अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा किया तो उनके पति ने भी देश छोड़ने का बड़ा फ़ैसला लिया. इसकी एक वजह अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह का शव चौक पर लटकते देखना था.

पाकिस्तान पलायन और मुश्किलों भरा सफर

अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह (फ़ाइल फ़ोटो)

मनीज़ा बख़्तारी कहती हैं, “अगर मेरे पिता देश छोड़कर नहीं गए होते तो उनका भी वही अंजाम होता जो नजीबुल्लाह का हुआ था.”

उन्होंने बताया कि हालात को देखते हुए उन्होंने भी हजारों अन्य लोगों की तरह अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान जाने का फैसला किया.

पाकिस्तान के सफर के दौरान, बख़्तारी अपने बच्चों को लेकर बहुत चिंतित थीं. वह कहती हैं, “हमें कई अन्य लोगों के साथ एक मिनीबस में निकलना पड़ा. उस छोटी सी वैन में हम इतने सारे लोग ठुंसे हुए थे कि सांस लेना भी लगभग नामुमकिन हो गया था.”

बख़्तारी बताती हैं कि जब वे सीमा पर पहुंचे तो वहां किसी के पास भी पासपोर्ट नहीं था.

उनके अनुसार, पाकिस्तान पहुंचने के बाद शुरुआती कुछ महीनों तक गुज़ारा करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे थे. बाद में विदेश में रहने वाले उनके रिश्तेदारों ने उनकी मदद की.

काबुल वापसी और विदेश मंत्रालय में नौकरी

अफ़ग़ानिस्तान

11 सितंबर 2001 के हमलों और उसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के चलते तालिबान की सत्ता का पतन हो गया. इसके बाद पाकिस्तान में रह रहे अफ़ग़ानिस्तान के कई दूसरे शरणार्थियों की तरह मनीज़ा बख़्तारी ने भी अपने देश लौटने का फ़ैसला किया.

वह इसे अपनी ज़िंदगी के सबसे अच्छे पलों में से एक बताती हैं. वह कहती हैं, “यह किसी जादुई अनुभव जैसा था.”

मनीज़ा बताती हैं कि उस समय वह पढ़ाने का काम कर रही थीं तभी अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे संपर्क किया गया.

वह कहती हैं, “उस समय मैं काबुल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर थी और एक ग़ैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के साथ भी काम कर रही थी. तभी मुझे अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री का फ़ोन आया.”

उनके मुताबिक़, उस समय विदेश मंत्रालय अपनी टीम में युवा महिलाओं को शामिल करने की कोशिश कर रहा था. इसकी वजह यह थी कि तालिबान के शासन के दौरान कई महिलाएं देश छोड़कर चली गई थीं और वे वापस लौटना नहीं चाहती थीं.

मनीज़ा के लिए विदेश मंत्रालय में काम करना एक बड़ी परीक्षा जैसा था.

वह कहती हैं, “आज मुझे अपने उस फ़ैसले पर कोई पछतावा नहीं है, लेकिन यह आसान नहीं था. मुझे पढ़ाना छोड़ना पड़ा, अपने छात्रों से दूर होना पड़ा और अपने बचपन के सपने को भी छोड़ना पड़ा.”

तालिबान की सत्ता में वापसी

15 अगस्त 2021 को तालिबान के लड़ाके काबुल में दाख़िल हुए थे

साल 2021 में जब तालिबान ने एक बार फिर काबुल पर क़ब्ज़ा किया उस समय मनीज़ा बख़्तारी ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत थीं.

वह कहती हैं कि यह ऐसा समय था जब उन्हें नैतिक रूप से स्पष्ट रुख़ अपनाना था और एक मुश्किल फ़ैसला लेना था.

वह बताती हैं, “मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में यह सब कैसे हो गया. राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के देश छोड़ने वाले दिन भी मुझे लग रहा था कि ऐसा नहीं हो सकता.”

सरकार के पतन के बाद विदेशों में तैनात कई राजनयिकों के सामने भी अनिश्चितता की स्थिति थी.

वह कहती हैं, “जिस समूह को हम एक दिन पहले तक चरमपंथी कहते थे, वही अब देश चला रहा था.”

“मैं 24 घंटे तक यही सोचती रही कि मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे अपना सामान समेटकर चले जाना चाहिए और अपने सहयोगियों से भी ऐसा ही करने को कहना चाहिए?”

‘मैं तालिबान के सामने समर्पण नहीं करूंगी’

मनीज़ा के मुताबिक़, इसके बाद तालिबान के अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया. उन्होंने कहा कि वे सभी राजनयिकों के साथ ज़ूम पर एक बैठक करना चाहते हैं. लेकिन मनीज़ा ने इस बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया.

वह बताती हैं कि 2022 में उन्हें तालिबान सरकार की ओर से एक चिट्ठी मिली, जिसमें उन्हें पद से हटाए जाने की जानकारी दी गई थी.

उन्हें काफी समर्थन हासिल था और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तालिबान सरकार को अफ़ग़ानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं दी थी. मनीज़ा ने विरोध स्वरूप अपने पद पर काम करना जारी रखने का फैसला किया.

वह कहती हैं, “मुझे लगा कि अब मैं इस दूतावास को अपनी शर्तों और अपने सिद्धांतों के मुताबिक़ चला रही हूं. मैं तालिबान के सामने आत्मसमर्पण नहीं करूंगी.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS