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अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिकी सरकार के वित्त विभाग के आंकड़ों से यह जानकारी सामने आई है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुताबिक़, अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के अनुपात में उसका राष्ट्रीय कर्ज़ 125.8% हो गया है.
दिलचस्प ये है कि बीते एक दशक में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज़ दो गुना हो गया है और कांग्रेसनल बजट ऑफिस (सीबीओ) का अनुमान है कि 2036 तक यह 64 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच जाएगा.
अमेरिका के बढ़ते कर्ज़ को लेकर ईरान ने भी तंज़ किया है, जिसके साथ पिछले पांच महीने से अमेरिका संघर्ष में उलझा हुआ है.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची न्यूयॉर्क टाइम्स और सीएनएन की ख़बरों को साझा करते हुए एक्स पर लिखा, “तथाकथित ‘इकोऩॉमिक डी-डे’ अमेरिका के अपने संकट से ध्यान भटकाने की कोशिश है.”
दरअसल ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के बीच चली एक महीने से अधिक समय तक खुली जंग के बाद इस्लामाबाद समझौता हुआ था, जिसमें 60 दिनों के अंदर सहमति बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई थी.
इसी का हवाला देते हुए अराग़ची ने आगे लिखा, “अभूतपूर्व कर्ज़ और बढ़ती ब्याज़ लागत. नाकाम नीतियों पर और ज़ोर देने से केवल एक और हार और ईरानियों की दुश्मनी ही मिलेगी. अमेरिकी आर्थिक आतंकवाद दुनिया भर की वैश्विक अर्थव्यवस्था और संप्रभुता के लिए ख़तरा है.”
क़रीब पांच महीने से अधिक समय से अमेरिका ईरान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है जिसकी वजह से होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले 20 प्रतिशत वैश्विक ईंधन की आपूर्ति बाधित है.
इसका असर कच्चे तेल के दाम में तो पड़ ही रहा है, अमेरिका के घरेलू उपभोक्ताओं पर भी इसका असर हो रहा है.
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिका पर बढ़ता कर्ज़ का बोझ उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
बीबीसी की एक स्टोरी के मुताबिक़, सिंगापुर नेशनल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर डेविड जैक्स का मानना है कि अगर अमेरिका अपने कर्ज़ का प्रबंधन ठीक से नहीं कर पाया तो 2008 जैसे आर्थिक संकट के हालात पैदा हो सकते हैं.
राष्ट्रीय कर्ज की बढ़ती रफ़्तार

कांग्रेसनल बजट ऑफ़िस का अनुमान था कि वित्त वर्ष 2026 के अंत तक कुल राष्ट्रीय कर्ज़ 39.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. लेकिन जिस रफ़्तार से कर्ज़ बढ़ा, उसने चिंता बढ़ा दी है.
सीबीओ ने कहा कि अमेरिका 41.1 ट्रिलियन डॉलर की कर्ज सीमा के करीब पहुंच रहा है.
साल 2016 में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज़ 20 ट्रिलियन डॉलर के आस पास था लेकिन ट्रंप और बाइडन प्रशासन के कार्यकाल में भारी खर्च और ब्याज़ भुगतान दोनों ने कर्ज़ बढ़ोत्तरी की रफ़्तार को बढ़ाया है.
अमेरिकी ट्रेज़री के आकंड़ों के अनुसार, 18 अगस्त यानी बीते मंगलवार तक कर्ज़ 40.05 ट्रिलियन डॉलर था जिसमें ट्रेज़री के सभी बकाया बॉन्ड, बिल और नोट्स शामिल हैं.
लेकिन इस कर्ज़ से जुड़ा एक पहलू ये भी है कि बॉन्ड पर यील्ड (यानी ब्याज़ दर) भी बढ़ रहा है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, 30 साल की अवधि वाले बॉन्ड पर ब्याज़ दर, बीते मंगलवार को 5.34% पर पहुंच गई जोकि 20 वर्षों में यह सबसे उच्चतम स्तर पर है.
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़, पिछले साल के मुक़ाबले इस साल 2.97 ट्रिलियन डॉलर कर्ज बढ़ा है जोकि 7.8 प्रतिशत वृद्धि है.
इसका मतलब ये है कि अमेरिकी सरकार को बॉन्ड के बदले अधिक ब्याज़ चुकाना होगा, जोकि उसके खर्च का पहले से ही एक बड़ा हिस्सा बन चुका है.
बॉन्ड यील्ड में हालिया बढ़ोतरी का एक कारण अमेरिका-ईरान जंग की वजह से तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण मानी जा रही है और अब निवेशकों को महंगाई बढ़ने की चिंता सता रही है.
किन कारणों से इतना बढ़ा कर्ज़?

जाने-माने अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे अरुण कुमार का कहना है कि अमेरिका का कर्ज़ बढ़ने के दो कारण हैं एक तो ब्याज़ का मद और दूसरा डिफ़ेंस बजट.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “जंग की वजह से डिफ़ेंस बजट को 500 बिलियन डॉलर बढ़ाकर डेढ़ ट्रिलियन डॉलर किया जा रहा है. दूसरी वजह है ब्याज़ की अदायगी का बढ़ना क्योंकि वो कर्ज़ लगातार ले रहे हैं. इसकी वजह से ब्याज़ अदायगी खर्च में दूसरे स्थान पर आ गया है.”
रॉयटर्स के संवाददाता डेविड लॉडर का भी कहना है कि यह ‘टिकाऊ स्थिति नहीं’ है, क्योंकि सालाना ब्याज़ खर्च सैन्य खर्च से भी ज़्यादा हो गया है.
चिंता ट्रंप प्रशासन के अंदर भी है. हाल ही में अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक टीवी चैनल पर कहा, “समस्या ये है कि अमेरिका का कर्ज़ उसकी जीडीपी से भी तेज़ गति से बढ़ रहा है. हमें उसे ठीक करना होगा.”
हालांकि वेंस ने कर्ज़ तेज़ी से बढ़ने के लिए पूर्ववर्ती बाइडन सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया.
लेकिन प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “सरकारी ख़र्चों में पहले नंबर पर मेडिक्लेम जैसी सोशल सिक्यूरिटी है. लेकिन इसमें और मुसीबत तब हुई जब पिछली बार ट्रंप ने ‘बिग ब्युटिफ़ुल बजट’ जारी किया तो कारपोरेट टैक्स में कमी कर दी, जिससे टैक्स कलेक्शन कम हुआ. ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि टैरिफ़ से होने वाली आमदनी से वो इस गैप को भर पाएंगे लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया.”
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2026 के वित्त वर्ष में जुलाई में बजट खर्च में पहले नंबर पर सोशल सिक्यूरिटी का खर्च 1,384 अरब डॉलर था.
दूसरे नंबर पर मेडिकेयर था, जिस पर 955 अरब डॉलर खर्च हुए. तीसरे नंबर पर ब्याज़ अदायगी पर 931 अरब डॉलर खर्च हुआ.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार के अनुसार, अब टैरिफ़ से जो क़रीब 160 बिलियन डॉलर की आमदनी की उम्मीद थी, वो धाराशाई हो गई है, “इस तरह संकट दोतरफ़ा है. एक तरफ़ तो राजस्व यानी रेवेन्यू कम हुआ और दूसरी ओर खर्चे बढ़ गए.”
हालांकि अर्थशास्त्री बीते एक दशक में तेज़ी से कर्ज़ बढ़ने के पीछे वैश्विक परिस्थियों को भी कारण बताते हैं.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “जब ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति बने तो उसके ठीक बाद कोरोना महामारी का दौर शुरू हो गया, जिसकी वजह से बहुत अधिक खर्च करना पड़ा.”
“ट्रंप के समय क़रीब 7 ट्रिलियन और बाइडन के समय क़रीब 8 ट्रिलियन डॉलर खर्च करना पड़ा. 15 ट्रिलियन डॉलर तो सिर्फ़ पैंडेमिक की वजह से खर्च हुए. और पिछले डेढ़ साल में ट्रंप जो कर रहे हैं, उससे यह और बढ़ रहा है.”

अमेरिका क्या उपाय कर रहा है?
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अमेरिकी ट्रेज़री विभाग ने बुधवार को घोषणा की कि वह 9 सितंबर से 4 नवंबर तक अपने बॉन्ड ‘बायबैक’ ऑपरेशन को 2 बिलियन डॉलर से दोगुना करके 4 बिलियन डॉलर करेगा. लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कर्ज़ के पहाड़ के आगे ये कोशिश मामूली है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रेज़री का यह उपाय, अमेरिकी कर्ज़ संकट को हल नहीं कर सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 में अबतक अमेरिकी सरकार ने ब्याज़ के मद में 1.17 ट्रिलियन डॉलर की अदायगी की है, जोकि पिछले साल इसी अवधि से 15 प्रतिशत अधिक है.
कर्ज़ बढ़ने से ये भी डर सता रहा है कि कहीं कर्ज़ ड्यू होने की स्थिति न पैदा हो जाए, हालांकि प्रोफ़ेसर अरुण कुमार इस आशंका को ख़ारिज करते हैं.
वो कहते हैं, “पूरी दुनिया में डॉलराइजेशन के चलते अमेरिका जितना चाहे उतना कर्ज़ ले सकता है. आज भी दुनिया का क़रीब 60 प्रतिशत लेनदेन डॉलर में होता है. बाक़ी देश उसे रिज़र्व के रूप में रखते हैं.”
“अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का एक तिहाई है और उसमें ग्रोथ भी है, जिससे यह उम्मीद है कि इस कर्ज के बढ़ते बोझ से वो खुद को बचा ले जाएगा.”
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार के मुताबिक़, “अमेरिका की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है. इमिग्रेशन को लेकर ट्रंप की नीतियों जो भी हों, लेकिन उसने घरेलू रोज़गार बाज़ार को बढ़ाया है. निवेश बढ़ा है. ट्रंप ने जापान, यूरोप, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों से भारी निवेश का दबाव डाल रहे हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) के विकास को लेकर अमेरिका में भारी निवेश हो रहा है.”
वो कहते हैं कि एक तरह से देखा जाए तो पिछले एक डेढ़ साल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फ़ायदा ही हुआ है. बेरोज़गारी दर भी घटी है. समस्या तब होगी जब वैश्विक बाज़ार में नक़दी की कमी होने लगे, हालांकि अभी फ़ेडरल रिज़र्व ने दुनिया में काफ़ी लिक्विडिटी जारी कर रखी है.
कर्ज़ बढ़ने को लेकर ट्रंप की नीतियों की भी आलोचना हो रही है. सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति का 2016 के एक भाषण की क्लिप वायरल हो रही है जिसमें उन्होंने कुछ अर्थशास्त्रियों का हवाला देते हुए चेतावनी दी थी कि ‘राष्ट्रीय कर्ज़ में 24 ट्रिलियन डॉलर वह सीमा है जहां से लौटना असंभव है.’
विडंबना है कि 10 साल में यह 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है.
बाक़ी देशों पर असर
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प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का कहना है कि बीते कुछ सालों में अमेरिका में एआई में क़रीब 600 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ है.
हालांकि कुछ अर्थशास्त्री आशंका जता रहे हैं कि एआई एक ‘बबल’ (गुब्बारा) है और जब यह फूटेगा तो एक नया संकट पैदा होगा.
लेकिन प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का मानना है कि नजदीकी भविष्य में ऐसा होता दिख नहीं रहा है.
वो कहते हैं, “एआई का परिदृष्य हर महीने तेज़ी से बदल रहा है. जो बदलाव दशकों या एक सदी में होते थे वो अब कुछ घंटों में होने लगे हैं. हर क्षेत्र में एआई का दख़ल बढ़ रहा है. हां यह दूसरे किस्म का संकट पैदा कर सकता है और वो है भारी बेरोज़गारी. ये चुनौती साफ़ दिखने लगी है.”
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार की ये आशंका निराधार नहीं है. बुधवार को ही अमेरिकी अरबपति एलन मस्क ने निविडा के सीईओ जेनसेन हुआंग की एक बातचीत का वीडियो साझा करते हुए एक्स पर लिखा, “या तो ये होगा या कर्ज़ के नीचे दबकर कुचल जाएंगे.”
दरअसल, जेनसेन हुआंग बातचीत में कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि ‘आने वाले समय में लाखों लाख रोबोट्स जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देंगे, क्योंकि उद्योग जगत लेबर की कमी से जूझ रहा है.’
हालांकि इसका दूसरा पहलू है कि अधिक से अधिक काम रोबोट या एआई करेंगे तो दुनिया में बेरोज़गारी बढ़ेगी.
एक चिंता ये भी है कि तकनीकी कंपनियों ने एआई में भारी भरकम निवेश के लिए बड़ी मात्रा में नकदी उधार ले रखा है या ले रहे हैं. लेकिन इस निवेश पर रिटर्न कब और कितना मिलेगा, इसकी अभी कोई गारंटी नहीं साफ़ नहीं है.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, “जैसे डॉट कॉम बबल फूटा था, अगर एआई के साथ भी ऐसा हुआ तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए नया संकट खड़ा हो जाएगा और उसका असर पूरी दुनिया पर होगा. अभी तो इसका असर ये है कि भारत समेत पूरी दुनिया से निवेश खिंचकर अमेरिका जा रहा है.”
उनके अनुसार, “भारत में विदेशी निवेश वैसे भी कम हो रहा है और टेक्नोलॉजी में कोई ख़ास प्रगति न होने के चलते यह बहुत आकर्षक बाज़ार नहीं रहा. उधर, अगर अमेरिकी ट्रेज़री ब़ॉन्ड्स में यील्ड बढ़ेगा तो पूंजी अमेरिका की ओर जाएगी.”
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