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पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों ने सऊदी अरब पर हूती हमलों को लेकर चिंता ज़ाहिर की है और सवाल उठाया है कि हालिया मक्का रक्षा समझौते के तहत क्या इस्लामाबाद क्षेत्रीय युद्ध में फंस सकता है.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने बीते 8 सितंबर चेतावनी दी थी कि यह समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान को इस बात के लिए बाध्य करता है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा.
उन्होंने कहा था कि किसी भी ‘बिना उकसावे की आक्रामकता’ या यमन संघर्ष के सऊदी अरब तक फैलने की स्थिति में यह समझौता लागू किया जा सकता है.
जियो न्यूज के एक टीवी कार्यक्रम में आसिफ़ के हवाले से कहा गया कि समझौते के प्रावधानों को लेकर ‘कोई अस्पष्टता नहीं’ है.
हालांकि, आसिफ़ ने यह भी कहा कि इस्लामाबाद को स्थिति के नियंत्रण में रहने की उम्मीद है.
क्या पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है
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इस बीच, द न्यूज़ अख़बार ने रॉयटर्स की एक रिपोर्ट को प्रमुखता दी.
इसमें अज्ञात सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि सऊदी अरब ने इस्लामाबाद के मार्फत ईरान को यह संदेश पहुंचाया था कि वो हूती हमलों को रोकने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे.
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के एक सूत्र ने कहा कि सऊदी अधिकारियों ने रियाद में पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की थी ताकि जवाबी कार्रवाई को लेकर तालमेल किया जा सके.
तीनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि उनके सैनिक यमन में प्रवेश नहीं करेंगे और किसी भी जवाबी कार्रवाई की शुरुआत सऊदी क्षेत्र से की जाएगी.
हालांकि, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर ख़ान ने 10 सितंबर को इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया और इसे ‘बेबुनियाद’ बताया.
ख़ान ने एक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा, “फ़िलहाल पाकिस्तान और किसी भी पक्ष के बीच इस तरह के किसी प्रस्ताव या मामले को लेकर कोई बातचीत नहीं हो रही है.”
उन्होंने यह भी दोहराया कि मक्का समझौता “क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मुख्य रूप से रोकथाम के जरिए बनाया गया एक रक्षा समझौता है.”
स्थानीय मीडिया के अनुसार, उन्होंने कहा कि यह अभी गठन के शुरुआती चरण में है और इसे लागू करने के लिए ‘और समय की जरूरत है.’
पाकिस्तानी मीडिया में मांगी सफ़ाई

पाकिस्तान के अखबारों ने 10 सितंबर को इस्लामाबाद से मक्का समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट करने की मांग की.
कई अखबारों ने क्षेत्रीय स्थिरता और तनाव कम करने को प्राथमिकता देने की ज़रूरत पर जोर दिया.
‘द नेशन’ अख़बार ने कहा कि आसिफ़ की चेतावनी ‘सावधानी से विचार किए जाने लायक है.’
अख़बार ने लिखा, “सऊदी सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान की प्रतिबद्धता लंबे समय से है, लेकिन इस्लामाबाद को उन परिस्थितियों की ‘ठोस व्याख्या’ करनी चाहिए जिनमें पाकिस्तान की जिम्मेदारियां लागू होंगी.”
“साथ ही, किसी भी सैन्य हस्तक्षेप की प्रकृति, गठबंधन के ‘फ़ैसले लेने के तरीके’ और किसी भी प्रतिबद्धता के ‘संभावित प्रभावों’ को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए.”
अख़बार ने ज़ोर देकर कहा, “पाकिस्तान को अपने साझेदारों के प्रति ज़िम्मेदारियों के साथ अपनी सुरक्षा, आर्थिक हितों और मुस्लिम दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा.”
इसी तरह, ‘डेली टाइम्स’ ने रक्षा मंत्री की टिप्पणियों को प्रमुखता देते हुए लिखा, “हूतियों की मिसाइलों की बौछार, इस समझौते के लिए जमीनी स्तर पर एक परीक्षा बनकर सामने आई है.”
अखबार ने लिखा, “इससे पहले कि मिसाइलों का एक और दौर तीनों देशों बीच मक्का समझौते के बारे में कोई फ़ैसला करे, उससे पहले इसके बारे में स्पष्ट किया जाना चाहिए.”
अख़बार ने 2015 में पाकिस्तान के फ़ैसले का भी जिक्र करते हुए लिखा, “उस समय इस्लामाबाद ने यमन में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जबकि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने की प्रतिबद्धता जताई थी.”
“मक्का समझौते को इस नीति को ख़त्म करने के बजाय इसे और ज़्यादा स्पष्ट बनाना चाहिए.”
पाकिस्तान क्यों है असहज
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‘डेली टाइम्स’ ने लिखा, “रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद जब क्षेत्रीय सुरक्षा की ज़्यादा ज़िम्मेदारी लेने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसका मतलब युद्धों में शामिल होने की ज़्यादा क्षमता के बजाय उन्हें रोकने की ज़्यादा क्षमता होना चाहिए.”
‘पाकिस्तान टुडे’ ने कहा, “हूती हमलों ने एक बार फिर पाकिस्तान को सीधे असहज स्थिति में डाल दिया है.”
अख़बार के अनुसार, “सऊदी अरब ने मक्का समझौते को लागू करने की मांग नहीं की है…अगर उसने ऐसा किया, तो क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा.”
अख़बार ने यह भी कहा, “अब तक इस गठबंधन की मंत्रीस्तरीय और सैन्य समितियों की सिर्फ़ एक बैठक हुई है और किसी संयुक्त कार्रवाई की संभावना कम है.”
अख़बार ने कहा, “सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या तीन देशों का यह गठबंधन ऐसा क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा तैयार कर सकता है, जो ईरान के साथ संघर्ष के दौरान वो काम अंजाम दे सके जो अमेरिका नहीं कर पाया.”
इस बीच, उर्दू अख़बार ‘एक्सप्रेस’ ने सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए इस्लामाबाद के समर्थन का पक्ष लिया और कहा कि ‘संतुलन ज़रूरी है.’
अख़बार ने कहा, “सऊदी अरब के साथ संबंध पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं लेकिन इस्लामाबाद को क्षेत्र में जंग को और फैलने से रोकने के लिए कूटनीतिक भूमिका भी निभानी चाहिए.”
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SOURCE : BBC NEWS




