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इस साल 14 मई को सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने एक बहुत अहम मुद्दे पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है.
माना जा रहा है कि इस फ़ैसले का असर इस बात पर पड़ेगा कि भारत में लोग अपने धर्म का पालन किस तरह कर सकते हैं.
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा फ़ैसला दिया था. इस फ़ैसले के मुताबिक़, 10 से 50 साल की उम्र की स्त्रियों को भी मंदिर में जाने की इजाज़त दी गई थी. मौजूदा मामला इसी फ़ैसले से जुड़ा है.
50 से ज़्यादा याचिकाओं ने साल 2018 के उस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. इसमें सबरीमाला के मुख्य पुजारी, कई संगठन और व्यक्ति शामिल थे.
इसकी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि इस मुद्दे में कई ऐसे सवाल हैं, जिन पर एक बड़ी पीठ को फ़ैसला लेना होगा. इसलिए यह मामला नौ जजों की एक संविधान पीठ को सौंप दिया गया.
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भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान में धर्म एक पेचीदा मुद्दा रहा है. संविधान में भारत के हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार दिया गया है. हालाँकि, साथ-साथ यह भी कहा गया है कि कुछ बिंदुओं पर इस अधिकार पर पाबंदी लगाई जा सकती है.
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ धर्म की आज़ादी और उसकी पाबंदी से जुड़े कई सवालों पर फ़ैसला करेगी. आने वाले कई सालों, शायद दशकों, तक इसका असर दिखेगा.
पूरा मामला क्या है?
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इस मामले को समझने के लिए पहले संवैधानिक ढाँचे को जानना होगा. ख़ासकर अनुच्छेद-25 और 26 को समझना होगा.
संविधान का अनुच्छेद 25 कहता है कि हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार है.
हालाँकि, इस अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि इस अधिकार पर कुछ बिंदुओं पर पाबंदियाँ लगाई जा सकती हैं. वे हैं: लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और संविधान में दिए गए बाक़ी सारे मौलिक अधिकार.
साथ ही यह भी कहा गया है कि धार्मिक आचरण से संबंधित किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक और अन्य धर्मनिरपेक्ष कार्यों पर सरकार नियम बनाकर उसे नियंत्रित कर सकती है. यही नहीं, सामाजिक कल्याण या फिर हिंदू धार्मिक संस्थाओं में हर वर्ग के हिंदू को जाने या शामिल होने का अधिकार देने के लिए भी सरकार क़ानून बना सकती है.
वहीं, अनुच्छेद 26 कहता है कि लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए हर धार्मिक संप्रदाय को अपने धर्म से जुड़े कामों का प्रबंध करने की पूरी आज़ादी है.
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कई साल से इन दो अनुच्छेदों पर बहस जारी है, जिसके मुख्य मुद्दे ये हैं –
- कोर्ट और सरकार धर्म के मामलों में कितना दख़ल दे सकती हैं?
- कौन से काम धार्मिक माने जाएँगे, जिसमें सरकार दख़ल नहीं दे सकती?
- कौन से काम आर्थिक या धर्मनिरपेक्ष माने जाएँगे जिसमें सरकार का दख़ल देना संवैधानिक है?
- अगर कोई धार्मिक काम संविधान में दिए गए बाक़ी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो ऐसे में कौन सा अधिकार ज़्यादा ज़रूरी माना जाएगा?
इस सिलसिले में कई अहम मुद्दों पर कई सालों से अदालतों ने फ़ैसले दिए हैं. जैसे- सरकार मंदिरों में पुजारियों को नियुक्त कर सकती है या नहीं? क्या बकरीद पर गायों की क़ुर्बानी देना इस्लाम में ज़रूरी है?
क्या दाऊदी बोहरा समाज के मुखिया के पास किसी को धर्म से बेदख़ल करने की शक्ति है? क्या जैन समाज में लोगों को मृत्यु तक उपवास रखने की इजाज़त देनी चाहिए? क्या किसी महिला को तीन तलाक़ देना संवैधानिक है?
मुख्य बहस – कौन सी प्रथा है धर्म का अनिवार्य हिस्सा
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सुप्रीम कोर्ट ने इन सवालों के जवाब देने के लिए 1950 के दशक से ही एक ‘एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिसेज टेस्ट’ यानी किसी धर्म की ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ की कसौटी को जन्म दिया है. इसके तहत ये देखा जाता है कि जिस प्रथा की बात हो रही है, वह उस धर्म के लिए ज़रूरी है या नहीं.
हालाँकि, सालों से इस ‘टेस्ट’ की बहुत आलोचना हुई है. मुख्य आलोचना यह है कि जजों को संवैधानिक और क़ानूनी मामलों की समझ होती है लेकिन वे धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ नहीं हैं.
ये सारी बातें सबरीमाला मंदिर के मामले में भी उठी. केरल के भगवान अयप्पा के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं थी. ये उनके मेंस्ट्रुएशन यानी माहवारी के कारण था.
2018 में मिली थी प्रवेश की इज़ाजत, फ़ैसले को चुनौती मिली
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साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ में चार जजों ने अपने फ़ैसले में यह कहा कि हर महिला को सबरीमाला मंदिर में जाने की इजाज़त होगी.
इसमें तीन जजों का कहना था कि स्त्रियों को मंदिर में प्रवेश से रोकने की यह प्रथा हिंदू धर्म के लिए ज़रूरी नहीं है.
हालाँकि, पाँच में से एक जज बाक़ी चार के फ़ैसले से सहमत नहीं थीं. उनका ये कहना था कि एक धर्मनिरपेक्ष समाज में अदालतों को यह नहीं बताना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथाओं का पालन करना चाहिए और किन प्रथाओं का पालन नहीं करना चाहिए.
सबरीमाला से जुड़े इस फ़ैसले का बहुत विरोध हुआ था. फ़ैसले के तुरंत बाद ही इसे सुप्रीम कोर्ट में फिर से चुनौती दी गई. साल 2019 में तीन बनाम दो जजों ने इस फ़ैसले पर पुनर्विचार यानी रिव्यू करने की याचिकाओं को लंबित रखते हुए मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई ऐसे सवाल हैं जिन पर एक बड़ी बेंच के फ़ैसले की ज़रूरत है. इसलिए मामले को नौ जजों की एक बेंच को सौंप दिया गया. इसकी सुनवाई इस साल 2026 में हुई.
एक बात पर गौर करने की ज़रूरत है कि नौ जज की बेंच अपने फ़ैसले में सीधे तौर पर यह नहीं तय करेगी कि साल 2018 में दिया गया फ़ैसला सही था या नहीं.
कोर्ट धर्म के मौलिक अधिकार से जुड़े कुछ सिद्धांतों पर अपना निर्णय देगा. इसके आधार पर एक दूसरी बेंच सबरीमाला के मुद्दे पर अपना फ़ैसला देगी.
इस फ़ैसले से केवल सबरीमाला ही नहीं, कई दूसरे धर्मों से जुड़े मामलों पर भी फ़र्क़ पड़ेगा.
कोर्ट के सामने क्या सवाल हैं
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अब समझते हैं कोर्ट के सामने क्या सवाल हैं, जिन पर वह अपना फ़ैसला देगा. कोर्ट के सामने सात सवाल हैं. इनमें से कुछ सवाल हैं:
- कोर्ट किस हद तक किसी भी धार्मिक प्रथा की संवैधानिकता तय कर सकता है?
- अनुच्छेद-25 के तहत धर्म के अधिकार का दायरा क्या है और उसे अनुच्छेद-26 के साथ कैसे देखा जाए? किसी धार्मिक संप्रदाय के अनुभाग की परिभाषा कैसे दी जाएगी?
- जब ‘सदाचार’ की बात होती है, तो उसका क्या मतलब होता है? और उसका मतलब क्या होगा- संवैधानिक सदाचार या सामाजिक सदाचार?
- क्या कोई व्यक्ति अपने धर्म से अलग किसी दूसरे धर्म की प्रथा के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर कर सकता है?
अलग-अलग पक्षों ने क्या कहा है?
इस पूरी सुनवाई में कई समूहों ने अपना-अपना पक्ष रखा है. वे वकील जो इस नौ जज बेंच के रिफ़रेंस का समर्थन कर रहे हैं, वे भी कई बिंदुओं पर एक-दूसरे का विरोध कर रहे थे. इसलिए, इस मामले में तर्कों को साफ़-साफ़ खाँचों में रखना कठिन है. लेकिन कुछ अहम तर्कों को समझते हैं.
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि ‘एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिसेज टेस्ट’ को कोर्ट को ख़ारिज कर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि कई देशों में, जैसे पाकिस्तान में, धर्म के मामलों के लिए खास कोर्ट हैं. हालाँकि, भारत में जज संविधान और क़ानून में विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के मामलों में नहीं.
उनका कहना था कि जब कोई धार्मिक प्रथा ग़लत होती है तो सरकार क़ानून लाकर उसमें सुधार कर सकती है. जैसे, सती प्रथा के लिए हुआ था. लेकिन, उनका कहना था कि अदालत यह नहीं तय कर सकती कि क्या अंधविश्वास है. उनका यह भी तर्क था कि साल 2018 का सबरीमाला का फ़ैसला ग़लत था.
साथ ही, उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-25 और 26 में सदाचार का मतलब संवैधानिक सदाचार नहीं है, बल्कि सामाजिक सदाचार है.
संवैधानिक सदाचार का मतलब कि किसी भी धार्मिक प्रथा को संविधान के सिद्धांतों की कसौटी पर कसना होगा जबकि सामाजिक सदाचार का मतलब कि जो भी समाज में उस समय स्वीकृत मानदंड है, किसी धार्मिक प्रथा को उस कसौटी पर देखना होगा.
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कई धार्मिक संस्थाओं की ओर से कई वकीलों ने भी अपने तर्क रखे. जैसे, सबरीमाला मंदिर के पुजारी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दाऊदी बोहरा समुदाय की सेंट्रल बोर्ड. वग़ैरह के वकीलों ने भी अपना पक्ष रखा. इनका भी कहना था कि धर्म का पालन कैसे करना है, इसकी आज़ादी धर्म के लोगों को देनी चाहिए. अदालतों का इसमें दख़ल नहीं होना चाहिए.
सबरीमाला के साल 2018 के फ़ैसले का समर्थन करते हुए, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंग ने भी नौ जज बेंच के सामने अपने तर्क रखे. वे उन महिलाओं की पैरवी कर रही थीं जो फ़ैसले के कुछ समय के बाद सबरीमाला मंदिर गई थीं और आगे भी सबरीमाला जाना चाहती हैं.
उन्होंने कहा कि धर्म के अधिकार को सीमित करना चाहिए. अपने लिखित बयान में उन्होंने कहा, “वरना बाक़ी सारे मौलिक अधिकार, जैसे समानता, शोषण के विरुद्ध अधिकार एवं जीवन के अधिकार को भी गंभीर चुनौती मिलेगी.” उन्होंने कहा कि यह देखने की ज़रूरत है कि किसी धार्मिक प्रथा से किसी का बहिष्कार हो रहा है या नहीं.
साथ ही उनका कहना था कि सदाचार का मतलब संवैधानिक सदाचार होना चाहिए न कि सामाजिक सदाचार. उनके मुताबिक़, संवैधानिक सदाचार ही बहुसंख्यकवादी मूल्यों के विरुद्ध एकमात्र सुरक्षा है.
इस फ़ैसले का क्या असर पड़ेगा
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इस नौ जज बेंच के फ़ैसले के आधार पर ऐसे कई मामले हैं, जिनका कोर्ट बाद में फ़ैसला करेगा.
एक मामला तो सबरीमाला मंदिर का ही है. लेकिन उसके अलावा भी कई मामले हैं. जैसे, दाऊदी बोहरा समाज में लोगों को बेदख़ल करने का अधिकार, महिला जननांग विकृति यानी फ़ीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन की संवैधानिक वैधता, पारसी मंदिरों और मुसलमानों की मस्जिदों में स्त्रियों के प्रवेश पर पाबंदी… वग़ैरह.
इस फ़ैसले से धर्म के मामलों पर बड़ा असर पड़ेगा ही. इसके साथ ही, बाक़ी और मामलों पर भी असर पड़ सकता है. नौ जजों की पीठ का किसी भी मुद्दे पर फ़ैसला देना एक बहुत ही दुर्लभ बात है.
इस सुनवाई में ‘कांस्टीट्यूशनल मोरैलिटी’ यानी संवैधानिक सदाचार पर भी काफ़ी बात हुई है. संवैधानिक सदाचार के आधार पर कई अहम मुद्दों पर फ़ैसले दिए गए हैं. जैसे, समलैंगिक रिश्ते को अपराध बनाने वाले प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सदाचार पर ज़ोर दिया था.
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इसके अलावा, इस मामले में जनहित याचिकाओं पर भी सवाल खड़े किए गए हैं. जनहित याचिकाओं से भारत में कई अहम मुद्दों पर फ़ैसले दिए गए हैं, जैसे जेलों में अभियुक्तों की हालत, प्रदूषण रोकने की कई याचिकाएँ… वग़ैरह. अगर कोर्ट जनहित याचिकाओं पर भी फ़ैसला देता है, तो उससे भविष्य के कई मामलों पर बड़ा असर पड़ेगा.
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