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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आई हैं.
रविवार को अपनी प्रेस कान्फ़्रेंस में सीजेपी नेता सौरव दास ने आरोप लगाते हुए कहा, “भारत सरकार ने भारत के पत्रकारों के साथ जंग छेड़ दी है.”
उन्होंने कहा, “आपने देखा कि कल स्वतंत्र पत्रकारों के साथ क्या व्यवहार हुआ है. क्या आज इस देश में पत्रकारिता करना अपराध हो गया है? दिल्ली पुलिस कह रही है कि नेम टैग वाले आईडी दिखाइए. लेकिन जब यही पत्रकार दिल्ली पुलिस से पूछ रहे हैं कि आपकी नेम प्लेट कहां हैं, वही पुलिस वाले उनके साथ बर्बरता कर रहे हैं. पुलिस स्वतंत्र पत्रकारों के सिर फोड़ रही है, धक्का मुक्की कर रही है, मारपीट कर रही है और डिटेन कर रही है.”
उन्होंने आरोप लगाया, “पत्रकारिकता के लिए भी यह इमरजेंसी वाले हालात हैं. पत्रकारिता को कुचला जा रहा है. जिन स्वतंत्र पत्रकारों ने युवाओं के आंदोलन को निष्पक्ष तरीक़े से दिखाया, उन्हीं पत्रकारों के साथ सरकार आज जंग लड़ रही है.”
शनिवार को हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों, वकीलों और अन्य लोगों के साथ कुछ पत्रकारों को रोकने, उनके साथ धक्का मुक्की करने, घसीटे जाने और उनका फ़ोन लिए जाने की घटनाएं हुईं.
मौके पर मौजूद बीबीसी के पत्रकारों ने बताया कि सेंट्रल दिल्ली के राजीव चौक आउटर सर्कल से प्रदर्शन स्थल की ओर जाते हुए उन्हें भी रोका गया. प्रेस कार्ड और क्रेंडेशियल दिखाने के बावजूद उन्हें रोका गया, काफ़ी देर तक गुज़ारिश करने और फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के दखल के बाद ही मामला सुलझ पाया.
मीडिया संगठनों ने पुलिस कार्रवाई की निंदा की
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शनिवार को पत्रकारों के हिरासत में लिए जाने पर चार पत्रकार संगठनों ने चिंता ज़ाहिर की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया (पीसीआई), इंडियन वीमेंस प्रेस कॉर्प्स (आईडब्ल्यूपीसी), दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (डीयूजे) और केरला यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट (केयूडब्ल्यूजे) की दिल्ली शाखा ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को पुलिस ने टार्गेट किया.
बयान में आरोप लगाया गया कि वैध प्रेस आईकार्ड रखने वाले पत्रकारों को भी उठाया गया और कुछ के फ़ोन और रिपोर्टिंग उपकरणों को ज़ब्त कर लिया गया.
डिजिटल मीडिया संगठनों के फ़ोरम डिजिपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन ने भी शनिवार को पत्रकारों, डिजिटल क्रिएटर्स और नागरिकों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की.
डिजिपब ने एक बयान जारी कर बताया कि न्यूज़लॉन्ड्री के अश्विन सिंह, स्क्रॉल के आयुष तिवारी समेत कई पत्रकारों को हिरासत में लिया गया.
बयान के अनुसार, “यह क़ानून लागू करना नहीं, बल्कि डराने-धमकाने की कोशिश है, प्रेस की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर हमला है.”
बीते शुक्रवार यानी 9 अक्तूबर को एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने एक महिला पत्रकार के साथ हुए कथित यौन उत्पीड़न को लेकर एक बयान जारी करते हुए मांग की कि पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए कड़े दिशा निर्देश जारी किए जाएं.
इससे पहले 4 अक्तूबर को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने एक बयान जारी कर पत्रकारों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई और जंतर मंतर के आस पास इंटरनेट बैन पर हैरानी जताते हुए मांग की कि पत्रकारों को बिना डर के स्वतंत्र रूप से घटनाओं की रिपोर्टिंग करने दी जाए.
‘कवरेज के लिए हालात मुश्किल’
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बीबीसी के दिलनवाज़ पाशा ने बताया कि वहां पहुंचने वाले अधिकांश प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया जिनमें कई पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर्स भी थे.
शुक्रवार की रात से ही धरना प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल जंतर मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद कर दिया गया था जिससे पत्रकारों को अपनी ख़बरों को पहुंचाने में परेशानियों का सामना करना पड़ा. रविवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक विशेष सुनवाई के दौरान कई याचिकाकर्ताओं ने इस बात का ज़िक्र भी किया.
बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा ने बताया, “स्वतंत्र पत्रकारों के लिए हालात मुश्किल हो गए हैं.”
शनिवार को रिपोर्टिंग के दौरान दिलनवाज़ पाशा को पुलिस ने रोकने की कोशिश की, जब वह एक प्रदर्शनकारी को हिरासत में लिए जाते समय कवर कर रहे थे.
रविवार को भी उन्हें कुछ लोगों ने घेरा, जिनके हाथ में माइक थे और उन्होंने क़रीब 10 मिनट तक उन्होंने सवाल किए. इसी बीच जब एक शख़्स ने दख़ल दिया तो उसे इस भीड़ ने दौड़ा लिया और पीटने की कोशिश की.
एनडीटीवी में काम कर चुके और अब स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे कई वरिष्ठ पत्रकारों को भी पुलिस की ओर से रोकने के आरोप लगे हैं.
शनिवार को जाने माने वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.
रविवार को क्या हुआ
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रविवार को न केवल स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल क्रिएटर्स और स्वतंत्र वरिष्ठ पत्रकारों को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा जबकि कुछ बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को भी डिटेन करने की कोशिश की गई.
द हिंदू की एक महिला पत्रकार को कनॉट प्लेस में पुलिस ने हिरासत में ले लिया, हालांकि जब उन्हें कुछ देर बाद छोड़ दिया गया.
उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ़ खड़ी थी खुद को रिकॉर्ड कर रही थी. तभी कुछ पुलिस वाले आए और बोले- क्या कर रही है, और फिर डिटेन कर लिया.”
इंडियन एक्सप्रेस हिंदी ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर रविवार को जानकारी दी कि ‘उनके तीन पत्रकारों – शाश्वत, सिया और विजय, को दिल्ली पुलिस ने रिपोर्टिंग के दौरान डिटेन कर लिया. ये बताने पर भी, कि सभी पत्रकार हैं और अपना काम करने आए हैं, उन्हें बस में जबरन बिठा लिया गया.’
रविवार को कई अन्य पत्रकारों को हिरासत में लिया गया. रात क़रीब 8.30 बजे ख़बर आई कि स्वतंत्र पत्रकार श्याम मीणा को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
इससे पहले रेड माइक के सौरभ शुक्ला ने अपने एक वीडियो में स्वतंत्र पत्रकारों के साथ होने वाली परेशानियों को बताया.
उन्होंने कहा कि जंतर मंतर की ओर जाने वाली रोड पर लगे बैरिकेड के अंदर स्वतंत्र पत्रकारों को जाने नहीं दिया जा रहा है और छोटे कंटेंट क्रिएटर्स को तो डिटेन कर बस में डाल दिया गया.
राणा अयूब, अजीत अंजुम और श्रीनिवासन जैन जैसे कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी कवर करने से रोके जाने और कुछ पत्रकारों को डिटेन किए जाने की बात कही.
राणा अयूब ने तो एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें वो शनिवार को प्रदर्शन स्थल के पास खड़ी थीं और कार में बैठे एक व्यक्ति ने पुलिस के सामने उनके साथ कथित तौर पर अभद्रता करने की कोशिश की.
रविवार का उन्होंने एक वीडियो अपने एक्स हैंडल पर साझा किया और आरोप लगाया, “एक हिंदू कट्टरपंथी पत्रकार बनकर भड़काऊ बातें कर रहा है और दिल्ली पुलिस इसके लिए पत्रकारों को ही दोषी ठहराने लगी है.”
श्रीनिवासन जैन ने रविवार को एक पत्रकार को बताया कि उनके लिए यह बहुत सदमे वाला रहा कि उनके सामने एक महिला पत्रकार को पुलिस ने जबरदस्ती हिरासत में ले लिया जबकि वो अपना कार्ड दिखाती रही.
उन्होंने कहा, “आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि आप पत्रकारों और वकीलों को हिरासत में नहीं ले सकते. इस महिला के पास बैज और माइक थे. वो कहती रही कि मैं रिपोर्टर हूं फिर भी उन्हें हिरासत में ले लिया गया. वहां मौजूद एक आईपीएस अधिकारी से हम पत्रकार कहते रहे लेकिन कुछ नहीं हुआ.”
रविवार को ही सुबह सौरभ शुक्ला जब कनॉट प्लेस की ओर जा रहे थे, उनकी कार को पुलिस ने रोक लिया.
पत्रकार स्मिता शर्मा को दिल्ली पुलिस ने जब रोका तो उन्होंने पुलिस पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा, “आप कुछ नेशनलिस्ट मीडिया को जाने देंगे और बाकियों को नहीं. ये ठीक नहीं है.” हालांकि मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी ने कहा कि वे किसी को भी जाने नहीं दे रहे हैं.
जीशान नाम की एक पत्रकार ने आरोप लगाया कि मीडिया कर्मियों को ले जाते हुए जब उन्होंने पुलिस से सवाल किया तो उन्हें ही डिटेन कर लिया गया.
उन्होंने कहा, “बस में एक खुली जगह दिखी तो वहां से मैं निकल कर भागी.”
सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ वीडियो
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शनिवार के प्रदर्शनों के दौरान कुछ ऐसे वीडियो वायरल हुए जिसमें कुछ पत्रकारों को पुलिस ने जबरदस्ती डिटेन किया.
न्यूज़ वेयर नाम की एक महिला पत्रकार का वीडियो वायरल हो रहा है जो कनॉट प्लेस में कुछ लोगों से बहस करती दिखाई देती हैं और अकेले उनके सामने खड़ी रहती हैं.
एक अन्य वीडियो में एक स्वतंत्र पत्रकार को उसी पुलिस अधिकारी ने धक्का देकर हिरासत में ले लिया जिससे वो पूछ रहे थे कि “पत्रकारों पर लाठी क्यों चल रही है?”
उस पुलिस अधिकारी ने इस तरह की किसी घटना से साफ़ इनकार किया लेकिन बार-बार सवाल पूछने पर उसके साथ कथित तौर पर बुरा सुलूक किया गया.
एक वीडियो में दिखता है कि एक महिला को तीन महिला पुलिसकर्मी पकड़ रही हैं. वहां मौजूद कुछ पत्रकार कह रहे हैं कि उस महिला के गले में प्रेस कार्ड है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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