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होर्मुज़ संकट से पनामा नहर को लेकर महाशक्तियों के बीच टकराव क्यों बढ़ रहा है?

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Source :- BBC INDIA

शाम के समय ऊपर से देखने पर, दो मालवाहक जहाज पनामा नहर के समानांतर बने लॉक चैंबरों से गुजरते हुए दिखाई दे रहे हैं.

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ईरान युद्ध की वजह से दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट में लगातार रुकावटें आ रही हैं.

इसी बीच, हज़ारों मील दूर एक और रणनीतिक समुद्री रास्ता नया विवाद का केंद्र बनकर उभरा है. यह है पनामा नहर, जो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाली अहम कड़ी है.

ताज़ा टकराव पिछले हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र में देखने को मिला. अमेरिका ने चेतावनी दी कि पनामा नहर पर चीन का बढ़ता प्रभाव वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता है.

चीन ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया. उसने आरोप लगाया कि अमेरिका इस मुद्दे को बहाना बनाकर नहर पर अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहता है.

इन दोनों देशों के बीच फँसे पनामा ने एक बार फिर नहर पर अपनी संप्रभुता दोहराई है. उसने कहा है कि पनामा नहर हमेशा तटस्थ रही है और आगे भी रहेगी.

पनामा नहर क्या है और यह कैसे काम करती है?

पनामा नहर के एक लॉक चैंबर से पानी बह रहा है जबकि नहर में कुछ दूर एक मालवाहक जहाज़ इंतज़ार कर रहा है.

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पनामा नहर 80 किलोमीटर लंबा कृत्रिम जलमार्ग है. यह पनामा स्ट्रेट के आर-पार अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ता है.

इस नहर की वजह से जहाज़ों को दक्षिण अमेरिका के सबसे दक्षिणी छोर केप हॉर्न के लंबे रास्ते से नहीं गुज़रना पड़ता. इससे यात्रा का समय और माल ढुलाई की लागत काफ़ी कम हो जाती है.

जहाज़ों को नहर से गुज़रने के लिए शुल्क देना पड़ता है. यह शुल्क जहाज़ के आकार, उसके प्रकार और उसमें लदे माल जैसी बातों के आधार पर तय किया जाता है.

मिस्र की स्वेज़ नहर में भी इसी तरह की शुल्क व्यवस्था लागू है.

पनामा नहर में लॉक्स नाम की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है. इसके ज़रिए जहाज़ों को समुद्र तल से ऊपर स्थित गाटुन झील तक उठाया जाता है और फिर दूसरी तरफ़ के तट पर नीचे उतारा जाता है.

हर बार किसी जहाज़ को नहर से गुज़ारने के लिए लाखों गैलन मीठे पानी की ज़रूरत पड़ती है. यह पानी गाटुन झील और आसपास के जलाशयों से लिया जाता है.

मीठे पानी पर निर्भरता की वजह से यह नहर सूखे के प्रति संवेदनशील है.

जब पानी का स्तर घट जाता है, तो प्रशासन जहाज़ों के अधिकतम ड्राफ्ट पर पाबंदी लगा सकता है. इसका मतलब है कि जहाज़ों को कम माल लेकर चलना पड़ता है.

इससे नहर की कुल परिवहन क्षमता भी घट जाती है.

पनामा नहर से जहाज़ों की आवाजाही क्यों बढ़ी है?

पनामा नहर के मिराफ्लोरेस लॉक में जहाजों और लॉक चैंबरों का हवाई दृश्य.

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दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय शिपिंग संगठन बिमको के मुताबिक़, मई के अंत तक पनामा नहर से गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या साल-दर-साल 8% बढ़ गई. यह बढ़कर रोज़ाना औसतन 38 जहाज़ों तक पहुंच गई, जो नहर की लगभग अधिकतम क्षमता के बराबर है.

बिमको के अनुसार, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद के पांच हफ़्तों में जहाज़ों की आवाजाही में साल-दर-साल 16% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर माल ढुलाई करना अधिक मुश्किल हो गया है. दुनिया में कारोबार होने वाले कच्चे तेल का क़रीब पाँचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुज़रता है.

इस स्थिति में एशियाई ख़रीदारों ने अमेरिका के खाड़ी तट क्षेत्र के आपूर्तिकर्ताओं से ज़्यादा कच्चा तेल और रिफ़ाइंड ईंधन ख़रीदना शुरू कर दिया है.

इनमें से कई खेप अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के बीच पनामा नहर के रास्ते भेजी जाती हैं. इससे नहर से गुज़रने की मांग बढ़ी है.

बढ़ती आवाजाही की वजह से जहाज़ों को ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ रहा है. बुकिंग के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल रही है.

प्राथमिकता के आधार पर जल्दी गुज़रने के शुल्क भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक़, कुछ ऑपरेटर तेज़ी से ट्रांज़िट का अधिकार पाने के लिए नीलामी में लाखों डॉलर तक चुका रहे हैं.

डलास स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ टेक्सास में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ऑरलैंडो जे. पेरेज़ कहते हैं, “जहाज़ों की कुल संख्या के लिहाज़ से पनामा, होर्मुज़ जैसा बड़ा अवरोधक बिंदु नहीं है.”

वह कहते हैं, “लेकिन पनामा से जो माल गुज़रता है, उसका महत्व अलग है. दुनिया के समुद्री व्यापार का क़रीब 5% हिस्सा यहां से होकर जाता है, जबकि अमेरिका के कंटेनर यातायात का लगभग 40% हिस्सा इसी नहर पर निर्भर है.”

उनके मुताबिक़, “होर्मुज एक एनर्जी चोकपॉइंट है. पनामा एक बड़ी इकॉनमी के लिए सप्लाई-चेन का चोकपॉइंट है. दोनों मायने रखते हैं.”

नहर को पर्यावरण से जुड़ी बढ़ती दिक्कतों का भी सामना करना पड़ रहा है.

गटून झील का जलस्तर अब भी अपने ऐतिहासिक औसत से नीचे बना हुआ है. इसी वजह से पनामा नहर प्राधिकरण ने जहाज़ों के ड्राफ्ट पर पाबंदियां लगाई हैं.

प्राधिकरण ने यह भी घोषणा की है कि 15 सितंबर 2026 से नहर से रोज़ गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या 36 से घटाकर 32 कर दी जाएगी.

अधिकारियों का कहना है कि इस स्थिति की वजह कम बारिश है. इसे जलवायु में व्यापक बदलाव और एल नीनो जैसी परिस्थितियों से जोड़ा जा रहा है.

इन पाबंदियों ने 2023 के भीषण सूखे की यादें ताज़ा कर दी हैं.

उस समय जहाज़ों की संख्या सीमित किए जाने से लंबी कतारें लग गई थीं. इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं भी प्रभावित हुई थीं.

इस नहर का इतिहास क्या है?

20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका ने पनामा नहर का निर्माण किया था. इसके बाद उसने नहर और उससे जुड़े कैनाल ज़ोन पर नियंत्रण रखा.

फिर 1977 में टोरीहोस-कार्टर संधियां हुईं. ये समझौते अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के कार्यकाल में हुए थे.

इन संधियों के तहत नहर का नियंत्रण पनामा को सौंपने की समयसीमा तय की गई.

नहर का नियंत्रण औपचारिक रूप से 31 दिसंबर 1999 को पनामा को सौंप दिया गया. आज पनामा नहर प्राधिकरण इस जलमार्ग का संचालन करता है.

यह उन संधियों के तहत काम करता है जो नहर की तटस्थता और अंतरराष्ट्रीय जहाज़रानी के लिए उसकी उपलब्धता की गारंटी देती हैं.

चीन को लेकर अमेरिका की क्या चिंताएं हैं?

यह विवाद नहर के मालिकाना हक़ को लेकर नहीं है. असली मुद्दा नहर पर प्रभाव और प्रभावशाली मौजूदगी का है.

कई दशकों तक हांगकांग की कंपनी सीके हचिसन ने अपनी सहायक कंपनी पनामा पोर्ट्स कंपनी के ज़रिए दो बंदरगाहों का संचालन किया.

ये बंदरगाह बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल हैं. ये पनामा नहर के प्रशांत और अटलांटिक महासागर वाले प्रवेश द्वारों पर स्थित हैं.

कंपनी यह काम पनामा सरकार के साथ हुए एक रियायत समझौते के तहत करती थी.

हालांकि न तो इस कंपनी का और न ही चीन का पनामा नहर के संचालन में कोई सीधा रोल था. फिर भी अमेरिकी अधिकारी नहर के आसपास चीन से जुड़े प्रभाव को लेकर लगातार चिंता जताते रहे हैं.

अमेरिका की चिंता ख़ासतौर पर बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और परिवहन ढांचे में चीन से जुड़ी मौजूदगी को लेकर है.

तनाव उस समय और बढ़ गया, जब इस साल पनामा के सुप्रीम कोर्ट ने सीके हचिसन के बंदरगाह संचालन समझौते के क़ानूनी आधार को असंवैधानिक क़रार दे दिया.

प्रोफ़ेसर ऑरलैंडो जे. पेरेज़ कहते हैं, “वॉशिंगटन चीन से जुड़ी बंदरगाह कंपनियों को ऐसे रणनीतिक ठिकाने के रूप में देखता है, जो उस परिसंपत्ति के क़रीब हैं जिस पर कभी उसका नियंत्रण था.”

वह कहते हैं, “दूसरी तरफ़ बीजिंग का मानना है कि पनामा जैसे छोटे देश पर एक वैध अनुबंध को पलटने का दबाव डाला जा रहा है.”

पेरेज़ के मुताबिक़, पनामा नहर की तटस्थता अब एक बड़ी परीक्षा से गुज़र रही है.

पनामा सिटी के पास पनामा नहर में प्रवेश की प्रतीक्षा करता एलपीजी मालवाहक जहाज़

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हालांकि, चिली विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के मानद प्रोफ़ेसर होर्खे हाइने इस विवाद को “पूरी तरह ग़ैर-ज़रूरी” बताते हैं.

वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सीके हचिसन की पनामा नहर से जुड़ी भूमिका 1997 से है. यह हांगकांग के चीन को वापस सौंपे जाने से कुछ महीने पहले की बात है.

हाइने कहते हैं, “यह कंपनी सिर्फ़ कंटेनरों और उनसे जुड़े बंदरगाह संचालन का प्रबंधन करती है.”

उन्होंने कहा, “कंपनी का नहर के संचालन से कोई लेना-देना नहीं है.”

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि पनामा में चीन का प्रभाव ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ गया है.

उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका नहर पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर सकता है. पनामा ने इस प्रस्ताव को ज़ोरदार तरीके से ख़ारिज कर दिया है.

ट्रंप प्रशासन ने यह आरोप भी लगाया है कि बीजिंग जवाबी क़दम के तौर पर चीनी बंदरगाहों पर पनामा के झंडे वाले जहाज़ों की जांच बढ़ा रहा है.

चीन ने कैसे जवाब दिया है?

जनवरी में चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने इन आरोपों को “पूरी तरह बेबुनियाद” बताया.

उन्होंने अमेरिका पर राजनीतिक मक़सद से इस मुद्दे को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया.

लिन जियान ने कहा, “पनामा नहर पर लंबे समय तक किसने क़ब्ज़ा रखा था. किसने अपनी सेना भेजकर पनामा पर हमला किया था. उसकी संप्रभुता और गरिमा को मनमाने ढंग से कुचला था.”

उन्होंने पूछा, “पनामा नहर पर किसकी नज़र है. कौन इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को, जिसे हमेशा तटस्थ रहना चाहिए, अपने क्षेत्र में बदलना चाहता है?”

उन्होंने कहा, “इसका जवाब सबके सामने है.”

बीजिंग का कहना है कि वह पनामा की संप्रभुता और नहर की तटस्थ स्थिति का सम्मान करता है.

पिछले हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र में हुई बहस के दौरान चीन के राजदूत फ़ू छोंग ने कहा, “चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका के झूठे आरोप और निराधार हमले, नहर पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश का बहाना भर हैं.”

इस बीच पनामा के राष्ट्रपति होसे राउल मुलिनो ने नहर पर पनामा की संप्रभुता पर ज़ोर दिया.

उन्होंने नहर की तटस्थता को “स्थानीय और वैश्विक, दोनों तरह के ख़तरों के ख़िलाफ़ सबसे अच्छा और एकमात्र बचाव” बताया.

यह विवाद इतना बड़ा कैसे हो गया?

पनामा नहर के मिराफ्लोरेस लॉक का एरियल व्यू (फ़ाइल फ़ोटो)

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पनामा नहर को लेकर अमेरिका और चीन के बीच मतभेद हालिया मध्य पूर्व संकट से पहले भी मौजूद थे.

चीन के निवेश, रणनीतिक ढांचे और क्षेत्र में उसके बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका कई वर्षों से चिंता जताता रहा है. यह चिंता सिर्फ़ पनामा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका में देखी गई है.

विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा विवाद भू-राजनीतिक असर का एक उदाहरण है.

उनके मुताबिक़, एक क्षेत्र में चल रहा संघर्ष दूसरे इलाक़ों में भी प्रतिस्पर्धा और तनाव को बढ़ा देता है.

प्रोफ़ेसर होर्खे हाइने कहते हैं, “मध्य पूर्व में युद्ध और होर्मुज़ स्ट्रेट में पैदा हुई रुकावटों की वजह से पनामा पर दबाव बढ़ गया है.”

वह कहते हैं, “इसी कारण इस मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच तनाव भी बढ़ा है.”

प्रोफ़ेसर पेरेज़ भी इससे सहमत हैं.

वह कहते हैं, “हम होर्मुज़ और लाल सागर दोनों जगह एक जैसी स्थिति देख रहे हैं.”

उनके मुताबिक़, “रणनीतिक जलमार्गों को लेकर होने वाले विवाद अक्सर बड़े भू-राजनीतिक टकराव का मंच बन जाते हैं.”

पेरेज़ का कहना है कि पनामा, यमन और खाड़ी क्षेत्र के देशों जैसे छोटे और मध्यम आकार के देश अक्सर सबसे ज़्यादा दबाव झेलते हैं.

ये देश ऐसे अहम समुद्री रास्तों का प्रबंधन करते हैं, लेकिन बड़ी शक्तियों के बीच होने वाले विवादों की क़ीमत इन्हें चुकानी पड़ती है.

उनके पास इस स्थिति से अलग रहने या इससे बच निकलने की बहुत सीमित क्षमता होती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS