Source :- LIVE HINDUSTAN

पेट्रोल-डीजल के रेट ईरान-अमेरिका युद्ध पर टिका हुआ है। अगर वॉर थमा तो ब्रेंट क्रूड $80 तक आ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट हो सकती है।

अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी 2026 में शुरू हुए संघर्ष ने दुनिया के ऑयल मार्केट को हिलाकर रख दिया है। युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब 70% तक उछल गईं। फरवरी में करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा ब्रेंट क्रूड कुछ ही महीनों में 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया।

एक समय तो इसकी कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल के इंट्राडे हाई तक चली गई थी। हालांकि अब स्थिति कुछ बदली है और ब्रेंट क्रूड लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल चुका है। यानी अपने उच्चतम स्तर से करीब 25% की गिरावट आ चुकी है।

युद्ध का इतिहास क्या कहता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि तेल बाजार का इतिहास बताता है कि युद्ध या भू-राजनीतिक संकट के कारण बढ़ी कीमतें हमेशा लंबे समय तक नहीं टिकतीं। 1973 के अरब ऑयल एम्बार्गो, 1990 के खाड़ी युद्ध और 2022 के रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भी तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था, लेकिन हालात सामान्य होने के बाद कीमतों में 30% से 40% तक की गिरावट देखने को मिली थी।

80-85 डॉलर तक आ सकता है ब्रेंट

वेंचुरा सिक्योरिटीज के रिसर्च प्रमुख विनीत बोलिंजकर का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच भरोसेमंद युद्धविराम हो जाता है और होर्मुज पूरी तरह खुल जाता है, तो ब्रेंट क्रूड 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है। उनके मुताबिक वर्तमान स्तर से तेल में 10% से 15% और गिरावट संभव है। इससे हाई लेवल से कुल गिरावट 30% से 35% तक पहुंच सकती है।

बाजार अभी भी जोखिम में

विशेषज्ञों का कहना है कि तेल बाजार अभी भी पश्चिम एशिया के तनाव को लेकर सतर्क है। यही वजह है कि कीमतें युद्ध से पहले के स्तर पर नहीं लौटी हैं। हालांकि जैसे-जैसे सप्लाई सामान्य होगी और बाजार को यह भरोसा मिलेगा कि होर्मुज मार्ग सुरक्षित है, वैसे-वैसे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

शांति समझौता हुआ तो 40% तक गिरावट संभव

VT मार्केट्स के ग्लोबल स्ट्रेटेजी ऑपरेशंस प्रमुख रॉस मैक्सवेल का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता हो जाता है, शिपिंग रूट पूरी तरह खुल जाते हैं और क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो तेल की कीमतों में उच्चतम स्तर से 30% से 40% तक गिरावट संभव है।

भारत को क्या होगा फायदा?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में गिरावट से देश को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम होगा। इससे महंगाई घटाने में मदद मिलेगी और सरकार का आयात बिल कम होगा। इसके अलावा चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रित रहेगा और रुपये को मजबूती मिल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में अमेरिका-ईरान वार्ता और होर्मुज की स्थिति तेल बाजार की दिशा तय करेगी। यदि तनाव कम हुआ तो दुनिया को महंगे तेल से बड़ी राहत मिल सकती है।

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