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अमेरिका की चाल है इस्लामिक नाटो? मक्का समझौते में अभी कई देशों की होगी एंट्री

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Source :- LIVE HINDUSTAN

तुर्की ने संकेत दिया है कि यह समझौता केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा। तुर्की की ओर से कहा गया है कि इस समझौते का विस्तार किया जाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर कई देशों को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। क्या यह अमेरिका की चाल है?

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने हाल ही में मक्का समझौते को मंजूरी दे दी है। नाटो की तर्ज पर इस समूह में शामिल एक देश पर हमले को सभी देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। इस समझौते को लेकर पश्चिम एशिया में हलचल तेज है। मक्का समझौते को इस्लामिक नाटो की शुरुआत भी कहा जा रहा है। अब चर्चा है कि इस्लामिक नाटो के पीछे अमेरिका की चाल है। विशेषज्ञ पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के इस समझौते को महज एक रक्षा समझौते की तरह नहीं, बल्कि क्षेत्र में बदलते समीकरणों का जवाब मान रहे हैं। यह भी खबर है कि इस समझौते में अभी कई देशों की एंट्री होगी।

बता दें कि नाटो के आर्टिकल 5 की तरह ही मक्का पैक्ट का मुख्य प्रावधान यही है कि किसी एक सदस्य देश पर हुआ सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया और उसके आसपास अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की चपेट में वे देश भी आए, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। ऐसे में मक्का समझौता बदलती वैश्विक व्यवस्था का जवाब माना जा रहा है।

अमेरिका ने खुद मक्का समझौते के लिए रास्ता बनाया?

सऊदी अरब के राजनीतिक वैज्ञानिक मंसूर अलमार्जूकी के मुताबिक मक्का समझौता किसी बड़ी व्यवस्था की नींव है। वहीं रणनीतिक विशेषज्ञ तारा कार्था ने भी इस समझौते को लेकर अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि एक अमेरिकी सांसद ने दावा किया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मक्का समझौता कराने में मदद की थी। बता दें कि अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद जो विल्सन ने एक्स पर लिखा था कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का आपसी रक्षा समझौता मिडिल ईस्ट में स्थिरता, शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने के ट्रंप की कोशिशों का एक और उदाहरण है।

इस बीच शिया विद्वान आगा सैयद जवाद नकवी के नेतृत्व में शिया मौलवियों ने इसे अमेरिका-अरब की साजिश करार दिया है। उनका आरोप है कि इस समझौते का मकसद पाकिस्तान को ईरान युद्ध और आगे चलकर पश्चिम एशिया में होने वाले युद्धों में घसीटना है।

कौन-कौन से देश हो सकते हैं शामिल?

अफ्रीका की सबसे शक्तिशाली ताकतवर सेना वाले मिस्र को इस गठबंधन में शामिल होने वाला अगला सबसे संभावित देश माना जा रहा है। मिस्र के पास 4.4 लाख से अधिक सक्रिय सैनिक, हजारों टैंक और आधुनिक वायु और नौसेना है। इसके अलावा कतर और कुवैत को खाड़ी देशों में सबसे मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है। जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया के भी इस ढांचे में शामिल होने की संभावना जताई गई है।

और बढ़ेगा ताकत

मक्का समझौते में इस वक्त तीनों देश अलग अलग तरह से योगदान दे रहे हैं। सऊदी अरब जहां समूह को आर्थिक ताकत, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और पश्चिम एशिया की सबसे विकसित वायु सेनाओं में से एक मुहैया करा सकता है, वहीं तुर्की के पास नाटो से प्रशिक्षित सेना है। वहीं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार है। अगर मिस्र भी इसमें शामिल होता है तो गठबंधन की सैन्य और राजनीतिक ताकत काफी बढ़ सकती है। मिस्र की बड़ी सेना, एशिया और अफ्रीका के बीच रणनीतिक स्थिति, स्वेज नहर के पास मौजूदगी और अरब कूटनीति में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका गठबंधन को मजबूती दे सकती है। वहीं अगर कतर, कुवैत और अन्य खाड़ी देश भी इसमें शामिल हो गए, तो समूह की ताकत और बढ़ेगी।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN