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इंज़माम-उल-हक़: नींद और भूलने के क़िस्सों से लेकर सिफ़ारिश पर टीम में आने के आरोप तक

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Source :- BBC INDIA

एक सीनियर क्रिकेटर ने इंज़माम पर सिफ़ारिश के कारण टीम में आने का आरोप लगाया और उन्हें गालियां तक दीं?

ज़रा सोचिए, 21 साल के एक युवा क्रिकेटर पर उस समय क्या बीती होगी, जब उसी की टीम का एक सीनियर खिलाड़ी उसे गालियां देने लगे और कहे कि तुम सिफ़ारिश के कारण टीम में आए हो.

फिर इसके कुछ ही दिनों बाद वही युवा क्रिकेटर शानदार बल्लेबाज़ी करके अपनी टीम को वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पहुंचा दे. यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि इंज़माम-उल-हक़ की है और यह सब 1992 के वर्ल्ड कप के दौरान हुआ था.

वही वर्ल्ड कप जिसे पाकिस्तान ने इमरान ख़ान की कप्तानी में जीता था. इंज़माम-उल-हक़ ने न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में 60 और फ़ाइनल में 42 रनों की अहम पारियां खेली थीं.

अपनी इन पारियों से उन्होंने इमरान ख़ान की उस बात को सही साबित कर दिखाया था कि इंज़माम-उल-हक़ उस दौर के सबसे अच्छे युवा बल्लेबाज़ हैं. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ था कि पाकिस्तान की टीम के एक सीनियर क्रिकेटर ने इंज़माम पर सिफ़ारिश के कारण टीम में आने का आरोप लगाया और उन्हें गालियां तक दीं?

‘एक सीनियर ने कहा, सिफ़ारिश के कारण टीम में आए हो’

इंज़माम-उल-हक़

जब इंज़माम-उल-हक़ ने मुझे दिए एक इंटरव्यू में यह बात बताई थी, तो मैं भी सोच में पड़ गया था. मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है.

इंज़माम ने बताया था, “वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की टीम न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ अपना आख़िरी ग्रुप मैच जीत चुकी थी. मैं उस मैच में केवल पांच रन बना सका था.”

“हम सभी खिलाड़ी अच्छे मूड में शॉवर रूम में नहा रहे थे. इसी दौरान एक सीनियर क्रिकेटर अचानक मेरे पास आए और मुझे गालियां देने लगे. मैं उनका नाम लेना ठीक नहीं समझता. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम सिफ़ारिश के कारण टीम में आए हो. यह बात मेरे लिए इतनी तकलीफ़देह थी कि मैं जितनी देर शॉवर के नीचे खड़ा रहा, लगातार रोता रहा.”

इंज़माम कहते हैं, “मैं सोच रहा था कि आख़िर मैं सिफ़ारिश के कारण टीम में कैसे आ गया?”

“वर्ल्ड कप में आने से पहले मैंने श्रीलंका के ख़िलाफ़ वनडे इंटरनेशनल मैचों में दो शतक बनाए थे. पाकिस्तान के दो फ़र्स्ट क्लास सीज़न में भी मैंने 10 शतक लगाए थे.”

“उस सीनियर क्रिकेटर के लिए आज भी मेरे दिल में बहुत इज़्ज़त है. लेकिन इतना समय गुज़र जाने के बाद भी मैं उनकी कही वह बात नहीं भूल पाया हूं.”

इंज़माम को उसी वर्ल्ड कप की एक और घटना भी याद है.

इस घटना से पता चलता है कि कई बार टीम में पहले से मौजूद कुछ सीनियर खिलाड़ी किसी नए खिलाड़ी का आसानी से स्वागत नहीं करते. उनके व्यवहार में जलन भी दिखाई देती है.

इंज़माम बताते हैं, “वर्ल्ड कप के दौरान पाकिस्तान की टीम एक दावत में शामिल हुई थी. वहां इमरान ख़ान ने मेरी ओर इशारा करते हुए मेज़बान से कहा कि यह युवा खिलाड़ी बहुत प्रतिभाशाली है.”

“उन्होंने कहा कि मुझे यक़ीन है, जिस दिन इसका बल्ला चल गया, यह हमें मैच जिता देगा.”

“मुझे याद है कि इमरान ख़ान की यह बात कुछ क्रिकेटरों को अच्छी नहीं लगी थी. उन्होंने बहुत ग़ुस्से से मेरी ओर देखा था.”

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि वर्ल्ड कप के लिए टीम चुने जाने के समय एक चयनकर्ता इंज़माम को टीम में शामिल करने के सख़्त ख़िलाफ़ थे.

उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया था.

लेकिन इमरान ख़ान इंज़माम की प्रतिभा से प्रभावित थे और हर हाल में उन्हें टीम में शामिल करना चाहते थे.

इंज़माम पर इमरान ख़ान को कितना भरोसा था, इसका अंदाज़ा भारत के वरिष्ठ खेल पत्रकार अयाज़ मेमन की बातों से भी लगाया जा सकता है.

शानदार बल्लेबाज़ी से सुर्ख़ियों में आए इंज़माम

इंज़माम के मुताबिक सिफ़ारिश से टीम में आने की बात मेरे लिए इतनी तकलीफ़देह थी कि मैं जितनी देर शॉवर के नीचे खड़ा रहा, लगातार रोता रहा

अयाज़ मेमन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “1992 के वर्ल्ड कप फ़ाइनल से पहले हमें इंज़माम-उल-हक़ के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी. लेकिन न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में शानदार बल्लेबाज़ी करके वह सुर्ख़ियों में आ गए थे.”

“फ़ाइनल से पहले मेलबर्न में जब हम इमरान ख़ान से मिले तो उन्होंने कहा था कि इंज़माम इस समय दुनिया के सबसे अच्छे युवा क्रिकेटर हैं. हमें लगा कि कप्तान उनकी कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ कर रहे हैं क्योंकि तब तक इंज़माम ने बहुत अधिक पारियां नहीं खेली थीं.”

“लेकिन जब उन्होंने फ़ाइनल में 42 रन की अहम पारी खेली और अपनी बल्लेबाज़ी का स्तर दिखाया, तब हमें उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा हुआ.”

“मुझे उनमें प्रतिभा के साथ-साथ खेल के लिए ज़रूरी संयम भी दिखाई दिया.”

“उस समय सचिन तेंदुलकर भी एक प्रतिभाशाली और विश्वस्तरीय बल्लेबाज़ के रूप में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मौजूद थे. वह उनका भी पहला वर्ल्ड कप था.”

“हर खिलाड़ी का अपना दर्जा होता है. दोनों का करियर बेहद शानदार रहा और दोनों ने लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला.”

भारतीय क्रिकेटरों के दिल में इंज़माम के लिए सम्मान

भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और इंज़माम के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते रहे हैं

इंज़माम जिस दौर में क्रिकेट खेलते थे, उस समय मैदान पर पाकिस्तान और भारत के बीच कड़ा मुक़ाबला होता था.

लेकिन मैदान से बाहर दोनों देशों के खिलाड़ियों के दिलों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और अपनापन था.

इंज़माम इस मामले में ख़ास थे. उनके ख़िलाफ़ खेलने वाले भारतीय क्रिकेटर उनका बेहद सम्मान करते थे और इंज़माम के मन में भी उनके लिए ऐसे ही भाव थे.

साल 2004 की सीरीज़ के दौरान हुई वह घटना भला कौन भूल सकता है, जब इंज़माम अपने बेटे इब्तिसाम-उल-हक़ को सचिन तेंदुलकर से मिलवाने स्टेडियम ले गए थे.

उन्होंने सचिन से कहा था, “यह बेटा तो मेरा है, लेकिन फ़ैन आपका है.”

सचिन तेंदुलकर ने एक टीवी कार्यक्रम में इस घटना का ज़िक्र किया था.

उन्होंने यह भी कहा था कि इंज़माम हमेशा उनके लिए एक सम्मानित क्रिकेटर रहे.

भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने भी एक कार्यक्रम में इंज़माम की मौजूदगी में उनकी जमकर तारीफ़ की थी.

उन्होंने कहा था, “इंज़ी भाई हमारे ख़िलाफ़ शतक से कम की बात नहीं करते थे. ऐसा लगता था जैसे वह नींद से उठकर आते हैं और शतक बना देते हैं. मानो उनके लिए यह कोई बड़ी बात ही न हो.”

भारत के एक और पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ ने आईपीएल के एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि इंज़माम दुनिया के सबसे अच्छे मध्यक्रम के बल्लेबाज़ थे.

वह किसी दूसरे खिलाड़ी को इंज़माम से बड़ा मध्यक्रम का बल्लेबाज़ नहीं मानते थे.

राहुल द्रविड़ ने बताया था कि 2004 में कराची में खेले गए वनडे में इंज़माम ने भारत के ख़िलाफ़ जो शतक लगाया था, उसकी रिकॉर्डिंग उन्होंने होटल लौटकर तीन बार देखी थी.

वीरेंद्र सहवाग भी एक टीवी कार्यक्रम में इंज़माम को एशिया का सबसे अच्छा मध्यक्रम का बल्लेबाज़ बता चुके हैं. सहवाग ने इंज़माम के साथ मैदान पर हुई एक मज़ेदार घटना भी सुनाई थी.

उन्होंने बताया, “जब मैं दानिश कनेरिया की गेंदबाज़ी पर बल्लेबाज़ी कर रहा था, तो मैंने इंज़माम से कहा, ‘इंज़ी भाई, बाउंड्री पर खड़े फ़ील्डर को आगे बुला लीजिए. मेरा छक्का मारने का मन कर रहा है.'”

“इस पर इंज़माम ने फ़ील्डर को आगे बुला लिया और मैंने अगली ही गेंद पर छक्का मार दिया. इससे कनेरिया बहुत नाराज़ हुए थे.”

ऐसी घटनाओं से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारतीय क्रिकेटरों के बीच इंज़माम कितने लोकप्रिय थे.

इंज़माम ने अपने एक इंटरव्यू में यह भी बताया था कि 1992 के वर्ल्ड कप के बाद इंग्लैंड दौरे पर उन्हें शॉर्ट पिच गेंदें खेलने में परेशानी हो रही थी.

उस समय सुनील गावस्कर उनके साथ इंग्लैंड में एक चैरिटी मैच खेल रहे थे. इंज़माम ने उनसे मदद मांगी.

इंज़माम के मुताबिक़, सुनील गावस्कर की सलाह पर अमल करके उन्होंने अपनी इस परेशानी पर क़ाबू पा लिया था.

कैसा था इंज़माम का बचपन?

इंज़माम अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. इसलिए वह सभी के लाडले थे- इंज़माम के पिता.

अब ज़रा इंज़माम के बचपन पर नज़र डालते हैं और जानते हैं कि उनके शुरुआती दिन कैसे बीते थे. यह जानने के लिए मैंने कुछ समय पहले उनके पिता, स्कूल के शिक्षक और दोस्तों से बात की थी.

इंज़माम के पिता पीर इंतज़ाम-उल-हक़ ने मुझे बताया था, “इंज़माम अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. इसलिए वह सभी के लाडले थे, लेकिन बहुत आज्ञाकारी भी थे.”

“भाई इंतिसार-उल-हक़ के साथ उनकी छोटी-मोटी नोकझोंक और लड़ाई होती रहती थी, लेकिन मज़ाक में भी शालीनता का ध्यान रखा जाता था.”

“मेरे बड़े बेटे इंतिज़ार-उल-हक़ ने इंज़माम की क्रिकेट में हमेशा गहरी दिलचस्पी ली. वह उन्हें क्लब क्रिकेट खिलाते रहे. मुझे वह समय भी याद है, जब इंज़माम मुल्तान में क्लब क्रिकेट खेलते थे. उनके प्रभारी ने मुझसे कहा था, ‘पीर साहब, यह बहुत अच्छी क्रिकेट खेलता है, लेकिन यहां इसकी प्रतिभा बर्बाद हो जाएगी. इसलिए इसे लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में दाख़िला दिलवा दीजिए.'”

“इसके बाद मैंने इंज़माम को वहां भेज दिया. उन्होंने वहां अच्छी बल्लेबाज़ी की और फिर आगे बढ़ते चले गए.”

‘लिखावट कमज़ोर, लेकिन बल्लेबाज़ी ज़बरदस्त’

इंज़माम के स्कूल के एक शिक्षक मोहम्मद हाशिम ख़ान ने मुझे बताया था, “पढ़ाई के मामले में इंज़माम बहुत अच्छे विद्यार्थी नहीं थे. उनकी लिखावट भी कमज़ोर थी, लेकिन वह अपने शिक्षकों की बहुत इज़्ज़त करते थे.”

“उन्हें क्रिकेट का बहुत शौक़ था. एक दिन हमारे हेडमास्टर वसीम अहमद ने इंज़माम के मज़बूत और भारी हाथ देखे.”

“उन्होंने कहा कि तुम बल्ले पर मज़बूत पकड़ रखने वाले अच्छे बल्लेबाज़ बन सकते हो. इसके बाद इंज़माम स्कूल की टीम में खेलने लगे.”

मुस्लिम हाईस्कूल और ज़िला खेल मैदान के बीच केवल एक सड़क थी.

इस मैदान के देखरेख करने वाले व्यक्ति को मुल्तान के लोग ‘चाचा बरकत’ के नाम से जानते थे.

जब मेरी उनसे मुलाक़ात हुई, तब उनकी उम्र 70 साल से अधिक हो चुकी थी. लेकिन जैसे ही मैंने इंज़माम के बचपन की बात की, वह ख़ुद किसी बच्चे की तरह ख़ुश और उत्साहित दिखाई देने लगे.

चाचा बरकत ने मुझे बताया, “इंज़माम हर दिन स्कूल की छुट्टी के बाद मैदान में आते और खेलने की इच्छा जताते थे.”

“उस समय वह बहुत छोटे थे. इसलिए उनसे बड़ी उम्र के लड़के उन्हें बल्लेबाज़ी देने में आनाकानी करते थे. लेकिन उनका शौक़ कभी कम नहीं हुआ.”

“बचपन में भी वह स्वस्थ और गोल-मटोल थे, लेकिन उनका खेल बहुत अच्छा था.”

इंज़माम हरफ़नमौला क्रिकेटर थे. बल्लेबाज़ी में कमाल कर देते थे- स्कूली क्रिकेट के दिनों में इलियास पीरू इंज़माम की टीम के कप्तान.

स्कूली क्रिकेट के दिनों में इलियास पीरू इंज़माम की टीम के कप्तान हुआ करते थे.

इलियास बताते हैं, “इंज़माम हरफ़नमौला क्रिकेटर थे. बल्लेबाज़ी में कमाल कर देते थे और जिस दिन उनका बल्ला नहीं चलता था, उस दिन बाएं हाथ के गेंदबाज़ के रूप में मैच जिता देते थे.”

इलियास पीरू को वह समय भी अच्छी तरह याद है, जब वह इंज़माम से उस दौर में मिलने गए थे, जब पूरी दुनिया उन्हें विश्वस्तरीय बल्लेबाज़ के रूप में जान चुकी थी.

इंज़माम के घर मौजूद मेहमानों ने उनसे इलियास का परिचय कराने को कहा.

इस पर इंज़माम ने कहा, “ये मेरे स्कूल के दिनों के कप्तान हैं.”

यह सुनकर इलियास को बहुत ख़ुशी हुई कि इंज़माम अपने पुराने दिनों को नहीं भूले थे.

दोस्तों के लिए ऑमलेट बनाना

इंज़माम का मज़ाकिया अंदाज़ बहुत मशहूर है. उन्होंने कई बार प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी इसकी झलक दिखाई. जब वह दोस्तों के बीच होते थे, तो बात ही कुछ और होती थी.

इंज़माम और मुजतबा खोखर की दोस्ती बहुत पुरानी और मज़बूत थी. इस दोस्ती में कभी इस बात का फ़र्क़ महसूस नहीं हुआ कि इंज़माम के ये दोस्त सैलून चलाते थे और लोगों के बाल काटते थे.

वह भी क्या समय था, जब इंज़माम और मुजतबा रात भर बैठकर बातें किया करते थे. इस दौरान इंज़माम ऑमलेट बनाते थे और रोटियां बनाने की ज़िम्मेदारी मुजतबा की होती थी.

वर्ल्ड कप जीतने के बाद जब इंज़माम मुल्तान लौटे तो मुजतबा उनका स्वागत करने नहीं गए थे.

लेकिन इंज़माम का बड़प्पन देखिए कि जब उनका स्वागत करने वाला काफ़िला मुजतबा की दुकान के सामने से गुज़रा, तो उन्होंने गाड़ी रुकवाई और ख़ुद जाकर उनसे मुलाक़ात की.

हाशिम ख़ान, चाचा बरकत और मुजतबा खोखर, तीनों अब इस दुनिया में नहीं हैं. मुजतबा खोखर का निधन फ़रवरी 2024 में दिल का दौरा पड़ने से हुआ था.

नींद के शौक़ीन और चीज़ें भूल जाने की आदत

पाकिस्तान की फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट में इसहाक़ पटेल एक जाना-माना नाम हैं.

उन्होंने कई ऐसे क्रिकेटरों का उस समय मार्गदर्शन किया, जब उन्हें कोई नहीं पहचानता था. इंज़माम भी उन्हीं खिलाड़ियों में शामिल थे.

इसहाक़ पटेल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “यह उस समय की बात है, जब इंज़माम अंडर-19 क्रिकेट खेल रहे थे तब मैंने उन्हें यूनाइटेड बैंक लिमिटेड (यूबीएल) की टीम में शामिल होने का प्रस्ताव दिया, तो उन्हें लगा कि मैं मज़ाक कर रहा हूं.”

“मैंने उन्हें कराची बुला लिया और अपने घर में ठहराया. यहां वह यूबीएल के साथ-साथ मियां अज़मत प्रोफ़ेशनल क्लब की ओर से भी क्लब क्रिकेट खेलते थे. मैं उस क्लब का प्रभारी था.”

इसहाक़ पटेल बताते हैं, “उस दौर में रमज़ान के महीने में कराची में बहुत क्रिकेट खेली जाती थी. इंज़माम लगातार तीन साल तक रमज़ान में होने वाले टूर्नामेंट में हिस्सा लेते रहे. टूर्नामेंट ख़त्म होते ही वह ईद मनाने अपने शहर चले जाते थे.”

“एक टूर्नामेंट में वह ‘प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट’ भी बने थे. इनाम के तौर पर उन्हें लंदन आने-जाने का टिकट मिला था.”

इसहाक़ पटेल कहते हैं,

इसहाक़ पटेल कहते हैं, “नींद के मामले में इंज़माम कोई समझौता नहीं करते थे. रमज़ान में कई बार उन्हें सहरी के लिए उठाते-उठाते फ़ज्र की अज़ान हो जाती थी, लेकिन वह नहीं उठते थे. इसके बावजूद वह बिना कुछ खाए-पिए रोज़ा ज़रूर रखते थे.”

“इंज़माम को चीज़ें भूलने की भी आदत थी. एक दिन उन्होंने कपड़े प्रेस करने के लिए रेफ़्रिजरेटर का प्लग निकाला और कपड़े प्रेस करने के बाद उसे वापस लगाना भूल गए.”

“इसका नतीजा यह हुआ कि रेफ़्रिजरेटर में रखी सारी बर्फ़ पिघल गई और फ़र्श पर पानी ही पानी हो गया. कई बार वह कहीं जाते तो घर की चाबी वहीं भूलकर लौट आते थे. लेकिन इन सभी बातों के बावजूद वह अपने से बड़ों की इज़्ज़त करने वाले युवा थे.”

क्रिकेटरों से पुरानी दोस्तियां

क्रिकेटरों में इंज़माम की सबसे पुरानी दोस्ती लेग स्पिनर मुश्ताक़ अहमद से रही है.

यह दोस्ती उस समय शुरू हुई थी, जब दोनों अंडर-14 क्रिकेट खेलते थे. बाद में वक़ार यूनुस भी इस दोस्ती का हिस्सा बन गए.

मुश्ताक़ अहमद ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, “इंज़माम शुरू से ही प्रतिभाशाली क्रिकेटर थे. उनका मज़ाकिया अंदाज़ भी शुरू से ही ज़बरदस्त था. लेकिन वह हर किसी के साथ मज़ाक नहीं करते थे. वह केवल उन्हीं लोगों के साथ मज़ाक करते हैं, जिनके साथ सहज महसूस करते हैं.”

“इंज़माम के मज़ाकिया अंदाज़ को समझने के लिए उन्हें जानना बहुत ज़रूरी है. एक क्रिकेटर के रूप में उनमें खेल की बहुत अच्छी समझ थी. वह स्कोर बोर्ड देखकर अपनी पारी आगे बढ़ाते थे.”

“उनके अधिकतर शतक टीम को जीत दिलाने वाले रहे. उन्होंने हमेशा एक बड़े मक़सद के साथ क्रिकेट खेली. उनकी इच्छा और कोशिश थी कि वह जावेद मियांदाद के सबसे ज़्यादा रनों का रिकॉर्ड तोड़ें, लेकिन कुछ ही रनों से ऐसा नहीं कर पाए.”

“वह कभी नेट प्रैक्टिस से बचने की कोशिश नहीं करते थे. नेट पर वक़ार यूनुस, वसीम अकरम और शोएब अख़्तर जैसे मुश्किल गेंदबाज़ों का सामना करते थे.”

“आजकल कई खिलाड़ी इस डर के कारण ऐसा करने से बचते हैं कि कहीं गेंद उन्हें लग न जाए.”

“इंज़माम जितनी आसानी से तेज़ गेंदबाज़ी खेलते थे, उतनी ही आसानी से स्पिन गेंदबाज़ों का सामना भी करते थे.”

“स्पिन गेंदबाज़ों की मददगार पिच पर भी वह बैकफ़ुट पर कट, पुल और स्वीप शॉट पूरे आत्मविश्वास के साथ खेलते थे.”

‘शांत बल्लेबाज़ी करते थे इंज़माम’

वरिष्ठ पत्रकार अयाज़ मेमन कहते हैं, “इंज़माम की बल्लेबाज़ी का अंदाज़ बहुत शांत हुआ करता था. उनके पास शॉट खेलने के लिए बहुत समय होता था. दूसरे शब्दों में कहें तो वह बल्लेबाज़ी को आसान बना देते थे. तेज़ गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़ वह शुरू से ही बहुत अच्छा खेलते थे, लेकिन स्पिन गेंदबाज़ों के सामने भी उनकी बल्लेबाज़ी कमाल की होती थी.”

“उनकी शख़्सियत बहुत गरिमापूर्ण थी और उनका मज़ाकिया अंदाज़ भी कमाल का था. प्रेस कॉन्फ़्रेंस में वह हर सवाल का जवाब हंसते-मुस्कुराते देते थे. मैंने उन्हें दबाव में भी कभी घबराते नहीं देखा. मैदान पर भी उन्हें कभी किसी के साथ बदतमीज़ी करते नहीं देखा.”

अंतरराष्ट्रीय अंपायर अलीम डार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “जब आप अंपायरिंग कर रहे होते हैं तो आपका पूरा ध्यान अपने काम पर होता है. लेकिन जब आप स्क्वायर लेग पर खड़े होते हैं, तो पूरी तरह ध्यान लगाने के बावजूद कुछ पल ऐसे मिल जाते हैं, जब आप बल्लेबाज़ और गेंदबाज़ को देख सकते हैं.”

“अपने करियर में मैंने जिन बल्लेबाज़ों की बल्लेबाज़ी का आनंद लिया, उनमें इंज़माम भी शामिल हैं.”

“वैसे तो इंज़माम ने कई यादगार पारियां खेलीं, लेकिन मैं बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मुल्तान टेस्ट में खेली गई उनकी 138 रन की पारी नहीं भूल सकता. उस पारी से उन्होंने अकेले ही पाकिस्तान को जीत दिलाई थी. मैं उस टेस्ट मैच में टीवी अंपायर था.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS