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ईरान के मामले में चीन की सोच यहाँ ट्रंप से हो रही है आमने-सामने

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Source :- BBC INDIA

चीन लगातार युद्ध ख़त्म करने की मांग कर रहा है. वो चाहता है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोला जाए.

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची बीजिंग पहुँचे थे. इससे इस बात को बल मिलता है कि ईरान पर चीन का कितना असर है.

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाक़ात में ईरान युद्ध सबसे अहम मुद्दों में शामिल है.

सात महीने पहले ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से चीन का रुख़ नहीं बदला है. उसने ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों की निंदा की है. चीन ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका के प्रतिबंधों का भी विरोध किया है.

इसके साथ ही चीन लगातार युद्ध ख़त्म करने की मांग करता रहा है. वह ख़ास तौर पर चाहता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोला जाए.

चीन अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है. उसके पास बड़ा तेल रिज़र्व है. इसी वजह से वह अब तक ईरान युद्ध के असर को काफ़ी हद तक संभाल पाया है.

सेफ़ ज़ोन में रहना चाहता है चीन

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सेटर में चीन और मध्य-पूर्व मामलों के जानकार आंद्रेया गिज़ेली कहते हैं कि चीन इस स्थिति को लंबे समय तक संभाल सकता है. लेकिन समय बीतने के साथ इसका आर्थिक बोझ बढ़ता जाएगा.

उनके मुताबिक़, चीन युद्ध ख़त्म कराना चाहता है, लेकिन उसे इसके साथ अपनी दूसरी अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं का भी ध्यान रखना होगा.

डॉक्टर गिज़ेली कहते हैं, “चीन नहीं चाहता कि यह संघर्ष अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में परेशानी पैदा करे. लेकिन वह ऐसा कोई क़दम भी नहीं उठाएगा, जिससे ईरान के बुनियादी हितों और मांगों को नुक़सान पहुँचे.”

वह कहते हैं, “ईरान और चीन की सोच आम तौर पर एक जैसी है. दोनों मानते हैं कि अमेरिका और इसराइल की आक्रामक कार्रवाई के कारण यह युद्ध शुरू हुआ और अब तक जारी है.”

ऊर्जा और अर्थव्यवस्था

युद्ध से पहले चीन तेल के लिए मध्य पूर्व पर काफ़ी निर्भर था. इसलिए वह चाहता है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य दोबारा खोला जाए.

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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के हामिदरेज़ा अज़ीज़ी कहते हैं कि चीन ऊर्जा का एक बड़ा उपभोक्ता है. इसलिए युद्ध जारी रहने से उसे नुक़सान हो रहा है.

अमेरिका के ऊर्जा सूचना प्रशासन की 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, चीन में इस्तेमाल होने वाली कुल ऊर्जा में तेल की हिस्सेदारी क़रीब पांचवां हिस्सा है. लेकिन चीन अपनी ज़रूरत का 70 फ़ीसदी से ज़्यादा तेल दूसरे देशों से ख़रीदता है.

पिछले साल चीन ने ईरान से हर दिन क़रीब 14 लाख बैरल तेल ख़रीदा था. यह चीन के कुल कच्चे तेल आयात का केवल 12 फ़ीसदी था. वहीं, मध्य पूर्व के बाक़ी देशों की हिस्सेदारी 42 फ़ीसदी थी.

ईरान और खाड़ी के दूसरे देशों से मिलने वाले तेल में जो कमी आई, उसका कुछ हिस्सा चीन ने रूस, ब्राज़ील और दूसरे निर्यातक देशों से तेल ख़रीदकर पूरा कर लिया है. लेकिन इस क्षेत्र से मिलने वाली गैस का दूसरा विकल्प तलाशना कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा.

चीन के पास कुल कितना तेल जमा है, इसे गोपनीय रखा जाता है. हालांकि, अनुमान है कि 2025 में उसके पास 100 से 140 करोड़ बैरल तेल का भंडार था.

अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में चीन की ऊर्जा नीतियों पर शोध करने वाली एरिका डाउन्स कहती हैं, “अगर युद्ध शुरू होने के समय चीन के पास क़रीब 140 करोड़ बैरल तेल जमा था, तो 2025 में मध्य-पूर्व से होने वाले आयात के हिसाब से यह तेल 254 दिनों तक चल सकता था.”

उनका कहना है कि चीन का तेल भंडार इससे भी लंबे समय तक चल सकता है, क्योंकि युद्ध के बावजूद मध्य-पूर्व से कुछ तेल अब भी चीन पहुंच रहा है.

चीन

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हालांकि, रॉयटर्स में एशिया की कमोडिटी पर लिखने वाले क्लाइड रसेल के मुताबिक़, पिछले चार महीनों में से तीन महीनों में चीन को अपने तेल भंडार से तेल निकालना पड़ा है. इनमें अगस्त भी शामिल है.

डॉक्टर डाउन्स कहती हैं, “बीजिंग चाहेगा कि उसे जल्द से जल्द अपने तेल भंडार का इस्तेमाल बंद करना पड़े, ताकि आगे किसी ज़रूरत के लिए उसके पास पर्याप्त तेल बचा रहे.”

अगर ईरान समर्थित हूती सऊदी अरब पर हमले बढ़ाते हैं और बाब अल-मंदब स्ट्रेट पर अपनी पकड़ मज़बूत करते हैं, तो दुनिया के ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल और बढ़ सकती है.

ईरान युद्ध से पैदा हुई आर्थिक परेशानियां दुनिया को आर्थिक संकट की तरफ़ भी ले जा सकती हैं. ऐसा होना चीन की उस अर्थव्यवस्था के लिए बुरी ख़बर होगा, जो निर्यात पर काफ़ी निर्भर है.

साल 2019 से चीन की आर्थिक विकास दर धीमी हो रही है. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था प्रॉपर्टी संकट, पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक तनाव और स्थानीय सरकारों के बढ़ते क़र्ज़ जैसी समस्याओं से जूझ रही है.

वॉशिंगटन के थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के मुताबिक़, पिछले साल चीन की जीडीपी में जितनी बढ़ोतरी हुई, उसमें शुद्ध निर्यात का योगदान 32.7 फ़ीसदी था. यह 1997 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था.

चीन में लोग अब भी कम ख़र्च कर रहे हैं. ऐसे में निर्यात उसकी आर्थिक तरक़्क़ी का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है.

युद्ध अब ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहाँ कोई भी पक्ष आगे बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा. इस बीच ट्रंप प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ा रहा है.

वॉशिंगटन ने चेतावनी दी है कि ईरान की अर्थव्यवस्था की मदद करने वाली कंपनियों, बैंकों और देशों पर भी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

अमेरिका ने चीन की कई कंपनियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए हैं. लेकिन अब तक उसने चीन के बड़े बैंकों को निशाना नहीं बनाया है. अमेरिका यह सावधानी ऐसे समय बरत रहा है, जब वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापारिक तनाव पहले से काफ़ी ज़्यादा है.

बीजिंग ने ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक अभियान में शामिल होने की वॉशिंगटन की मांग को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है.

चीन का कहना है कि वह “ग़ैर-क़ानूनी और एकतरफ़ा प्रतिबंधों” का विरोध करता है. उसका यह भी कहना है कि ईरान के साथ उसका सहयोग अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दायरे में होता है.

अमेरिकी दबाव में ईरान से तेल ख़रीदना बंद नहीं करेगा चीन

ईरान मामलों के जानकार अज़ीज़ी कहते हैं कि अमेरिकी दबाव के कारण चीन ईरानी तेल ख़रीदना बंद नहीं करेगा.

वह कहते हैं, “चीन ऐसी मिसाल नहीं बनने देना चाहता, जिसमें अमेरिका दबाव डालकर चीनी कंपनियों और बैंकों से अपनी नीतियां लागू करवा सके.”

हालांकि, अमेरिका की समुद्री नाकाबंदी के कारण ईरान के लिए चीन तक तेल पहुंचाना बहुत मुश्किल हो गया है.

मार्च में ईरान हर दिन 20 लाख बैरल तेल का निर्यात कर रहा था. अगस्त में यह घटकर प्रतिदिन 2 लाख 20 हज़ार से 2 लाख 55 हज़ार बैरल के बीच रह गया.

रॉयटर्स के मुताबिक़, अमेरिका ने 14 जुलाई को समुद्री नाकाबंदी दोबारा शुरू की थी. उसके बाद से ईरान का कच्चा तेल लेकर कोई भी जहाज़ होर्मुज़ से निकलकर चीन नहीं पहुंच पाया है.

अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में ईरान मामलों के जानकार मोहम्मद ग़ाएदी कहते हैं कि अगर नाकाबंदी जारी रहती है, तो ईरान और चीन का व्यापार धीरे-धीरे ज़मीनी रास्तों तक सीमित हो जाएगा.

लेकिन ज़मीनी रास्तों से सामान भेजना समुद्री रास्तों के मुक़ाबले महंगा पड़ता है. इन रास्तों से बहुत कम सामान भी भेजा जा सकता है.

चीन वित्तीय प्रतिबंधों का असर कम करना चाहता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह समुद्री नाकाबंदी को चुनौती देने की स्थिति में है या ऐसा करना चाहता है.

अगर चीन ने इस नाकाबंदी को तोड़ने की कोशिश की, तो बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच टकराव कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है कि चीन का नेतृत्व इसकी क़ीमत चुकाने के लिए तैयार है.

डॉक्टर गिज़ेली कहते हैं कि चीन साफ़ कर चुका है कि वह बातचीत के ज़रिए युद्ध ख़त्म करना चाहता है. उनके मुताबिक़, चीन शायद ईरान को युद्ध और बढ़ाने से रोकेगा.

वह कहते हैं, “चीन बातचीत दोबारा शुरू कराने में मदद कर सकता है और शायद ऐसा करेगा भी. वह ईरान पर कुछ रियायतें देने का दबाव भी डाल सकता है. इससे राष्ट्रपति ट्रंप किसी तरह की जीत का दावा कर सकेंगे और इसे युद्ध ख़त्म करने की वजह बना पाएंगे.”

लेकिन डॉक्टर गिज़ेली के मुताबिक़, चीन चाहेगा कि समझौते से उसके साझेदार ईरान को कुछ ठोस फ़ायदे भी मिलें. इनमें प्रतिबंध हटाना, विदेशों में रोकी गई रकम तक पहुंच और सैन्य हमलों का अंत शामिल हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS