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ट्रंप द्वारा 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान के अधिकांश घोषित रणनीतिक लक्ष्य अब भी अधूरे पड़े हैं। पढ़ें टाइमलाइन के साथ पूरी कहानी…
Iran US Deal: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 28 फरवरी को इजरायल संग ईरान पर शुरू किए गए सैन्य अभियान के कई घोषित रणनीतिक उद्देश्य अब भी अनसुलझे हैं। समझौता ज्ञापन (MOU) में इनमें से अधिकांश मुद्दों को या तो पूरी तरह हटा दिया गया है, या भविष्य की वार्ताओं के लिए स्थगित कर दिया गया है। युद्ध के 15 सप्ताह बाद हुए इस समझौते को अमेरिकी प्रशासन ने बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के मूल लक्ष्यों में से बहुत कम हासिल हो सके हैं।
दरअसल, ट्रंप ने युद्ध शुरू करते समय ईरान के खिलाफ पांच बड़े लक्ष्य सार्वजनिक रूप से रखे थे। ईरानी शासन को उखाड़ फेंकना, देश के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करना, बैलिस्टिक मिसाइल उद्योग को नष्ट करना, नौसेना को तबाह करना और पूरे क्षेत्र में ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों (प्रॉक्सी मिलिशिया) के समर्थन पर सख्त अंकुश लगाना। लेकिन अब तक सामने आए रिपोर्टों और ईरानी मीडिया के हवाले से पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर लक्ष्य या तो अधूरे हैं या समझौते के दायरे से बाहर रखे गए हैं।
सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा
बता दें कि संघर्ष की शुरुआत में ट्रंप ने ईरानी जनता से खुलकर अपने धार्मिक शासन के खिलाफ विद्रोह करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह मौका है जब ईरानी लोग अपनी आजादी के लिए लड़ सकते हैं। हालांकि, अंतिम समझौता ज्ञापन में ईरान के अंदर किसी भी प्रकार के राजनीतिक या सत्ता परिवर्तन का कोई जिक्र नहीं है। तेहरान में धार्मिक नेतृत्व अभी भी मजबूती से कायम है। युद्ध में भारी सैन्य नुकसान झेलने के बावजूद ईरानी शासन ने अंदरूनी स्थिरता बनाए रखी और कोई बड़े पैमाने पर विद्रोह नहीं हुआ। समझौते में शासन परिवर्तन के लिए कोई तंत्र या समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
परमाणु कार्यक्रम अभी भी अनसुलझा
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना ट्रंप का सबसे ज्यादा दोहराया गया युद्ध लक्ष्य था। उन्होंने बार-बार कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा। लेकिन समझौते की रिपोर्टों के अनुसार यह मुद्दा पूरी तरह सुलझाया नहीं गया है। ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार और संवेदनशील परमाणु केंद्रों से जुड़े सवालों को भविष्य की वार्ताओं के लिए छोड़ दिया गया है। ईरान ने हमेशा दावा किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा है।
मिसाइल कार्यक्रम एजेंडे से बाहर
ट्रंप ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को ‘पूरी तरह नष्ट’ करने की कसम खाई थी। उन्होंने कहा था कि ईरान की मिसाइलें न सिर्फ इजरायल बल्कि अमेरिकी ठिकानों के लिए भी खतरा हैं। वहीं, न्यूज एजेंसी एएफपी ने ईरानी मीडिया के हवाले से बताया कि मिसाइल कार्यक्रम को बातचीत के एजेंडे से पूरी तरह हटा दिया गया है। कोई प्रतिबंध या निरीक्षण व्यवस्था इस समझौते में शामिल नहीं की गई है।
हिजबुल्लाह समेत प्रॉक्सी फोर्सेस पर कोई अंकुश नहीं
अमेरिका और इजरायल का एक प्रमुख लक्ष्य लेबनान के हिजबुल्लाह, यमन के हूती, इराक और सीरिया के ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों को दिए जाने वाले हथियार, धन और प्रशिक्षण पर रोक लगाना था। लेकिन समझौते में इस दिशा में कोई ठोस प्रावधान नहीं है। ईरानी मीडिया ने साफ कहा है कि ‘प्रतिरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) को दिए जाने वाले समर्थन को वार्ता से बाहर रखा गया है। नतीजतन, ईरान की क्षेत्रीय पहुंच और प्रभाव लगभग बरकरार है।
होर्मुज फिर खुला, लेकिन पुरानी शर्तों पर नहीं
युद्ध का सबसे बड़ा वैश्विक आर्थिक प्रभाव होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी रहा, जिससे दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ। बंदी के दौरान तेल की कीमतें आसमान छू गईं, समुद्री यातायात ठप हो गया और कई देशों में मुद्रास्फीति बढ़ गई। अमेरिकी अधिकारियों ने जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया है। लेकिन ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मार्ग का संचालन पहले जैसा स्वतंत्र नहीं रहेगा। तेहरान अब इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपनी निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने का इरादा रखता है।
ईरान को भारी सैन्य नुकसान, फिर भी जवाबी हमले जारी
संघर्ष के दौरान अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के सैकड़ों ठिकानों को निशाना बनाया गया। अनुमानों के अनुसार 700 बैलिस्टिक मिसाइल बल स्थल, 500 कमान और नियंत्रण केंद्र, 450 लॉन्चर, 250 वायु रक्षा प्रणालियां, 250 यूएवी (ड्रोन) संपत्तियां और 155 नौसैनिक जहाज क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए। इसके बावजूद ईरान ने पूरे 15 सप्ताह तक पूरे पश्चिम एशिया में मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रखे, जिनके निशाने पर इजरायल, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान शामिल थे।
15 सप्ताह में कब क्या हुआ?
- 28 फरवरी: अमेरिका-इजरायल हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, कई वरिष्ठ कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए। ईरान ने जवाब में होर्मुज अवरुद्ध कर दिया और क्षेत्रीय अमेरिकी-इजरायली ठिकानों पर हमले किए।
- 1 मार्च: खाड़ी में ईरानी हमलों में तीन भारतीय मारे गए। कुवैत में छह अमेरिकी सैनिक हताहत।
- 4 मार्च: श्रीलंका तट पर ईरानी जहाज आईरिस डेना डूबा।
- 8 मार्च: मोहतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया।
- 13 मार्च: अमेरिका ने खार्ग द्वीप तेल केंद्र पर हमला किया।
- 18 मार्च: इजरायल ने साउथ पार्स गैस क्षेत्र पर हमला, ईरान ने कतर के रास लाफान पर जवाबी हमला किया।
- 7 अप्रैल: अमेरिका ने दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की।
- 11 अप्रैल: जेडी वैंस इस्लामाबाद पहुंचे, वार्ता विफल।
- 7-26 मई: बंदर अब्बास और क़ेशम द्वीप पर बड़े हमले।
- 10 जून: पलाऊ ध्वज वाले टैंकर पर हमला, तीन भारतीय नाविक शहीद।
- 15 जून: ट्रंप ने समझौते की घोषणा की। ट्रंप, जेडी वैंस और ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालीबाफ ने डिजिटल हस्ताक्षर किए।
बता दें कि युद्धविराम से प्रत्यक्ष लड़ाई तो रुक गई है, लेकिन ट्रंप प्रशासन द्वारा तय किए गए अधिकांश रणनीतिक उद्देश्य अधूरे रह गए हैं। सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, परमाणु कार्यक्रम अनसुलझा है, मिसाइल क्षमता पर कोई अंकुश नहीं लगा और क्षेत्रीय प्रभाव बरकरार है। यही कारण है कि एक्सपर्ट्स इसे ट्रंप की ‘सीमित जीत’ या ‘अनिश्चित समझौता’ मान रहे हैं, जिसके परिणाम अभी सामने आना बाकी है।
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