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एक शापित गजल जिसे लिखने, गाने वाले दुनिया से चल बसे, 50 साल पुरानी इस गजल को गाने से डरते हैं लोग

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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एक ऐसी गजल जिसे लिखने और गाने वाला इस दुनिया से चल बसा। इस गजल को शापित कहा गया, परिवार के सदस्यों ने सिंगर से इस गजल को नहीं गाने का वादा लिया। 50 साल पुरानी ये गजल मनहूस मानी जाती है।

एक शापित गजल जिसे लिखने, गाने वाले दुनिया से चल बसे, जानिए क्यों?

संगीत की दुनिया में कई महान गायक, गीतकार, गजल लिखने वाले पैदा हुए। कुछ ऐसे जो याद रह गए और कुछ अमर हो गए। ऐसे ही एक अमर शायर, कवि थे इब्न-ए-इंशा, जिनकी लिखी गजलों ने माहौल खूबसूरत और सुकून भरा बना दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं इन्होने 70 के दशक में एक ऐसी गजल भी लिखी थी जो मौत को बुलावा कही जाती थी। हैरानी वाली बात तो ये कि जब ये गजल गाई गई टी इसे गाने वालों की अचानक मौत हो गई। इस गजल को शापित, मनहूस माना गया।

इब्न-ए-इंशा की वो गजल

बात साल 1929 की है। पंजाब के फिलौर में एक शेर मुहम्मद खान का जन्म हुआ। उन्होंने देश-दुनिया में अपनी गजलों से अलग पहचान बनाई और उन्हें इब्न-ए-इंशा के नाम से पहचाना गया। इब्ने इंशा अपनी शायरी और गजलों से छा रहे थे और इसी बीच बंटवारे के दर्द ने उन्हें भारत देश से अलग कर दिया और वो पाकिस्तान के हो गए। इब्न-ए-इंशा ने वैसे तो कई गजलें लिखीं, लेकिन उनमें से एक थी ‘इंशाह जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या? वैशी को सुकून से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या?’(यहां कूच से मतलब, दुनिया से जाना बयाया गया है।) इस गजल को खलील अहमद ने अपने म्यूजिक से तैयार किया था और उस्ताद अमानत अली खान ने अपनी आवाज में पाकिस्तान टीवी पर इसे गया था।

इस गजल को गाने वाले अमानत अली चल बसे

इस गजल को गाने के कुछ महीनों बाद अमानत अली खान का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 52 साल की थी। अमानत अली की मौत से इब्न-ए-इंशा दुखी हुए थे। 4 साल बाद वो लंदन के एक हॉस्पिटल में कैंसर से लड़ रहे थे और अपने आखिरी लेटर में उन्होंने अमानत अली की मौत को याद किया और अपनी लिखी हुई उस गजल को मनहूस बताया। उन्होंने लिखा था ‘ये मनहूस गजल और कितनों की जान लेगी’। हैरानी वाली बात ये है कि अगले ही दिन इब्न-ए-इंशा भी दुनिया को छोड़ गए।

गजल गाने वाले बेटे भी दुनिया में नहीं रहे

इस गजल की गाने वालों की किस्मत यहीं नहीं रुकी। साल 2007 में अमानत अली खान के बेटे असद अली खान ने ये गजल पाकिस्तान टीवी के एक कॉन्सर्ट में गई। और कुछ ही महीनों बाद उनका भी निधन हो गया। हैरान करने वली बात ये थी कि असद का निधन भी उसी उम्र में हुआ जिस उम्र में उनके पिता अमानत अली ने दुनिया छोड़ी थी। वो भी 52 साल के थे। इस गजल को गाने वाले कई अन्य सदस्य भी दुनिया में नहीं रहे। अमानत अली के परिवार के लोग इसे शापित मानते हैं। अमानत अली के बेटे शफकत अली ने एक बार बताया था कि उनके सबसे बड़े भाई अमजद अली भी इस गजल को गाते थे और प्रोड्यूसर भी थे, अब वो भी इस दुनिया में नहीं हैं।

परिवार ने लिया वादा

शफकत अली पाकिस्तानी म्यूजिक का बड़ा नाम है। बड़े म्यूजिशियन माने जाते हैं। उनके नाम पर कई शोज और कॉन्सर्ट होते हैं, लेकिन वो ये गजल नहीं गाते। उनका कहना है कि वो अंधविश्वासी नहीं है। मौत और जीवन ऊपर वाले के हाथ में हैं। लेकिन उनके परिवार के लोगों ने उनसे ये वादा लिया है कि वो ये गजल नहीं गाएंगे। इस गजल को 50 साल से ज्यादा का समय हो गया है और बड़े से बड़ा फनकार इस गजल को अपने गले से उतारने से डरता है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN