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क्या सरकार हैक कर सकती है आपका फोन? कॉल, कैमरा और लोकेशन का पूरा सच

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Source :- LIVE HINDUSTAN

क्या सरकार आपके फोन की कॉल सुन सकती है, कैमरा एक्सेस कर सकती है या लोकेशन ट्रैक कर सकती है? जानिए भारत में डिजिटल निगरानी से जुड़े कानून, तकनीकी सीमाएं और निजता के अधिकार का पूरा सच क्या है।

क्या सरकार आपके स्मार्टफोन की कॉल सुन सकती है, कैमरे से आपकी एक्टिविटीज पर नजर रख सकती है या आपकी लोकेशन ट्रैक कर सकती है? स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ये सवाल प्राइवेसी और डिजिटल सिक्योरिटी से जुड़े हैं। भारत में सरकार के पास कुछ कंडीशंस में डिजिटल कम्युनिकेशन की निगरानी करने और टेलीकॉम सेवाओं को कंट्रोल करने की कानूनी शक्तियां हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार बिना किसी सीमा के हर फोन को हैक करके उसका कैमरा और माइक्रोफोन चालू कर सकती है। आइए आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।

क्या सरकार आपकी कॉल सुन सकती है?

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 के साथ चुनिंदा कंडीशंस में कंप्यूटर मीडियम्स के जरिए सेंड, रिसीव या स्टोर की गई जानकारी को इंटरसेप्ट करने, मॉनिटर करने या डिक्रिप्ट करने के आदेश दिए जा सकते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, पब्लिक सिस्टम और कानून में निर्धारित अन्य आधारों पर ऐसी कार्रवाई की जा सकती है। इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया और संबंधित विभाग या अधिकारी की मंजूरी जरूरी होती है। सरकार ने दिसंबर 2018 में भी साफ किया था कि ऑफीशियल एजेंसियों को लेकर जारी आदेश का मकसद मौजूदा कानूनी प्रक्रिया को लागू करना था, ना कि नई शक्तियां देना। यानी कानूनी निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि हर नागरिक की कॉल लगातार सुनी जा रही है।

क्या सरकार फोन का कैमरा और माइक्रोफोन चालू कर सकती है?

कॉल इंटरसेप्शन और फोन के कैमरे को दूर से चालू करना दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी डिवाइस का कैमरा, माइक्रोफोन या स्क्रीन रिमोट से एक्सेस करने के लिए तकनीकी पहुंच या किसी विशेष सॉफ्टवेयर और सुरक्षा कमजोरी का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है। पेगासस जैसे स्पाइवेयर ने दिखाया है कि एडवांस्ड सर्विलांस टेक से स्मार्टफोन की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। हालांकि, केवल कानूनी इंटरसेप्शन की शक्ति के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि सरकार किसी भी फोन का कैमरा कभी भी चालू कर सकती है। किसी खास व्यक्ति के फोन को हैक किए जाने का दावा करने के लिए अलग तकनीकी सबूत जरूरी हैं।

क्या आपकी लोकेशन ट्रैक की जा सकती है?

मोबाइल नेटवर्क से फोन की अनुमानित लोकेशन का पता लगाया जा सकता है। फोन की लोकेशन सेवाओं और A-GPS तकनीक से अधिक सटीक जानकारी भी मिल सकती है। दिसंबर 2025 में रॉयटर्स ने रिपोर्ट दी थी कि भारत में टेलीकॉम इंडस्ट्री की ओर से स्मार्टफोन में सैटेलाइट लोकेशन ट्रैकिंग हमेशा चालू रखने का प्रस्ताव विचाराधीन था। ऐपल, गूगल और सैमसंग ने इस प्रस्ताव पर प्राइवेसी से जुड़ी चिंताएं जताई थीं। उस रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय सरकार ने इस पर आखिरी फैसला नहीं लिया था। इसलिए इसे लागू हो चुका नियम बताना सही नहीं होगा।

संचार साथी ऐप को लेकर क्यों हुआ विवाद?

नवंबर 2025 में सरकार ने नए स्मार्टफोन में संचार साथी ऐप अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने का निर्देश दिया था। प्राइवेसी और अनिवार्य इंस्टॉलेशन को लेकर उठे सवालों के बाद 3 दिसंबर 2025 को सरकार ने यह निर्देश वापस ले लिया। यह मामला दिखाता है कि स्मार्टफोन पर सरकारी नीति और निजता को लेकर बहस कितनी अहम है। हालांकि, किसी ऐप को प्री-इंस्टॉल करने का निर्देश अपने आप फोन को हैक करने या रिमोट कंट्रोल हासिल करने का प्रूफ नहीं है।

कुल मिलाकर, भारत सरकार कानून के तहत कुछ कंडीशंस में फोन की कॉल और डिजिटल कम्युनिकेशन की निगरानी कर सकती है और मोबाइल नेटवर्क के जरिए आपकी लोकेशन पता लगा सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार हर नागरिक का फोन हैक करके उसका कैमरा या माइक्रोफोन चालू करती है। कैमरा और माइक्रोफोन को रिमोट से एक्सेस करना अलग प्रक्रिया है, जिसके लिए डिवाइस तक विशेष पहुंच या स्पाइवेयर जैसी तकनीक की जरूरत हो सकती है। इसलिए सरकार के पास निगरानी की कानूनी शक्तियां होना और हर फोन को हैक करना दो अलग बातें हैं। सरकार आमतौर पर ऐसा नहीं करती।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN