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भारत आने वाले दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर भारत ग्लोबल जीडीपी में हिस्सेदारी के मामले में साल 2060 तक चीन को पछाड़ देगा। यह अनुमान रिसर्च संस्थान वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब (WIL) से जुड़े रिसर्चर की रिपोर्ट में लगाया गया है। बता दें कि पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स (पीएसई) में स्थित WIL वैश्विक असमानताओं के अध्ययन पर काम करता है।

क्या है रिपोर्ट में?

रिपोर्ट कहती है कि वर्तमान में चीन की पीपीपी के संदर्भ में वैश्विक जीडीपी में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो अमेरिका की तुलना में लगभग एक-तिहाई अधिक है। इसमें वर्ष 2035 तक चीन की अर्थव्यवस्था के अमेरिका से लगभग दोगुनी होने का अनुमान भी जताया गया है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की जनसंख्या हिस्सेदारी तेजी से घट रही है। वर्ष 1945 में जहां यह दुनिया की जनसंख्या का लगभग 23 प्रतिशत थी, वहीं 2025 में यह घटकर करीब 17 प्रतिशत रह गई है और वर्ष 2100 तक इसके आठ प्रतिशत से भी कम रह जाने का अनुमान है।

रिपोर्ट कहती है कि इसी वजह से 21वीं सदी के दूसरे हिस्से में चीन की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी स्थिर होने के बाद घटने का अनुमान है। लगभग वर्ष 2060 तक भारत के चीन को पीछे छोड़ देने की संभावना है। इसके मुताबिक, इस बात की संभावना बहुत कम है कि चीन कभी उस तरह का वैश्विक प्रभुत्व हासिल कर सकता है जैसा अमेरिका ने लगभग 1950 के आसपास या यूरोप ने 1900–1910 के बीच हासिल किया था। इसके चलते भविष्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था के बहुध्रुवीय बने रहने की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा समय में भारत में असमानता चीन की तुलना में कहीं अधिक है लेकिन उत्पादकता वृद्धि अपेक्षाकृत कम है। मानव पूंजी में चीन के अधिक और बेहतर निवेश को इसका कारण बताया गया है।

वर्ष 2026 में भारत का जीडीपी 4.15 लाख करोड़ डॉलर रहने का अनुमान है जबकि ब्रिटेन का जीडीपी 4.27 लाख करोड़ डॉलर और जापान का 4.38 लाख करोड़ डॉलर रह सकता है। अमेरिका 32.38 लाख करोड़ डॉलर के साथ सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा, जबकि चीन 20.85 लाख करोड़ डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहेगा।

क्या होता है पीपीपी?

यह एक आर्थिक मापदंड है, जो बताता है कि किसी देश की मुद्रा से वहां कितनी वस्तुएं और सेवाएं खरीदी जा सकती हैं। आसान भाषा में समझें तो पीपीपी यह तुलना करता है कि अलग-अलग देशों में समान रकम से कितनी खरीदारी की जा सकती है।

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