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ट्रंप ने सऊदी से कही थी इसराइल को मान्यता देने की बात लेकिन डील में कुछ और ही निकला

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Source :- BBC INDIA

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

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बीबीसी फ़ारसी को सऊदी अरब और अमेरिका के बीच हुई परमाणु डील का ओरिजिनल वर्ज़न मिला है.

इससे पता चलता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे के उलट, सऊदी अरब के लिए 20 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) का रास्ता खुला है.

एक अगस्त को इस समझौते पर हस्ताक्षर की ख़बर सामने आने के बाद ट्रंप ने कहा था कि पूरा समझौता सऊदी अरब के अब्राहम समझौते में शामिल होने की शर्त पर आधारित है.

यानी सीधे शब्दों में ट्रंप के मुताबिक यूरेनियम एनरिचमेंट करने के एवज़ में सऊदी अरब को इसराइल को मान्यता देनी होगी.

लेकिन बीबीसी की पड़ताल से पता चलता है कि कम से कम इस दस्तावेज़ के मूल पाठ (ओरिजिनल वर्ज़न) में अब्राहम समझौते का कोई ज़िक्र नहीं है.

सऊदी अरब के लिए इसराइल को मान्यता देना भी अनिवार्य नहीं है.

ट्रंप ने क्या कहा था?

अमेरिकी राष्ट्रपति ने सऊदी अरब के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर के अगले दिन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ पर लिखा था, “असैन्य परमाणु समझौते (जो सिर्फ़ असैन्य इस्तेमाल से जुड़ा होगा) उसे मंज़ूरी दी जाएगी. लेकिन यह पूरी तरह सऊदी अरब के बेहद सम्मानित और सफल अब्राहम समझौते में शामिल होने पर निर्भर है.”

उस समय सऊदी अधिकारियों ने इन दावों का खंडन किया था. लेकिन व्हाइट हाउस ने समझौते को जारी नहीं किया था. इसलिए अब तक इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी थी.

अब, अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के छह हफ़्ते बाद, इस समझौते का पूरा और हस्ताक्षर किया हुआ वर्ज़न बीबीसी को मिल गया है. इसे अमेरिकी कांग्रेस को भेजा गया था.

यह दस्तावेज़ पुष्टि करता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो कहा है, वो डील से मेल नहीं खाता.

ओरिजिनल डील में क्या लिखा है?

72 पन्नों के इस समझौते की मूल प्रति में कहीं भी सऊदी अरब के अब्राहम समझौते में शामिल होने या इसराइल को मान्यता देने की कोई शर्त नहीं है.

इसमें सऊदी अरब के लिए यूरेनियम को 20 प्रतिशत तक एनरिचमेंट (संवर्धित) करने का रास्ता, शर्तों और चरणबद्ध तरीके से, आधिकारिक तौर पर खुला रखा गया है.

सऊदी अरब के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के एडिशनल प्रोटोकॉल में शामिल होना भी अनिवार्य नहीं किया गया है.

समझौते के अनुच्छेद 7 में कहा गया है कि “दोनों पक्षों की लिखित सहमति” और “एनरिचमेंट पर एक संयुक्त स्टडी” पूरी होने के बाद सऊदी अरब, यूरेनियम एनरिंचमेंट कर सकता है. इसके मुताबिक, समझौता लागू होते ही यह दो साल की स्टडी शुरू हो जाएगी.

इसी अनुच्छेद के खंड 5 में एनरिचमेंट के लिए चरणबद्ध तरीका अपनाया गया है.

इसमें कहा गया है कि सऊदी अरब में कोई भी संवर्धन संयंत्र, जो अमेरिकी उपकरण या तकनीक का इस्तेमाल करता है, पहले चरण में यूरेनियम को अधिकतम 5 प्रतिशत तक ही संवर्धित (एनरिच) कर सकेगा.

सऊदी अरब को कई रियायतें

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

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एक अतिरिक्त अध्ययन पूरा होने और दोनों पक्षों की लिखित सहमति के बाद सऊदी अरब अपने संवर्धन का स्तर बढ़ा सकता है. लेकिन यह 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए.

ईरान को 5 प्रतिशत से ज़्यादा एनरिचमेंट ना करने देने की वकालत करने वाले विशेषज्ञ हमेशा यह तर्क देते रहे हैं कि 20 प्रतिशत एनरिचमेंट तक पहुंचने के बाद परमाणु बम की तकनीक हासिल करने की 90 प्रतिशत प्रक्रिया पूरी हो जाती है. इसके बाद के चरण संभावित रूप से तेज़ी से पूरे किए जा सकते हैं.

तो जिस आधार पर ईरान के यूरेनियम एनरिचमेंट का अमेरिका विरोध करता है उसी आधार पर सऊदी अरब को एनरिचमेंट करने की इजाज़त क्यों दी गई ये एक बड़ा सवाल है.

दूसरी ओर, यह समझौता सऊदी अरब को समझौते के तहत तय निरीक्षण स्वीकार करने के लिए बाध्य तो करता है, लेकिन उसके लिए एडिशनल प्रोटोकॉल में शामिल होना ज़रूरी नहीं होगा.

इस कार्यक्रम से जुड़े उपकरण, सामग्री या किसी भी तरह के पुर्ज़ों को भेजने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते को लागू करना ज़रूरी होगा. इससे इस मामले में अमेरिका की निगरानी व्यवस्था लागू होगी.

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SOURCE : BBC NEWS