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दिल्ली हाईकोर्ट जज ने जंतर-मंतर प्रदर्शन का विरोध कर कहा, दिल्ली बंधक नहीं बन सकती

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दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 7 अगस्त, 2026 को जंतर मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों को लेकर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि प्रदर्शनों के कारण दिल्ली शहर को “बंधक” नहीं बनाया जाना चाहिए। उनकी यह टिप्पणी All India Dalit Christian Rights Protection Committee के प्रस्तावित प्रदर्शन पर सुनवाई के दौरान आई। यह समिति Scheduled Castes Order, 1950 के तहत दलित ईसाइयों को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए अभियान चला रही है।

## शहर की सीमा के भीतर प्रदर्शन: न्यायाधीश की चिंता

अदालत में बोलते हुए न्यायमूर्ति महाजन ने कहा कि उनके विचार से प्रदर्शन “आदर्श रूप से जंतर मंतर या शहर के भीतर नहीं होने चाहिए।” उन्होंने बताया कि ऐसे आयोजनों से सड़कें अवरुद्ध हो सकती हैं, एंबुलेंस के आवागमन में देरी हो सकती है और निवासियों का रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा, “मेरे अनुसार ये चीजें (प्रदर्शन) शहर में नहीं होनी चाहिए, लेकिन अंततः यह सरकार का निर्णय है।”

न्यायाधीश ने हाल के संवेदनशील समय—विशेष रूप से स्वतंत्रता दिवस के निकट आने—और राजधानी में बढ़े हुए सुरक्षा अभियानों की ओर भी ध्यान दिलाया। इन परिस्थितियों ने प्रस्तावित स्थान पर प्रदर्शन होने की स्थिति में सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी संभावित चुनौतियों को लेकर उनकी चिंता को और स्पष्ट किया।

## मामले का विवरण: मांग और प्रक्रिया

सुनवाई में दलित ईसाइयों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले पंजीकृत कल्याणकारी संघ द्वारा दायर आवेदन पर विचार किया गया। संघ ने 10 अगस्त को जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण और स्थिर प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी। प्रस्तावित प्रदर्शन सीमित स्तर का था: इसमें लगभग 75 प्रतिभागी शामिल होने थे, कोई मार्च या जुलूस नहीं होना था, रात में ठहरने की योजना नहीं थी और सार्वजनिक सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जाना था।

संगठन का दावा था कि उसने 9 जुलाई को आवेदन दाखिल किया और इसके बाद कई बार संपर्क किया। हालांकि, 4 अगस्त को कथित तौर पर उसे मौखिक रूप से बताया गया कि अनुमति नहीं दी जाएगी। न तो कोई औपचारिक आदेश दिया गया और न ही किसी वैकल्पिक स्थान की जानकारी लिखित रूप में दी गई।

उनकी मुख्य मांग संवैधानिक संशोधन के माध्यम से दलित ईसाइयों को Scheduled Castes सूची में शामिल करना है—जिसके तहत 1950 के Order में संशोधन कर अनुसूचित दर्जे से मिलने वाली सुरक्षा का विस्तार किया जाना है।

## सरकार और कानूनी पक्ष की प्रतिक्रियाएं

सरकार की ओर से Additional Solicitor General Chetan Sharma ने बताया कि याचिकाकर्ता ने स्थानीय अधिकारियों से No Objection Certificate प्राप्त नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा कि Supreme Court फिलहाल इस सवाल पर विचार कर रहा है कि क्या जंतर मंतर को कानूनी प्रदर्शन स्थल के रूप में नामित किया जाना चाहिए।

Sharma ने सावधान किया कि भले ही अभी भीड़ सीमित हो, लेकिन यह बढ़ सकती है—उन्होंने कहा, “जब ये 75 (लोगों की संख्या) 75 हजार हो जाएंगे, तो हमें नहीं पता।” उन्होंने यह भी पुष्टि की कि Delhi Police उनके आवेदन पर विचार करेगी और अगले दिन तक अपना निर्णय बताएगी।

## अदालत का निर्णय: पुलिस के अधिकार क्षेत्र को प्राथमिकता

न्यायमूर्ति महाजन ने इस मामले पर सीधे कोई आदेश देने से परहेज किया। इसके बजाय उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए अनुमति देने या न देने का निर्णय Delhi Police को करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “शहर को बंधक मत बनाइए। पुलिस को निर्णय लेने दीजिए।”

इसके बाद अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया, जिससे अनुमति प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप प्रभावी रूप से समाप्त हो गया।

## इसका अर्थ और मुख्य निष्कर्ष

– **न्यायिक संकोच:** अदालत ने कहा कि जंतर मंतर जैसे केंद्रीय सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन व्यवधान पैदा करते हैं और इन्हें कहीं और आयोजित करना बेहतर होगा। आयोजन स्थल का चयन एक महत्वपूर्ण कारक है।
– **पुलिस का विवेकाधिकार:** अदालत ने प्रदर्शन की अनुमति सीधे न तो दी और न ही खारिज की, लेकिन आवेदन को मंजूरी देने या अस्वीकार करने का अधिकार Delhi Police के पास है।
– **स्थल का मुद्दा अनसुलझा:** याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया था कि यदि जंतर मंतर उपलब्ध नहीं हो, तो वैकल्पिक समय या स्थल पर विचार किया जा सकता है। इन विकल्पों की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
– **Supreme Court की निगरानी:** एक लंबित मामले में यह आकलन किया जा रहा है कि क्या जंतर मंतर को आधिकारिक रूप से प्रदर्शन स्थल के रूप में माने जाने से छूट दी जानी चाहिए। इसका राजधानी में सार्वजनिक सभाओं से जुड़े नियमों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

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