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भारत की ऊर्जा सुरक्षा का भविष्य क्रिटिकल मिनरल पर क्यों टिका है?

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Source :- BBC INDIA

दुनियाभर के देशों में क्रिटिकल मिनरल और रेयर अर्थ खनिज हासिल करने की दौड़ लगी है. स्मार्टफ़ोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों तक का निर्माण इन पर निर्भर करता है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर अहम बात कही.

‘रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ सत्र में बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि टेक्नोलॉजी और ज़रूरी खनिजों का हथियार की तरह इस्तेमाल दुनिया की साझा तरक्की में रुकावट डाल सकता है.

केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी 11 सितंबर को दिल्ली में ‘एडवांस्ड मैटेरियल्स, क्रिटिकल मिनरल्स और मेटल्स’ पर आयोजित तीसरे वैश्विक सम्मेलन के मंत्रीस्तरीय सत्र में भी कुछ ऐसा ही कहा था.

उन्होंने कहा था, ‘क्रिटिकल मिनरल्स भारत की ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं.’

नरेंद्र मोदी पिछले करीब डेढ़-दो सालों में कई मौकों पर क्रिटिकल मिनरल्स को भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सेमीकंडक्टर निर्माण और रणनीतिक स्वायत्तता से जोड़ चुके हैं.

सवाल उठता है कि क्या वैश्विक एनर्जी सिस्टम में बदलाव से भारत के सामने नई चुनौती खड़ी हो रही है? क्या जीवश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा भारत क्रिटिकल मिनरल्स पर अधिक निर्भर हो जाएगा?

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के 2026 के आउटलुक के मुताबिक, क्रिटिकल मिनरल्स की मांग लगातार तेज़ी से बढ़ रही है. आईईए के मुताबिक 2040 तक इन खनिजों की कुल मांग लगभग दोगुनी होने का अनुमान है.

इनमें लीथियम की मांग में विशेष रूप से तेज़ बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जबकि निकेल, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ्स की मांग भी काफी बढ़ने का अनुमान है.

क्या हैं क्रिटिकल मिनरल्स?

चुंबक

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क्रिटिकल मिनरल्स ऐसे खनिज हैं जो आधुनिक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा संक्रमण और रणनीतिक उद्योगों के लिए बेहद ज़रूरी हैं, लेकिन जिनकी उपलब्धता या आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों और कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर है.

इनमें लीथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और कॉपर जैसे खनिज शामिल हैं.

इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, सोलर पैनल, पवन टर्बाइन, बिजली के ग्रिड, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और कई उन्नत तकनीकों में होता है.

इसलिए इन खनिजों को केवल खनन से जुड़ा संसाधन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा का रणनीतिक आधार माना जा रहा है.

भारत के लिए इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि देश तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों की ओर बढ़ रहा है, जबकि कई महत्वपूर्ण खनिजों और उनसे जुड़े प्रसंस्करण तथा विनिर्माण में उसकी आयात पर निर्भरता बनी हुई है.

क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में कहां खड़ा है भारत?

भारत का क्रिटिकल मिनरल्स का बेस कमजोर नहीं है, लेकिन खनिज संसाधनों से लेकर खनन, प्रोसेसिंग और उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण तक पूरी वैल्यू चेन में वह अभी चीन से काफी पीछे है.

भारत के पास लीथियम, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स समेत कई महत्वपूर्ण खनिजों के संसाधन हैं और सरकार ने हाल के सालों में इनकी खोज और नीलामी को तेज किया है.

भारत सरकार ने माना है कि लीथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों के लिए भारत की आयात निर्भरता बहुत अधिक है.

इसके विपरीत, चीन केवल खनन में ही नहीं है, बल्कि प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है.

आईईए के मुताबिक चीन कई प्रमुख क्रिटिकल मिनरल्स की रिफाइनिंग में 70% से अधिक हिस्सेदारी रखता है और रेयर अर्थ्स तथा बैटरी-ग्रेड ग्रेफाइट की रिफाइनिंग में उसकी हिस्सेदारी 90% से ज्यादा है.

भारत के सामने चुनौती इसलिए सिर्फ अपने खनिज भंडार खोजने की नहीं, बल्कि खनन से लेकर प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, बैटरी, स्थायी चुंबक और दूसरे उच्च तकनीकी उत्पादों के निर्माण तक घरेलू वैल्यू चेन खड़ी करने की है.

इसी वजह से भारत ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन और रेयर-अर्थ कॉरिडोर जैसी पहलों पर जोर दिया है.

नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन क्या है?

रेयर अर्थ मैग्नेट

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भारत सरकार ने जनवरी 2025 में 16,300 करोड़ रुपये की निवेश योजना के साथ नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (एनसीएमएम) शुरू किया था, जिसमें केंद्र का बजट हिस्सा 2,600 करोड़ रुपये है. भारत सरकार का यह मिशन 2030-31 तक चलेगा.

भारत के इस महत्वाकांक्षी मिशन का मक़सद सिर्फ़ क्रिटिकल मिनरल्स की खोज और खनन करना नहीं है.

इस मिशन का मक़सद मिनरल्स की खोज, खनन, प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, रिसाइक्लिंग और विदेशों में खनिज परिसंपत्तियां हासिल करने तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है.

मिशन के तहत 2030-31 तक 1,200 रिसर्च परियोजनाएं और 100 क्रिटिकल मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी का लक्ष्य रखा गया है.

जून 2026 तक केंद्र सरकार कुल 56 क्रिटिकल और रणनीतिक खनिज ब्लॉक्स की सफल नीलामी कर चुकी थी. मिशन के तहत घरेलू रिसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना भी शुरू की गई है, जिसके तहत अप्रैल 2026 तक 58 कंपनियां पात्र पाई गई थीं और उन्होंने करीब 8.5 लाख टन सालाना रिसाइक्लिंग क्षमता का प्रस्ताव दिया था.

सरकार का लक्ष्य इन पहलों के जरिए आयात पर निर्भरता घटाना और उन खनिजों की घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना है जो इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और दूसरी रणनीतिक तकनीकों के लिए ज़रूरी हैं.

भारत के पास मौक़े और चुनौतियां

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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उद्योग के नज़रिए से भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्रिटिकल मिनरल्स के संसाधनों की उपलब्धता से ज़्यादा उनकी आपूर्ति और प्रोसेसिंग पर निर्भरता है.

भारत की शीर्ष रेयर अर्थ रिसाइक्लिंग कंपनियों में शामिल अटेरो के सीईओ एवं सह-संस्थापक नितिन गुप्ता के मुताबिक, कॉपर, एल्युमिनियम, लीथियम कार्बोनेट और कोबाल्ट जैसे कई महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में भारत आयात पर निर्भर है, जबकि वैश्विक सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है.

नितिन गुप्ता का कहना है कि क्रिटिकल मिनरल्स को केवल औद्योगिक कच्चे माल के तौर पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इनका इस्तेमाल भू-राजनीतिक हथियार और आर्थिक युद्ध के औजार के रूप में भी किया जा सकता है.

गुप्ता के मुताबिक, भारत के लिए एक बड़ा अवसर रिसाइक्लिंग में है.

नितिन गुप्ता कहते हैं, “पर्याप्त रिसाइक्लिंग और रिफाइनिंग क्षमता विकसित की जाए तो खनिज के प्रकार के आधार पर देश अपनी 20 से 80 फीसदी ज़रूरतें रिसाइक्लिंग के जरिए पूरी कर सकता है.”

नितिन गुप्ता मानते हैं कि इससे भारत केवल आत्मनिर्भरता हासिल करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीन-प्लस-वन रणनीति के तहत वैश्विक क्रिटिकल-मिनरल सप्लाई चेन में एक बड़े निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है.

वे कहते हैं, “सरकार नीति बनाने के स्तर पर बेहतर काम कर रही है लेकिन असली चुनौती इन नीतियों के ज़मीनी स्तर पर कार्यान्यवन को लेकर है. जब तक नीतियों को ज़मीन पर नहीं उतारा जाता तब तक इनके लक्षित प्रभाव हासिल नहीं होंगे.”

रेयर अर्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. दीपेंद्र सिंह मानते हैं कि भारत को इको सिस्टम विकसित करने पर ज़ोर देना चाहिए

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रेयर अर्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष और आईआरईएल (इंडिया) के पूर्व सीएमडी डॉ. दीपेंद्र सिंह कहते हैं कि क्रिटिकल मिनरल्स भारत के लिए दो स्तरों पर निर्णायक हैं, पहला 2070 तक नेट जीरो के लक्ष्य और ग्रीन इनर्जी ट्रांसमिशन के लिए और दूसरा, विकसित भारत के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता हासिल करने के लिए.

डॉ. दीपेंद्र सिहं कहते हैं कि खनिज निकालना इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत भर है.

वे कहते हैं, “भारत को खनिज निकालने के बाद प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और उनसे जुड़े उत्पादों का निर्माण करने वाली पूरी मिड-स्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम क्षमता विकसित करनी होगी.”

चीन बड़ी चुनौती

कंप्यूटर चिप

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क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ मेटेरियल के क्षेत्र में आज चीन का दबदबा है.

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार, 2024 में चीन दुनिया के 44 क्रिटिकल मिनरल्स में से 30 का सबसे बड़ा उत्पादक था.

रेयर अर्थ्स में चीन की हिस्सेदारी खनन में करीब 71% थी, जबकि रेयर अर्थ्स की प्रोसेसिंग में उसकी हिस्सेदारी 87% तक पहुंच गई.

चीन ने 1980 के दशक में ही क्रिटिकल मिनरल और रेयर अर्थ से जुड़ा इकोसिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना शुरू कर दिया था.

डॉ. दीपेंद्र सिंह कहते हैं, “चीन ने 1979-80 के दौर से ही इस क्षेत्र को एक समग्र इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया और खनन से लेकर रोबोटिक्स और सीएनसी मशीनों तक पूरी औद्योगिक श्रृंखला पर काम किया.”

इस इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भारत के लिए चुनौती अब इस परिपक्व तकनीकी इकोसिस्टम का मुकाबला करने की है.

डॉ. दीपेंद्र सिंह कहते हैं, “हमें यह स्वीकार करना होगा कि चीन इस दिशा में हमसे कुछ दशक आगे है, चीन ने जो इको सिस्टम विकसित कर लिया है, हमें अभी वह इको सिस्टम विकसित करना है.”

अटेरो के संस्थापक नितिन गुप्ता कहते हैं कि भारत को आत्मनिर्भर बनने से आगे बढ़कर वैश्विक सप्लायर बनने की दिशा में क़दम उठाने होंगे

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वहीं अटेरो के संस्थापक नितिन गुप्ता कहते हैं, “कॉपर, एल्युमिनियम, लीथियम कार्बोनेट हो या कोबाल्ट, भारत इन सभी क्रिटिकल मिनरल का आयात करता है. आश्चर्यजनक बात यह है कि चीन कई क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में 70 से 99 फ़ीसदी तक की हिस्सेदारी रखता है.”

नितिन गुप्ता कहते हैं कि चीन का कई क्रिटिकल मिनरल पर दबदबा होने की वजह से भारत के सामने मुश्किल स्थिति आ सकती है.

वे कहते हैं, “भारत के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि क्रिटिकल मिनरल का एक्सेस बना रहे. ऐसा ना हो कि हम किसी जिओपॉलिटिकल सिचुएशन में फंस जाए और हमारे पास एक्सेस ही ना हो. जैसा पिछले मई में हुआ था जब चीन ने रेयर अर्थ मैगनेट्स की सप्लाई रोक दी थी. उसकी वजह से इंडिया के ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और बाकी इंडस्ट्रीज के पास मैगनेट्स ही नहीं थे. इन क्रिटिकल मिनरल्स का जिओ पॉलिटिकल टूल की तरह इस्तेमाल हो सकता है, ऐसे में भारत को इस दिशा में आत्मनिर्भर होेने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.”

डॉ. सिंह कहते हैं, “सरकार की नीतियां सही दिशा में हैं, लेकिन इनके परिणाम आने में समय लगेगा.”

वे कहते हैं, “भारत को दूसरे देशों के मॉडल की नकल करने के बजाय अपने संसाधनों, बाजार और औद्योगिक क्षमता के अनुरूप अपना मॉडल विकसित करना होगा.”

स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्रियल केपेबिलिटी

नितिन गुप्ता का बयान

इंडस्ट्री एक्सपर्ट के मुताबिक़, इस समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती मिनरल खोजने की नहीं है बल्कि उसे स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्रियल केपेबिलिटी में बदलने की है.

भारत के पास लीथियम, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे संसाधन हैं, लेकिन खनन के बाद प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और उच्च-मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण की क्षमता अभी सीमित है. यही वह क्षेत्र है जहां चीन भारत से काफी आगे है

चीन के पास जो इकोसिस्टम है उसे बनाने में चार दशक लगे हैं. भारत के पास अब पॉलीसी फ्रेमवर्क और बाज़ार में मौक़े हैं लेकिन विशेषज्ञ मान रहे हैं कि रिफ़ायनिंग, उत्पादन और रिसायक्लिंग तक की एक पूरी वैल्यू चेन भारत को खड़ी करनी होगी जिसके लिए निवेश, तकनीक और समय की ज़रूरत होगी.

डॉक्टर दीपेंद्र सिंह मानते हैं कि एक इको सिस्टम का अभाव भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

वे कहते हैं, “क्रिटिकल मिनरल का खनन तो यात्रा की शुरुआत है, इसके बाद मिड-स्ट्रीम स्टेजेस आती हैं, इसमें प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और प्रोडक्ट निर्माण शामिल है, जब तक पूरा इकोसिस्टम सही तरीके से प्लान न हो और आपूर्ति के साथ-साथ डिमांड साइड पर भी समान प्रयास न हों, तब तक सिर्फ़ क्रिटिकल मिनरल्स होने से विकसित देश बनने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता.”

देवेंद्र सिंह मानते हैं को भारत को इस दिशा में धैर्य से काम करना होगा. वे कहते हैं, “यदि हमसे कोई आगे है तो हम ओवरनाइट तो उसको नहीं कवर कर पाएंगे, हमें थोड़ा टाइम देना पड़ेगा. हमें कहीं और का मॉडल पूरी तरह लगाने के बजाय अपना मॉडल खुद डेवलप करना पड़ेगा और उसके लिए पेशेंस (धैर्य) और समय देने की ज़रूरत है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS