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ईरान पर हमले की अमेरिका ने अब तक क्या ‘क़ीमत’ चुकाई है? इस रिपोर्ट से चला पता

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अमेरिका मिसाइल डिफेंस सिस्टम

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अमेरिका के रक्षा विभाग पेंटागन के लीड इंस्पेक्टर जनरल की ईरान युद्ध को लेकर पहली रिपोर्ट सोमवार को सार्वजनिक की गई है.

इस रिपोर्ट से ईरान के साथ युद्ध (ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी) के दौरान मध्य पूर्व में अमेरिकी विमानों, सैन्य अड्डों, कूटनीतिक ठिकानों और हथियारों को हुए नुक़सान का आधिकारिक ब्यौरा पहली बार सार्वजनिक हुआ है.

अमेरिकी युद्ध विभाग के लीड इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक़, 29 जून 2026 तक इस अभियान पर अमेरिका क़रीब 33.4 अरब डॉलर ख़र्च कर चुका था.

इस ख़र्च में ईरान पर हमलों के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों की क़ीमत, सैन्य अभियानों पर हुआ अतिरिक्त ख़र्च और नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए सैन्य उपकरण शामिल हैं.

अमेरिका ने 22.3 अरब डॉलर इस्तेमाल किए गए हथियारों, 7.4 अरब डॉलर अतिरिक्त सैन्य अभियानों और 3.7 अरब डॉलर क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए सैन्य उपकरणों को बदलने पर ख़र्च किए.

हालांकि, बुनियादी ढांचे को हुए नुक़सान की मरम्मत का ख़र्च इस अनुमान में शामिल नहीं है.

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बारे में अधिकतर जानकारियां पहले ही रिपोर्ट की जा चुकी हैं, लेकिन पेंटागन के महानिरीक्षक की यह रिपोर्ट जून 2026 तक हुए ख़र्च का पहला सार्वजनिक आधिकारिक ब्यौरा है.

स्ट्रेटेजिक हथियारों पर दबाव

अमेरिकी गोला बारूद

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिका के स्ट्रेटेजिक हथियार भंडारण पर दबाव डाला है और अति उन्नत हथियारों की आपूर्ति औद्योगिक स्तर पर प्रभावित हुई है.

हालांकि, अमेरिकी सेना पर नज़र रखने वाले विश्लेषक इस रिपोर्ट के सामने आने से पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिकी हथियार कंपनियों को सेना के भंडार को फिर से भरने में तीन साल तक का समय लग सकता है.

अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने माना है कि बड़े पैमाने पर गोला-बारूद के इस्तेमाल से कुछ महत्वपूर्ण हथियारों के रणनीतिक भंडार में कमी आई है.

सरकार ने उत्पादन बढ़ाने, मौजूदा उत्पादन लाइनों की क्षमता बढ़ाने और सहयोगी देशों के साथ मिलकर अमेरिकी भंडार पर पड़े दबाव को कम करने की कोशिश शुरू की है.

लेकिन अमेरिकी रक्षा उद्योग के सामने उत्पादन क्षमता बढ़ाने की चुनौती आसान नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, सॉलिड रॉकेट मोटर्स जैसे महत्वपूर्ण घटकों की उत्पादन क्षमता और दूसरी सप्लाई चेन में बाधाएं बनी हुई हैं. रक्षा उद्योग की क्षमता बढ़ाने में ‘अहम समय’ लग सकता है.

यही वजह है कि अमेरिका ने इस सैन्य अभियान के दौरान जो 22.7 अरब डॉलर का गोला-बारूद इस्तेमाल किया है, वह केवल युद्ध के दौरान ख़र्च हुई रक़म नहीं है.

इससे भविष्य में अमेरिकी हथियार भंडार को फिर से भरने की चुनौती के संकेत भी मिलते हैं.

लेकिन पेंटागन हमेशा से ही हथियारों की कमी से जुड़ी रिपोर्टों को ख़ारिज करता रहा है और कहता रहा है कि अमेरिकी सेना के पास किसी भी तरह के युद्ध को लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में हथियार हैं.

ट्रंप ने कहा सब ठीक है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप

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इसी बीच, सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “अमेरिका अपने इतिहास में किसी भी समय से अधिक उत्कृष्ट और अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन कर रहा है.”

ट्रंप ने लिखा, “मध्य पूर्व और उससे आगे तैनात हमारे सैन्य बलों को रोज़ाना ये हथियार पहुंचाए जा रहे हैं.”

अमेरिकी रक्षा विभाग की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़, यह अभियान 28 फ़रवरी 2026 को शुरू हुआ था और इसका घोषित उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता, मिसाइल उत्पादन, नौसेना और सुरक्षा ढांचे को कमज़ोर करना था.

अमेरिका का यह सैन्य अभियान केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं था. इसमें वायु, समुद्र, ज़मीन, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं का इस्तेमाल किया गया.

अमेरिका ने क्षेत्र में पहले से मौजूद सैन्य ढांचे का विस्तार किया और बड़ी संख्या में लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज़, एयर डिफ़ेंस सिस्टम और लॉजिस्टिक संसाधन इस युद्ध के दौरान तैनात किए.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इस अभियान का अमेरिका के हथियारों के भंडार पर भी भारी दबाव पड़ा है और यह इस सैन्य अभियान से पैदा हुई सबसे गंभीर दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है.

अमेरिकी सैनिकों और उपकरणों का नुक़सान

अमेरिका के कई लड़ाकू विमान भी ईरान युद्ध के दौरान नष्ट हुए हैं.

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इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 28 फरवरी से 30 जून के बीच सात अमेरिकी सैनिक युद्ध में मारे गए और सात अन्य की युद्ध से अलग घटनाओं में मौत हुई. इसी दौरान 417 अमेरिकी सैनिक घायल हुए.

रिपोर्ट में अमेरिकी सैन्य विमानों और अन्य उपकरणों को हुए नुक़सान का भी ज़िक्र है.

अमेरिका के चार एफ़-15ई विमान नष्ट हुए. एक एफ़-35ए को ईरान के ऊपर नुक़सान पहुंचा. कई केसी-135 रिफ्यूलिंग विमान, ए-10, ई-3 अवॉक्स और हेलीकॉप्टर भी क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए.

रिपोर्ट में अलग-अलग घटनाओं में बड़ी संख्या में एमक्यू-9 रीपर ड्रोन के नुक़सान का भी उल्लेख है. यह अमेरिका के सबसे उन्नत सैन्य ड्रोन में से एक है और काफ़ी महंगा भी है.

ईरान ने ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों से बहरीन में अमेरिकी नौसेना के अड्डे, क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के लॉजिस्टिक हब को निशाना बनाया.

कार्यवाहक नौसेना सचिव हंग काओ ने पिछले सप्ताह द एपोक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि “उन्होंने बहरीन को बुरी तरह तबाह कर दिया है.”

काओ ने कहा कि एक टास्क फोर्स यह जांच रही है कि क्या क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बलों की मौजूदगी बनाए रखने के लिए बहरीन स्थित अड्डे की मरम्मत की ज़रूरत होगी.

विमानों और हथियारों को हुए इन नुक़सानों की कुल अनुमानित लागत 3.7 अरब डॉलर आंकी गई है. यह आंकड़ा 33.4 अरब डॉलर के कुल अभियान ख़र्च में शामिल है.

अमेरिकी दूतावासों को भी नुक़सान

अमेरिका ईरान युद्ध

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इस रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरानी हमलों का असर अमेरिकी राजनयिक मिशनों पर भी पड़ा और इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में अमेरिकी राजनयिक परिसरों को नुक़सान पहुंचा.

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुमान के मुताबिक़, इससे क़रीब 184 मिलियन डॉलर का नुक़सान अमेरिका को हुआ है.

इराक़ में हुआ नुक़सान 157.35 मिलियन डॉलर, कुवैत में 14.75 मिलियन डॉलर, सऊदी अरब में 11.5 मिलियन डॉलर और यूएई में क़रीब 125,000 डॉलर आंका गया है.

फ़रवरी से जून के बीच क़रीब 3,500 अमेरिकी राजनयिक कर्मचारी या तो अधिकारिक रूप से बाहर भेजे गए, आदेश के तहत हटाए गए या पहले से देश से बाहर थे.

कई अमेरिकी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों को सेवाएं सीमित करनी पड़ीं.

क़रीब 9,000 अमेरिकी नागरिकों को निकालना पड़ा

युद्ध के दौरान अमेरिकी विदेश विभाग ने मध्य पूर्व और आसपास के देशों से क़रीब 9,000 अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था की.

इसके लिए 56 चार्टर्ड उड़ानों के अलावा बसों का भी इस्तेमाल किया गया.

इस अभियान पर क़रीब 11.6 मिलियन डॉलर ख़र्च हुए. इसराइल से क़रीब 6,500, यूएई से 1,200 और क़तर से क़रीब 850 अमेरिकी नागरिकों को निकाला गया.

विदेश विभाग ने 2 जून तक ईरान संघर्ष से संबंधित 113 मिलियन डॉलर के खर्च की जानकारी दी थी. इसमें 79.2 मिलियन डॉलर नागरिकों को निकालने और अन्य आपात गतिविधियों पर ख़र्च हुए.

क़रीब 36 हज़ार कॉम्बैट सॉर्टीज़

अप्रैल 2026 में ली गई तस्वीर में अमेरिकी वायुसेना का F-35 लाइटनिंग II लड़ाकू विमान

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अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक़, 28 फरवरी से 7 अप्रैल के बीच इस बड़े सैन्य अभियानों के दौरान अमेरिकी सेनाओं ने ईरान में क़रीब 13,500 टार्गेट पर हमला किया.

इस दौरान अमेरिका लड़ाकू विमानों ने क़रीब 36,000 कॉम्बैट सॉर्टीज़ (लड़ाकू उड़ानें) और 1,800 से ज़्यादा फ़ायर मिशन किए.

निशाने पर ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल ठिकाने, एयर डिफेंस सिस्टम, क्रूज़ मिसाइल और ड्रोन के भंडार, कमांड सेंटर, नौसैनिक और माइनिंग क्षमताएं तथा रक्षा उद्योग से जुड़े ठिकाने थे.

ईरान की तटीय रक्षा और नौसैनिक क्षमताओं को भी निशाना बनाया गया, खासकर उन ठिकानों को जो हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों के लिए ख़तरा माने गए.

अमेरिकी साइबर और स्पेस कमांड ने भी अभियान में भूमिका निभाई.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं का इस्तेमाल ईरान के संचार और सेंसर नेटवर्क को बाधित करने तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और जैमिंग गतिविधियों की निगरानी के लिए किया गया.

होर्मुज़ बना अहम मोर्चा

अमेरिकी मिसाइल

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हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य इस सैन्य संघर्ष का केंद्र बन गया था. रिपोर्ट में हॉर्मुज़ के इर्द-गिर्द हुई अमेरिकी कार्रवाइयों का भी ब्यौरा है.

7 अप्रैल 2026 को अमेरिका ने ईरान के साथ युद्धविराम का एलान किया, लेकिन अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और समुद्री अभियान जारी रहे.

12 अप्रैल को अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले समुद्री यातायात की नाकेबंदी का एलान किया, जो 13 अप्रैल से लागू हुई.

13 अप्रैल से 18 जून के बीच अमेरिकी सेनाओं ने 140 से ज़्यादा जहाज़ों का रास्ता बदला, जिन्हें वह नाकेबंदी का पालन करने वाला मानती थीं.

अमेरिका ने 10 ऐसे जहाज़ों को सैन्य कार्रवाई के ज़रिए निष्क्रिय किया जो उसके नियमों का उल्लंघन कर रहे थे.

वहीं मानवीय सहायता से जुड़े 50 से ज़्यादा वाणिज्यिक जहाज़ों को गुज़रने की अनुमति दी गई.

4 मई को तीन अमेरिकी विध्वंसक जहाज़ों ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पार किया.

इसे ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ का हिस्सा बताया गया, जिसका उद्देश्य वाणिज्यिक जहाज़ों की आवाजाही की सुरक्षा करना था.

अमेरिकी जंगी जहाज़

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17 जून को अमेरिका और ईरान ने पाकिस्तान की मध्यस्थता में ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ पर हस्ताक्षर किए.

इसमें हॉर्मुज़ में वाणिज्यिक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही और अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की बातचीत का प्रस्ताव था.

18 जून को अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी ख़त्म कर दी. हालांकि जून के अंत तक बातचीत में तनाव फिर बढ़ने लगा.

25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले एक मालवाहक जहाज़ पर हमला किया, जिसके बाद अमेरिका ने जवाबी हमले किए.

रिपोर्ट के अनुसार, 7 जुलाई को हॉर्मुज़ में तीन और जहाज़ों पर ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने बड़े जवाबी हमले किए और 8 जुलाई को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौता ख़त्म करने की घोषणा कर दी.

इसके बाद अमेरिकी सेनाओं ने ईरान के ख़िलाफ़ फिर से रोज़ाना हवाई हमले फिर शुरू किए.

50 हज़ार से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात

एक जहाज दक्षिणी ईरान के पोर्ट सिटी बंदर अब्बास के तट (होर्मुज स्ट्रेट) से गुज़रता हुआ

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ऑपरेशन के दौरान 50 हज़ार से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक अमेरिकी सेंट्रल कमांड के क्षेत्र में तैनात किए गए.

अमेरिकी सेनाओं को अलग-अलग ठिकानों पर फैलाया गया, ताकि ईरानी हमलों की स्थिति में नुक़सान कम किया जा सके.

अभियान के चरम समय अमेरिका के पास एक दर्जन से ज़्यादा लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन, विध्वंसक जहाज़ और एयर डिफेंस बैटरियां थीं.

थॉड (टीएचएएडी) मिसाइल डिफेंस सिस्टम, हिमार्स (एचआईएमएआरएस) और 82वीं एयरबोर्न डिविज़न के कुछ हिस्से भी तैनात किए गए.

अमेरिका के इस पूरे अभियान के दौरान समंदर में दो कैरियर स्ट्राइक ग्रुप लगातार गश्त पर रहे और किसी भी स्थिति के लिए हर समय तैयार रहे.

रिपोर्ट के मुताबिक़, इस अभियान की लॉजिस्टिक्स का पैमाना भी बड़ा था. अमेरिकी ट्रांसपोर्टेशन कमांड ने 1,500 से ज़्यादा एयर मिशन किए और अभियान के दौरान कुछ समय में रोज़ाना 30 से 40 उड़ानें सीधे सेंट्रल कमांड क्षेत्र में भेजी गईं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS