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मोहम्मद अली जौहर कौन थे जिनके नाम पर आज़म ख़ान ने रखा यूनिवर्सिटी का नाम

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Source :- BBC INDIA

मोहम्मद अली जौहर

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उत्तर प्रदेश के रामपुर में बनी मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने है.

दरअसल, समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने यह यूनिवर्सिटी बनवाई थी. इसकी बुनियाद समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने रखी थी.

प‍िछले द‍िनों, रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) ने इस यूनिवर्सिटी में बनी 40 इमारतों में से 38 को गिराने का आदेश दिया था.

प्राधिकरण के इस आदेश के ख़िलाफ़ यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपील की है. दूसरी तरफ़, समाजवादी पार्टी के नेता रामपुर पहुँच कर आरडीए के आदेश का विरोध कर रहे हैं.

हालाँकि, मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर ने फ़िलहाल आरडीए के इस आदेश पर रोक लगा दी है.

इस यूनिवर्सिटी का नाम प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है. उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में कई आंदोलनों की शुरुआत की थी.

मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को गिराने का आदेश विवाद के बाद वापस ले लिया गया

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कौन थे मोहम्मद अली जौहर

इस दौर में मोहम्मद अली जौहर के बारे में जानने वाले कम ही हैं क्योंकि भारत की आज़ादी के बाद उनके परिवार के ज़्यादातर लोग पाकिस्तान चले गए थे.

मोहम्मद अली जौहर ब्रिटिश हुकूमत के अधीन अविभाजित भारत में प्रमुख राजनीतिक हस्ती रहे हैं. वह मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों के अध्यक्ष रहे थे.

मोहम्मद अली जौहर का जन्म 1878 में भारत के रामपुर में हुआ था.

समाजवादी पार्टी के रामपुर में नेता और आज़म ख़ान के करीबी मोहम्मद आसिम राजा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्‍दी से कहा, “मोहम्मद अली जौहर की पैदाइश रामपुर की है. आज़ादी की तहरीक (मुहिम) उन्होंने चलाई. कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं और एक महान शिक्षाविद् भी थे. इसलिए उनके नाम से यूनिवर्सिटी का नाम रखा गया है.”

रईस अहमद जाफ़री की उर्दू में लिखी जीवनी सीरत-ए-मोहम्मद अली जौहर में उनके बारे में लिखा है, “वे पठानों के एक अमीर और पढ़े-लिखे परिवार से थे और रोहिल्ला जनजाति के यूसुफ़ज़ई क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे.”

रईस अहमद जाफ़री की किताब के मुताबिक़, “वे शौकत अली और ज़ुल्फ़िकार अली के साथ मशहूर ‘अली बंधुओं’ में से एक थे.”

मोहम्मद अली जौहर, मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों के अध्यक्ष रहे थे (फ़ाइल फ़ोटो)

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मोहम्मद अली जौहर ने छोटी उम्र में ही पिता को खो दिया था. उनकी माँ अबादी बानो बेगम की कोशिशों से उनको अच्छी शिक्षा मिल सकी. उनकी माँ ‘बी अम्‍मा’ के नाम से मशहूर थीं.

रईस अहमद जाफ़री की किताब के मुताबिक़, “मोहम्मद अली जौहर की मां का आज़ादी के आंदोलन में योगदान रहा है. बी अम्मा पढ़ाई के प्रति काफ़ी सजग थी, इसलिए उन्होंने अपने बेटों को बेहतर पढ़ाई के लिए बाहर भेजा.”

किताब सीरत-ए-मोहम्मद अली जौहर के मुताबिक़, “उनकी माँ ने अपनी लगभग सारी ज़मीन-ज़ायदाद गिरवी रख दी और उन्हें अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज में पढ़ने भेजा. दोनों अली बंधुओं ने इसी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया.”

मोहम्मद अली ने साल 1898 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की बीए परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया.

मोहम्मद अली आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफ़ोर्ड के लिंकन कॉलेज गए. वहाँ उन्होंने मॉडर्न हिस्ट्री में ऑनर्स की डिग्री हासिल की.

रईस अहमद जाफ़री की किताब में बताया गया है कि “भारत लौटने के बाद उन्होंने रामपुर रियासत में शिक्षा निदेशक का पद संभाला और बाद में बड़ौदा में काम किया.”

लेखक और पत्रकार

मोहम्मद अली ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (जिसे तब मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) के विस्तार के लिए कड़ी मेहनत की

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उत्तर प्रदेश सूचना विभाग से रिटायर वज़ाहत रिज़वी मासिक पत्रिका नया दौर के संपादक भी रहे हैं. वज़ाहत रिज़वी बताते हैं कि मोहम्मद अली जौहर एक बेहतरीन लेखक और वक्ता थे.

उन्होंने द टाइम्स, द ऑब्ज़र्वर और द मैनचेस्टर गार्डियन जैसे कई प्रमुख अंग्रेज़ी और भारतीय अख़बारों में अंग्रेज़ी और उर्दू दोनों भाषाओं में लेख लिखे.

रिज़वी के मुताबिक़, वे कई तरह की प्रतिभा के धनी थे और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ किए गए प्रयासों में अहम भूमिका निभाई.

रिज़वी ने बताया, “भारत की आज़ादी के मक़सद के लिए उनका अटूट संकल्प, जोश और अपने सबसे प्यारे लक्ष्य को पाने के लिए उनकी लगन ने उन्हें अपने देशवासियों का सम्मान और प्यार दिलाया.”

उन्होंने 14 जनवरी, 1911 को कलकत्ता से अंग्रेज़ी में अपना मशहूर साप्ताहिक अख़बार द कॉमरेड शुरू किया. इसे एक ही व्यक्ति लिखता और एडिट करता था. यह महँगे कागज़ पर छपता था.

द कॉमरेड कम वक़्त में ही तेज़ी से लोकप्रिय हो गया था.

बीस महीने बाद यह अख़बार ब्रिटिश इंडिया की तत्कालीन नई राजधानी दिल्ली आ गया. बाद में 1913 में उन्होंने उर्दू भाषा का दैनिक अख़बार हमदर्द भी निकालना शुरू किया.

हालांकि, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के शाफ़े किदवई ने जौहर पर ‘नया दौर’ के व‍िशेष संस्‍करण में लिखा है, “जौहर को अंग्रेज़ी पत्रकारिता में जो प्रमुखता मिली, वह उर्दू में नहीं मिल सकी. वे ख़बरों में पक्षपात के विरोधी थे.”

वह आगे लिखते हैं कि हमदर्द के जुलाई 1926 के अंक में जौहर ने लिखा, “देश के पत्रकार तय कर लें कि ऐसी ख़बर नहीं लिखेंगे तो देश की फ़िज़ा बदलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा.”

वज़ाहत रिज़वी के मुताबिक़, यह वह दौर था जब देश हिंदू-मुस्लिम तनाव से ग़ुज़र रहा था.

हालाँकि, बाद में ब्रिटिश हुकुमत ने इन अख़बारों को बंद करा दिया था.

मोहम्मद अली ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (जिसे तब मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) के विस्तार के लिए कड़ी मेहनत की.

साल 1920 में अलीगढ़ में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना करने वालों में वे भी एक थे. इसे बाद में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया.

जौहर का राजनीतिक सफ़र

मोती लाल नेहरू

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मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उनके बारे में जानकारी साझा की गई है.

वेबसाइट के मुताबिक़, “मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने साल 1906 में मुस्लिम लीग के सदस्य के तौर पर अपना राजनीतिक सफ़र शुरू किया था. साल 1917 में जब वे नज़रबंद थे, तब उन्हें सर्वसम्मति से मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया. वे साल 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और 1923 में इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने.”

हालाँकि, कांग्रेस के आधिकारिक वेबसाइट पर जौहर का नाम नहीं है. इसकी एक वजह यह हो सकती है कि अध्यक्ष बनने के कुछ समय बाद ही वे कांग्रेस से अलग हो गए थे. इसके बाद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को अध्यक्ष बनाया गया था.

रामपुर में रह रहे और जौहर के रिश्तेदार ज़हीर अली सिद्दीकी ने मोहम्मद अली जौहर पर किताब लिखी है. इसका नाम है, ‘उर्दू अदब में जौहर के ख़िदमात-तनक़ीदी जायज़ा’.

सिद्दीकी ने जौहर पर पीएचडी की है. उन्होंने बीबीसी हिन्‍दी से कहा, “वह काकीनाडा अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे.”

उन्होंने साल 1919 में इंग्‍लैंड गए एक मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था. इसका मक़सद ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिए मनाना था कि वह तुर्की के मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क पर असर डालें ताकि वे तुर्की के सुल्तान (जो इस्लाम के ख़लीफ़ा थे) को पद से न हटाएँ.

बता दें कि अतातुर्क एक तुर्की राष्ट्रवादी नेता और तुर्की गणराज्य के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति थे.

ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी माँगें ठुकराए जाने के बाद ‘ख़‍िलाफ़त समिति’ बनी. इसने पूरे भारत में मुसलमानों से सरकार का विरोध और बहिष्कार करने को कहा.

रईस अहमद जाफ़री की किताब के मुताबिक़, “1921 में मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने शौकत अली, हक़ीम अजमल ख़ान, मुख्‍़तार अहमद अंसारी जैसे नेताओं और महात्मा गांधी के साथ मिलकर एक बड़ा गठबंधन बनाया.”

वज़ाहत रिज़वी ने बीबीसी हिन्‍दी से कहा, “बापू ने कहा था कि ख़िलाफ़त तहरीक़ न होती तो हिन्‍दुस्तान को आज़ादी न मिलती.”

उनकी पौत्री अज़ीज़ फातिमा पाकिस्तान के अख़बार डॉन में उनके बारे में लिखते हुए कहती हैं. “जौहर ने कहा कि जहाँ तक अल्‍लाह की बात है, वह मुस्लिम पहले हैं और आख़िरी में भी मुस्लिम हैं. इसके आगे उन्होंने यह भी कहा था कि जहाँ तक भारत की बात है तो वह पहले भारतीय हैं, इसके बाद भी भारतीय हैं और आख़‍िरी में भी कुछ और नहीं बल्कि भारतीय ही हैं.”

ख़‍िलाफ़त सम्मेलन की एक बैठक में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और दो साल की जेल की सज़ा सुनाई.

रईस अहमद जाफ़री की किताब के मुताबिक़, “अगस्त 1928 में नेहरू रिपोर्ट के प्रकाशन ने हिंदू-मुस्लिम एकता की रही-सही उम्मीद भी ख़त्म कर दी.

मोहम्मद अली जौहर ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर एक ऐसी बैठक में बाधा डाली जो नेहरू रिपोर्ट के पक्ष में थी.

“मोहम्मद अली जौहर ने मोतीलाल नेहरू पर ‘असहयोग आंदोलन को ख़त्म करने’ का आरोप लगाया और नेहरू रिपोर्ट का समर्थन करने के लिए गांधी की आलोचना की.”

दरअसल, मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने यह रिपोर्ट तैयार की थी. इसकी रिपोर्ट को 1928 में पेश किया गया था.

इस समिति की मुख्य सिफ़रिशों में, “भारत के लिए डोमिनियन स्टेट्स (औपनिवेशिक स्वराज्य) की मांग की गई, नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव रखा गया. धार्मिक निर्वाचन को हटाकर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था की मांग की गई. केंद्र में मजबूत सरकार और संघीय शासन प्रणाली का सुझाव था. भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन की बात कही गई.”

मोहम्मद अली जौहर ने मुसलमानों के लिए अलग चुनाव क्षेत्रों की बात को नेहरू रिपोर्ट में खारिज किए जाने का विरोध किया और मोहम्मद अली जिन्ना और लीग के चौदह सूत्रीय प्रस्तावों का समर्थन किया.

साल 1930 में ख़राब सेहत के बावजूद उन्होंने गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लिया था.

रईस अहमद जाफ़री की किताब सीरत-ए-मोहम्मद अली जौहर में लिखा है कि लंदन में उन्होंने अपना मशहूर बयान दिया, “या तो मुझे आज़ादी दो या मेरी कब्र के लिए दो गज़ ज़मीन दो. मैं ग़ुलाम देश में वापस नहीं जाना चाहता.”

4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका निधन हो गया. उनके पार्थिव शरीर को यरुशलम के मस्जिद अक़्सा बैतुल-मुक़द्दस ले जाया गया और 23 जनवरी 1931 को वहाँ दफ़नाया गया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS