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ईरान में सत्ता के आस-पास हमेशा ऐसे लोगों की मौजूदगी रही है, जिन्हें ‘अंदरूनी हलकों के लिए परेशानी पैदा करने वाले तत्व’ कहा जा सकता है.
ये लोग न तो किसी सरकारी पद पर होते हैं और न ही उनकी कोई आधिकारिक हैसियत होती है. लेकिन सत्ता के केंद्र से उनकी नज़दीकी इतनी होती है कि उनकी बातों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं होता.
पारिवारिक संबंध, धार्मिक हैसियत या किसी अपेक्षाकृत छोटे संगठन से जुड़ाव ऐसे लोगों को यह मौका देता है कि वे पर्दे के पीछे होने वाले फ़ैसलों की जानकारी सामने लाएं. वे बड़े सरकारी अधिकारियों पर आरोप लगा सकते हैं या उन्हें धमकी दे सकते हैं.
वे ऐसे बयान भी जारी कर सकते हैं, जिन पर सत्ता के ऊंचे हलकों में प्रतिक्रिया और खंडन सामने आता है.
इसके बावजूद ऐसे लोग सत्ता के सुरक्षित दायरे में बने रहते हैं. कुछ समय बाद वे किसी नए दावे के साथ फिर सामने आ जाते हैं.
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी में ऊपर बताई गई कई ख़ासियतें हैं.
वह एक धार्मिक शख़्सियत हैं और उनके पास कोई सरकारी पद नहीं है. वह ‘हिज़्बुल्लाह ईरान’ नाम के एक संगठन के महासचिव हैं. हालांकि, ईरानी राजनीति में इस संगठन की वास्तविक अहमियत और हैसियत स्पष्ट नहीं है. इसके अलावा, उनका संबंध ऐसे परिवार से है, जिसके रिश्ते धार्मिक मदरसों, राजनयिक हलकों और ख़ामेनेई परिवार से जुड़े हुए हैं.
लंबे-चौड़े दावे
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी इसी पृष्ठभूमि और हैसियत के सहारे ऐसे ‘राज़’ सामने लाते हैं, जिनके बारे में बोलने पर ईरान जैसे देश में किसी और व्यक्ति को गंभीर नतीजों का सामना करना पड़ सकता है.
हाल ही में उन्होंने दावा किया कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान 27 या 28 बार इस्तीफ़ा दे चुके हैं या ऐसा करने की धमकी दे चुके हैं. उनके मुताबिक, सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने मसूद पेज़ेश्कियान के इस रवैये पर लिखित जवाब दिया था. उन्होंने कहा था कि अगर पेज़ेश्कियान दोबारा इस्तीफ़ा देते हैं तो वह इसे स्वीकार कर लेंगे. यानी ईरानी राष्ट्रपति का इस्तीफ़ा मंज़ूर कर लेंगे.
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी ने यह दावा भी किया था कि मोहम्मद बाक़र ज़ुलक़द्र को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव पद से हटाया जा रहा है और उनकी जगह मोहसिन रज़ाई को नियुक्त किया जाएगा. उनका यह दावा सही साबित हुआ है और मोजतबा ख़ामेनेई ने हाल ही में मोहसिन रज़ाई की नियुक्ति को मंज़ूरी दी है.
बाक़र ख़राज़ी ने आगे कहा था कि विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची को बता दिया गया है कि अब उन्हें बातचीत में दख़ल देने की अनुमति नहीं होगी.
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ईरानी राष्ट्रपति के कार्यालय ने मसूद पेज़ेश्कियान के इस्तीफ़े को लेकर बाक़र ख़राज़ी के बयानों को ‘पूरी तरह झूठ और बकवास’ बताया है. वहीं, ईरान के सर्वोच्च नेता के कार्यालय ने भी मोजतबा ख़ामेनेई से जुड़े ख़राज़ी के बयान का खंडन किया है.
ख़राज़ी के बयान और उसके बाद आए खंडनों से सामने आया यह विवाद कोई नई घटना नहीं है. बल्कि यह लंबे समय से चले आ रहे सिलसिले की एक और कड़ी है.
इस लंबे सिलसिले में ईरान से अलग हो चुके इलाक़ों को वापस लेने के वादे, एक हज़ार तोमान के बराबर डॉलर होने के दावे, सरकार को ‘तबाह’ करने की धमकियां, परमाणु बम बनाने के सुझाव और यहां तक कि अमेरिका के तट पर सुनामी पैदा करने के लिए परमाणु हथियारों के इस्तेमाल जैसे बयान शामिल रहे हैं.
सवाल यह है कि मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी कौन हैं? और इतने विवादित और असाधारण बयानों के बावजूद वह अब भी सरकारी हलकों के बारे में अपनी बात किस तरह सामने रखने में सक्षम हैं?
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी कौन हैं?
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मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी का जन्म 21 जुलाई 1961 को ईरान के एक धार्मिक परिवार में हुआ था.
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ‘इरना’ के मुताबिक, उनका जन्म तेहरान में हुआ था. हालांकि, उनकी परवरिश क़ुम में हुई. उनके पिता मोहसिन ख़राज़ी, क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के वरिष्ठ शिक्षकों में शामिल थे. वह मजलिस-ए-ख़बरेगान-ए-रहबरी के दूसरे से चौथे कार्यकाल के दौरान तेहरान के प्रतिनिधि भी रहे.
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी की युवावस्था, शिक्षा और दूसरी गतिविधियों के बारे में ज़्यादातर जानकारी दो आपस में जुड़े स्रोतों से मिलती है. पहला, उनकी निजी वेबसाइट पर उनके एक शागिर्द की ओर से लिखी गई उनकी जीवनी है. दूसरा, मार्च 2023 में इरना की ओर से प्रकाशित एक परिचयात्मक प्रोफ़ाइल है. यह प्रोफ़ाइल मजलिस-ए-ख़बरेगान के चुनाव में उनकी उम्मीदवारी के समय प्रकाशित हुआ था.
उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित जीवनी के मुताबिक, मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी कम उम्र से ही ईरान के शाह के ख़िलाफ़ गतिविधियों में शामिल रहे.
इरना ने 2023 में मजलिस-ए-ख़बरेगान के चुनाव में उनकी उम्मीदवारी के समय लिखा था कि उन्होंने अपने भाई मोहम्मद सादिक़ ख़राज़ी के साथ इस्लामी क्रांति से पहले होने वाले प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. कम उम्र में इसी सिलसिले में उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया था.
इसी रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया कि उसी दौर में उन्होंने क़ुम शहर के जमकरान के पहाड़ी इलाक़ों में ‘हिज़्बुल्लाह का पहला प्रतिरोधी सेल’ बनाया था. उन्होंने हिज़्बुल्लाह से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण भी दिया था.
ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी ने अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी की और क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया में दाख़िला लिया. उनकी जीवनी के मुताबिक, उन्होंने फ़िक़्ह और उसूल की पढ़ाई अपने पिता और हौज़ा के दूसरे शिक्षकों से की.
मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी का नाम 1990 के दशक की शुरुआत से ‘हिज़्बुल्लाह ईरान’ और इसी नाम के एक अख़बार से जुड़ा रहा है. यह संगठन जाने-माने समूह ‘अंसार हिज़्बुल्लाह’ से अलग है. मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी को इस संगठन का महासचिव और इसके अख़बार का संपादक बताया जाता है.
इस संगठन की कानूनी हैसियत पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. हालांकि, ऐसा लगता है कि ‘हिज़्बुल्लाह ईरान’ के महासचिव का पद पिछले तीन दशकों से ज़्यादा समय से मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी को एक स्थायी राजनीतिक पहचान और अपनी बात रखने का मंच देता रहा है.
2023 में ईरान की काउंसिल ने करमान प्रांत से मजलिस-ए-ख़बरेगान का चुनाव लड़ने के लिए मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी की उम्मीदवारी को मंज़ूरी दी थी. हालांकि, वह प्रांत की तीन सीटों में से कोई भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुए.
इससे करीब दस साल पहले, उन्होंने 2013 के राष्ट्रपति चुनाव में ‘दौलत-ए-सालेहीन’ यानी ‘नेक लोगों की सरकार’ के नारे के साथ उम्मीदवार के तौर पर अपना पंजीकरण कराया था. लेकिन काउंसिल ने उनकी उम्मीदवारी ख़ारिज कर दी थी.
ख़ुमैनी और ख़ामेनेई परिवारों से संबंध
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मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी कभी ईरानी सरकार में किसी बड़े सरकारी पद पर नहीं रहे. हालांकि, उनके परिवार के लोग हौज़ा-ए-इल्मिया, राजनयिक क्षेत्र और इस्लामी गणराज्य ईरान के शीर्ष नेतृत्व के हलकों समेत कई प्रभावशाली क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं.
यही पृष्ठभूमि उनके बयानों को, यहां तक कि उन मौकों पर भी जब वह अपने दावों के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं करते, एक आम धार्मिक या राजनीतिक कार्यकर्ता की तुलना में कहीं ज़्यादा ध्यान दिलाती है.
उनके भाई मोहम्मद सादिक़ ख़राज़ी कई वर्षों तक ईरान के विदेश मंत्रालय में काम करते रहे हैं. वह फ़्रांस में ईरान के राजदूत भी रहे और बाद में सुधारवादी पार्टी ‘निदाए ईरानियान’ के संस्थापक बने.
उनके चाचा कमाल ख़राज़ी भी मोहम्मद ख़ातमी के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे. बाद में 2006 में उन्हें विदेश संबंधों के लिए रणनीतिक परिषद का प्रमुख नियुक्त किया गया. यह संस्था अली ख़ामेनेई के आदेश पर बनाई गई थी.
फ़रवर्दीन में हुए एक इसराइली हवाई हमले में मारे जाने तक वह इस पद पर रहे.
सादिक़ और कमाल ख़राज़ी की राजनीतिक शैली और भाषा, मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी के अपेक्षाकृत सख़्त और गैर-पारंपरिक रुख़ से काफ़ी अलग रही है.
ख़राज़ी परिवार का ख़ामेनेई परिवार से संबंध मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी की बहन सोसन ख़राज़ी के ज़रिए है.
सोसन ख़राज़ी की शादी मसूद ख़ामेनेई से हुई है. वह अली ख़ामेनेई के तीसरे बेटे और मौजूदा सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई के छोटे भाई हैं.
इस तरह मसूद ख़ामेनेई, मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी, के बहनोई हैं. मसूद ख़ामेनेई सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई देते हैं. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक, वह अपने पिता से जुड़े दस्तावेज़ों और विरासत के संरक्षण और प्रकाशन से जुड़े कार्यालय की ज़िम्मेदारियों से जुड़े रहे हैं.
पारिवारिक संबंधों का यह दायरा सिर्फ़ ख़ामेनेई परिवार तक सीमित नहीं है.
सादिक़ ख़राज़ी के एक बेटे की शादी मोहम्मद रज़ा ख़ातमी और ज़हरा अशराक़ी की बेटी से हुई थी. इस रिश्ते के ज़रिए ख़राज़ी परिवार एक तरफ़ पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के परिवार से और दूसरी तरफ़ रूहुल्लाह ख़ुमैनी के परिवार से भी जुड़ जाता है.
इन पारिवारिक संबंधों से कुछ हद तक यह समझने में मदद मिलती है कि ईरानी सरकार के अंदरूनी मामलों को लेकर मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी के दावों पर इतनी असाधारण दिलचस्पी क्यों होती है.
हाल ही में बाक़र ख़राज़ी ने दावा किया कि वह करीब 40 साल से मोजतबा ख़ामेनेई के दोस्त हैं और कई निजी मुलाक़ातों में भी शामिल रहे हैं.
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यानी मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी महज़ एक धार्मिक शख़्सियत या राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जिनकी औपचारिक सत्ता के ढांचे में कोई भूमिका नहीं है. लेकिन पारिवारिक और निजी संबंधों के ज़रिए उनकी पहुंच ईरान के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक और धार्मिक हलकों तक है.
यही वजह है कि उनके बयानों पर, भले ही बाद में उनका खंडन कर दिया जाए, ईरानी राजनीतिक परिदृश्य में बहस होने लगती है.
वादे, दावे और धमकियां
2013 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए पंजीकरण को मोहम्मद बाक़र ख़राज़ी की ओर से ईरान में सत्ता के औपचारिक ढांचे में शामिल होने की सबसे गंभीर कोशिश माना जाता है.
उन्होंने अपनी राजनीतिक मुहिम का लक्ष्य ‘दौलत-ए-सालेहीन’ यानी ‘नेक लोगों की सरकार’ की स्थापना को बताया और ‘फ़ारिस-ए-इस्लामी’ का नारा अपनाया. उनके मुताबिक, इस नारे में ‘फ़ारिस’ शब्द दरअसल चार शब्दों के शुरुआती अक्षरों से बना था. ये शब्द थे ‘प्रगति, शांति, समृद्धि और सुरक्षा’.
ख़राज़ी के चुनावी वादे उस समय काफ़ी चर्चा में रहे थे. उन्होंने यह वादा भी किया था कि राष्ट्रपति बनने के शुरुआती कुछ महीनों के भीतर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटवा दिए जाएंगे. साथ ही, देश की मुद्रा रियाल और तोमान को बदल दिया जाएगा.
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