Source :- LIVE HINDUSTAN
देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) सेक्टर की अहम भूमिका मानी जाती है। खासकर मैन्युफैक्चरिंग MSME देश में लाखों लोगों को रोजगार देने के साथ औद्योगिक विकास की रीढ़ है। लेकिन, एक नई रिपोर्ट ने इस सेक्टर को लेकर चिंता बढ़ा दी है। TransUnion CIBIL और SIDBI की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग MSME को मिलने वाले कर्ज (Credit) की रफ्तार पिछले 3 सालों में सबसे धीमी रही है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के लगातार प्रयासों के बावजूद इस सेक्टर में लोन ग्रोथ केवल 13% रही, जबकि अन्य सेक्टर में इससे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कुल बकाया कर्ज बढ़कर 15.3 लाख करोड़
रिपोर्ट में बताया गया है कि मार्च 2026 तक मैन्युफैक्चरिंग MSME का कुल बकाया कर्ज बढ़कर 15.3 लाख करोड़ रुपये हो गया। हालांकि, यह वृद्धि सकारात्मक है, लेकिन ट्रेड (व्यापार) सेक्टर में कर्ज 16% और प्रोफेशनल व अन्य सेवाओं के क्षेत्र में 17% की दर से बढ़ा, यानी बैंक और वित्तीय संस्थान मैन्युफैक्चरिंग की तुलना में अन्य क्षेत्रों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
हर 10 में 6 MSME को नहीं मिला बैंक लोन
रिपोर्ट का एक और बड़ा खुलासा यह है कि देश में रजिस्टर्ड MSME में से केवल 41% उद्यमों को ही अब तक औपचारिक (Formal) लोन मिल पाया है। इसका मतलब है कि हर 10 में से लगभग 6 MSME आज भी बैंकिंग व्यवस्था से कर्ज नहीं ले पा रहे हैं। एक्सपर्ट का मानना है कि अगर इन छोटे उद्योगों तक आसान और सस्ता कर्ज पहुंचाया जाए, तो रोजगार और आर्थिक विकास दोनों को नई गति मिल सकती है।
cnbctv18 के मुताबिक, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बैंकों का रवैया नए ग्राहकों को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हो गया है। NTC (New-to-Credit) यानी पहली बार लोन लेने वाले ग्राहकों की हिस्सेदारी FY23 में 52% थी, जो FY26 में घटकर 42% रह गई। इससे साफ संकेत मिलता है कि बैंक नए कारोबारियों को लोन देने में पहले से ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लोन की गुणवत्ता (Asset Quality) ट्रेड सेक्टर से बेहतर रही। रिपोर्ट के मुताबिक, 90 दिनों से ज्यादा बकाया (NPA) वाले खातों में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 0.55% की कमी आई, जबकि ट्रेड सेक्टर में यह कमी 0.41% रही। इसके बावजूद बैंकों ने मैन्युफैक्चरिंग की बजाय ट्रेड सेक्टर को ज्यादा कर्ज देना जारी रखा।
रिपोर्ट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग MSME को मिलने वाले कुल कर्ज का 50% से अधिक हिस्सा केवल टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और फूड प्रोसेसिंग उद्योगों में केंद्रित है। वहीं, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं, जहां मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सबसे अधिक कर्ज दिया जा रहा है।
हालांकि, रिपोर्ट में कुछ जोखिमों की भी ओर इशारा किया गया है। बिना गारंटी (Unsecured) बिजनेस लोन में डिफॉल्ट की दर बढ़कर 7.2% हो गई है, जो पिछले 3 सालों में 2.74% बढ़ी है। वहीं, 2 लाख से 10 लाख रुपये तक के MSME लोन में भी डिफॉल्ट बढ़कर 5.6% पहुंच गया है। इससे बैंकों की चिंता बढ़ी है और वे नए लोन देने में अधिक सतर्क हो गए हैं।
TransUnion CIBIL के प्रबंध निदेशक और सीईओ भावेश जैन का कहना है कि अगर MSME सेक्टर को मजबूत बनाना है, तो सभी हितधारकों को मिलकर ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जिससे छोटे और नए कारोबारियों के लिए कर्ज लेना आसान, तेज और उनकी जरूरतों के अनुरूप हो सके।
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत के मैन्युफैक्चरिंग MSME सेक्टर में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन कर्ज तक सीमित पहुंच इसकी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। अगर सरकार, बैंक और वित्तीय संस्थान मिलकर इस अंतर को कम करते हैं, तो यह सेक्टर न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा, बल्कि देश की आर्थिक विकास दर को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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