Source :- LIVE HINDUSTAN

1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान सोवियत संघ ने यहां अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी थीं, जिससे पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी हो गई थी। तब अमेरिका भी क्यूबा से कांपता था। अब क्यूबा सबसे बुरी स्थिति में है।

अमेरिका से महज 90 मील की दूरी पर स्थित क्यूबा की हालत इन दिनों खराब हो चुकी है। यह कैरेबियाई द्वीप इस समय इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। एक तरफ जहां देश में ऊर्जा संकट चरम कर है और लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य कार्रवाई की धमकियों ने क्यूबा के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। इसके बाद अब क्यूबा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मदद की गुहार लगाई है। हालांकि क्यूबा की स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी। एक वक्त था जब अमेरिका भी क्यूबा के नाम से कांपता था और पूरी दुनिया में उसकी तूती बोलती थी। समझते हैं कि क्यूबा आखिर इस बदहाली की स्थिति में पहुंचा कैसे।

इतिहास गवाह है कि क्यूबा हमेशा से इतना लाचार नहीं था। क्यूबा ने दशकों तक लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में अपना दबदबा कायम किया था। इतिहास को समझने की कोशिश करें तो 1959 की क्रांति बेहद अहम रही। इस दौरान फिदेल कास्त्रो और चे गेवेरा ने मिलकर क्यूबा में अमेरिका समर्थित बतिस्ता तानाशाही को उखाड़ फेंका और एक कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना की। अमेरिका की नाक के नीचे एक कम्युनिस्ट देश का बनना उसके लिए सबसे बड़ी रणनीतिक दुर्घटना थी।

जब अमेरिका भी क्यूबा से डरता था

इसके बाद आया वो ‘मिसाइल संकट’ जिसने दुनिया को परमाणु युद्ध के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया। क्यूबा के इतिहास का सबसे स्वर्णिम दौर भी यही था। 1962 में सोवियत संघ ने गुपचुप यहां अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी थीं, जिससे पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी हो गई थी। तब अमेरिका भी क्यूबा से कांपता था। क्यूबा ने न केवल अमेरिका को दशकों तक चुनौती दी, बल्कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों के आंदोलनों में अपनी सेना भेजकर वैश्विक स्तर पर अपना लोहा मनवाया था।

महाशक्ति से कैसे बन गया कंगाल?

पतन की शुरुआत तब हुई जब क्यूबा की क्रांति के पोस्टर बॉय चे गेवेरा लैटिन अमेरिका में क्रांति की अलख जगाने बोलीविया पहुंचे। यहां उन्हें पकड़ लिया गया और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की मदद से उनकी हत्या कर दी गई। यह क्यूबा के वैश्विक प्रभाव के लिए एक बड़ा वैचारिक झटका था। वहीं क्यूबा की पूरी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत सोवियत संघ की वित्तीय मदद और सस्ते तेल पर टिकी थी। 1991 में जैसे ही सोवियत संघ टूटा हुआ, क्यूबा जैसे अनाथ हो गया। 1991 के बाद क्यूबा में जो दौर आया, उसे इतिहास में ‘स्पेशल पीरियड’ कहा जाता है। इस दौरान देश में ईंधन की भयंकर कमी हो गई। सामाजिक अशांति फैल गई और लाखों लोग देश छोड़कर अमेरिका भागने पर मजबूर हुए।

30 साल पुराने हादसे का बदला लेंगे ट्रंप?

1996 में क्यूबा ने अपनी हवाई सीमा का उल्लंघन करने वाले अमेरिका के दो छोटे विमानों को मार गिराया था। अब, 30 साल बाद डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इसी घटना को लेकर पूर्व क्यूबन राष्ट्रपति राउल कास्त्रो के खिलाफ अदालती वारंट जारी कर किया है। अब क्यूबा को डर है कि वेनेजुएला में मादुरो को हटाने के बाद अब अमेरिका कोई भी बहाना बनाकर उस पर सीधा सैन्य हमला कर सकता है। वहीं आज क्यूबा उस स्थिति में भी नहीं है जब वह वह 1962 की तरह अमेरिका से मुकाबला कर सके। वेनेजुएला से तेल की सप्लाई रुकते ही क्यूबा के पावर ग्रिड पूरी तरह ठप हो गए हैं। पूरे देश में ब्लैकआउट आम है, फैक्ट्रियां बंद हैं और अस्पताल जनरेटर के भरोसे चल रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में लगाई गुहार

अब क्यूबा ने दुनिया से मदद की गुहार लगाई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक में मंगलवार को क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्ज पारिला ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्यूबा को इस भीषण मानवीय त्रासदी से बचाने के लिए तत्काल मदद की अपील की। क्यूबा के विदेश मंत्री ने वैश्विक मंच से कहा, “मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करता हूं कि इस मानवीय आपदा को रोकने के लिए एकजुट हो। यह क्यूबा के साथ एकजुटता दिखाने का समय है।” दरअसल क्यूबा की यह छटपटाहट बेवजह नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कम्युनिस्ट देश पर पूरी तरह कब्जा करने और वहां तख्तापलट करने की इच्छा खुलेआम जता चुके हैं। ट्रंप ने खुले तौर पर कहा है कि वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के बाद, अब हवाना, यानी क्यूबा की राजधानी उनका अगला सैन्य टारगेट हो सकता है। ऐसे में क्यूबा की चिंता जायज है

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