Source :- LIVE HINDUSTAN
आज के सोशल मीडिया के दौर में लोग खुद पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल रहे हैं। ऐसे में बार-बार खुद को दोषी मानने की आदत धीरे-धीरे क्रोनिक गिल्ट का रूप ले सकती है, जो मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है।
गिल्ट शब्द से आप समझ रहे होंगे कि हम अपराधबोध की बात कर रहे हैं। क्रोनिक उसी में जोड़ दिया गया है, जिसे आम भाषा में कहा गया है लंबे समय तक रहने वाला अपराधबोध। ये चाहे किसी भी तरह के रिलेशनशिप में हो- जैसे माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या फिर प्रेमी-प्रेमिका के बीच। अक्सर ऐसा होता है कि कुछ गलतियां जो हम कर जाते हैं, उनकी माफी मांग लेते हैं और कुछ जो हम नहीं करते लेकिन उनका गिल्ट भी मन में अपने आप बना रहता है। हम बिना किसी गलती को किए ही खुद को दोषी और जिम्मेदार मान लेते हैं, इसे ही कहा जाता है क्रोनिक गिल्ट। आजकल रिलेशनशिप में भी ये काफी चल रहा है और लंबे समय तक इसका शिकार रहने के कारण लोग डिप्रेशनर का शिकार हो जाते हैं। तो चलिए आपको विस्तार से क्रोनिक गिल्ट के बारे में बताते हैं, आखिर ये क्या होता है और इसके खास लक्षण क्या हैं?
क्रोनिक गिल्ट की शुरुआत कैसे होती है?
क्रोनिक गिल्ट की शुरुआत अक्सर किसी एक घटना से नहीं, बल्कि लंबे समय तक बनी रहने वाली सोच और भावनाओं से होती है। आज के सोशल मीडिया के दौर में भी कई लोग अनजाने में इसका शिकार हो रहे हैं। मान लीजिए कि आपने वीकेंड पर पूरा आराम किया और कोई काम नहीं किया, जबकि आपके पास कई जरूरी काम थे। इसके बाद अगर आपको यह सोचकर अपराधबोध हो कि मुझे आराम करने की बजाय काम करना चाहिए था, तो यह सामान्य गिल्ट हो सकता है। लेकिन अगर ऐसी सोच बार-बार आने लगे, आप हर बार आराम करने पर खुद को दोषी मानने लगें और यह भावना लंबे समय तक बनी रहे, तो यह क्रोनिक गिल्ट का रूप ले सकती है।
रिश्तों में कैसे बनता है प्रेशर
क्रोनिक गिल्ट ऐसी बीमारी है, जो धीरे-धीरे आपके मन को कंट्रोल में करने लगती है। इसमें इंसान बिना किसी खास वजह के ही खुद को दोषी मानने लगता है। उसे हर समय ये महसूस होने लगता है कि वह दूसरों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। ऐसे में महसूस होने लगता है कि वह अच्छा पार्टनर या माता-पिता या फिर अच्छा कर्मचारी नहीं है।
डिप्रेशन का बन सकता है कारण
लंबे समय तक क्रोनिक गिल्ट में रहने की वजब से आप डिप्रेशन का शिकार भी हो सकते हैं। जब स्ट्रेस में रहने के कारण शरीर लगातार कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन रिलीज करता रहता है। तो यह बढ़ा हुआ कोर्टिसोल स्तर धीरे-धीरे दिमाग के रासायनिक संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे खुशी और उत्साह महसूस कराने वाले न्यूरोट्रांसमीटर, जैसे कि सेरोटोनिन और डोपामाइन का बनना लगभग कम हो जाता है। इससे दिमाग पर लगातार तनाव बना रहता है और इसी वजह से इंसान हर समय उदास, थका हुआ और निराश महसूस करने लगता है। यही स्थिती धीरे-धीरे आपको डिप्रेशन की ओर धकेल देगी।
कैसे करें बचाव
- सॉरी न बोलें- हर छोटी बात पर सॉरी बोलना बंद करें। अगर आपकी गलती नहीं है, तो वहां माफी मांगने की जरूरत नहीं है।
- ना बोलना सीखें- जिस जगह पर आपको ना बोलना चाहिए, वहां फौरन ‘ना’ कहें। ऐसा करने से आपकी मन की शांति बनी रहेगी।
- बाउंड्री करें सेट- आपको कब आराम करना है और कब काम करना है, ये सब आपके हिसाब से होना चाहिए। इसके लिए बाउंड्री सेट करें।
- दूसरों के मूड की जिम्मेदारी न लें- कुछ लोगों को इससे भी फर्क पड़ता है कि वह शख्स बात नहीं कर रहा या वह मेरी वजह से गुस्सा है। ऐसा सोचना बंद करें और दूसरों के मूड की जिम्मेदारी न लें। सभी के मूड स्विंग्स होते हैं, इसमें आप दोषी नहीं है।
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