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हॉकी वर्ल्ड कप: भारत की पहले क़दम पर ही पाकिस्तान से टक्कर, कैसी है तैयारी

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Source :- BBC INDIA

हरमनप्रीत सिंह

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भारतीय पुरुष हॉकी टीम पिछले पांच दशकों से हर बार एफआईएच वर्ल्ड कप हॉकी चैंपियनशिप में पोडियम पर चढ़ने के इरादे से जाती रही है. लेकिन हर बार उसे असफलता का मुंह देखना पड़ा है.

हरमनप्रीत सिंह की अगुआई में एक बार फिर भारतीय टीम नीदरलैंड्स और बेल्जियम में संयुक्त रूप से आयोजित वर्ल्ड कप में भाग लेने गई है. टीम की इस बार पदक जीतने की उम्मीदों को भरोसे लायक माना जा सकता है.

भारतीय कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने हॉकी इंडिया डॉट कॉम को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, “मुझे देश के लिए खेलते हुए 11-12 साल हो गए हैं और मेरी सोच हमेशा प्रमुख टूर्नामेंटों में पदक जीतने की रही है. हमारी टीम संतुलित है और पिछले दिनों में दुनिया की दिग्गज टीमों के ख़िलाफ़ किए प्रदर्शन से हम संतुष्ट हैं.”

उन्होंने इसी बातचीत में ये भी कहा है, “हमने टोक्यो ओलंपिक में 41 साल बाद पदक जीता था. हम वर्ल्ड कप में 51 सालों से चले आ रहे पदकों के इंतजार को इस बार खत्म कर देंगे और नया इतिहास रचेंगे. वैसे भी हम जब भी मैदान में उतरते हैं तो अपना बेस्ट देते हैं.”

इस बार बदल गया है फॉर्मेट

हॉकी वर्ल्ड कप में आमतौर पर ग्रुप मैचों के बाद टॉप दो टीमें क्वार्टर फाइनल में स्थान बना लेती थीं.

लेकिन इस बार फॉर्मेट में कुछ बदलाव हुआ है.

हर टीम अपने ग्रुप की बाकी तीन टीमों के ख़िलाफ़ एक-एक मैच खेलेगी. इस तरह प्रत्येक टीम तीन मैच खेलेगी.

इन मैचों के नतीजों के आधार पर हर ग्रुप में टीमों की पहली से चौथी तक की रैंकिंग तय होगी. हर ग्रुप की शीर्ष दो टीमें अगली स्टेज में पहुंचेंगी.

इस स्टेज में फिर हर टीम तीन मुक़ाबले खेलेगी और इस बार उसके सामने ऐसी टीम होगी जिससे पहली स्टेज में उसका सामना नहीं हुआ था.

भारत का ग्रुप नहीं है आसान

हरमनप्रीत सिंह

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भारत को इंग्लैंड, वेल्स और पाकिस्तान के साथ ग्रुप डी में रखा गया है. वैसे तो भारतीय टीम पिछले 10 मैचों से पाकिस्तान से कभी नहीं हारी है. पर दोनों टीमों की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता को देखते हुए इस मुकाबले को कभी भी आसान नहीं माना जा सकता है.

ग्रुप की दूसरी टीम वेल्स के खिलाफ भी भारत हमेशा बेहतर प्रदर्शन करता रहा है. इन दो जीतों से वह अगले ग्रुप के लिए तो क्वालिफाई हो जाएगा. पर उसे ग्रुप में पहला स्थान पाने के लिए इंग्लैंड की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ भारत का वैसे भी हाल का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है. वह पिछले पांच मैचों में से दो ही जीत सका है.

भारतीय की जीत में 2024 के पेरिस ओलंपिक की जीत खास है. भारत ने ब्रिटेन को हराकर ही सेमीफाइनल में स्थान बनाया था.

भारत यदि शुरुआती ग्रुप में इंग्लैंड सहित तीनों टीमों को अच्छे अंतर से फतह करके जाता है तो अगले ग्रुप यानी ई में उसे आसानी हो सकती है.

इस ग्रुप में भारत और इंग्लैंड के अलावा ग्रुप ए की टॉप दो टीमें रहनी हैं. ग्रुप एक की टॉप दो टीमों में नीदरलैंड्स और अर्जेंटीना के रहने की संभावना है.

नीदरलैंड्स 2024 के पेरिस ओलंपिक की विजेता है और वह एफआईएच प्रो लीग के पिछले सीजन में लगभग सभी प्रमुख टीमों को हरा चुकी है.

सबसे खास तो उसके कप्तान थियरे ब्रिकमैन हैं, जो पिछले चार सीजन से एफआईएच प्लेयर ऑफ द ईयर के लिए मनोनीत हो रहे हैं. वह एफआईएच रैंकिंग में बेल्जियम के बाद दूसरे नंबर पर है.

भारत की उम्मीद रहेंगी इन खिलाड़ियों पर

मनप्रीत सिंह

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भारत की सफलता बहुत कुछ कप्तान हरमनप्रीत सिंह के प्रदर्शन पर निर्भर रहनी है. मौजूदा समय में ज्यादातर फैसले पेनल्टी कॉर्नरों पर जमाए गोलों से होते हैं.

हरमनप्रीत को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रेग फ्लिकरों में गिना जाता है. वह यदि पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदल सके, तो भारत का सपना साकार हो सकता है.

भारतीय डिफेंस कई बार दिग्गज टीमों के दवाब में चरमरा जाता है. लेकिन डिफेंस में कप्तान हरमनप्रीत के अलावा अमित रोहिदास दोनों ही अनुभवी हैं.

पर इस बार गोल पर सूरज करकेरा के साथ मोहित होंगे, जिन्हें ज्यादा अनुभव नहीं है, इसलिए डिफेंस को ज्यादा सजगता बरतनी पड़ सकती है.

टीम में सबसे अहम भूमिका सबसे अनुभवी मनप्रीत सिंह को निभानी है. असल में वह धुरी की भूमिका में रहेंगे, इसलिए वह कितनी गेंद को आगे रख पाते हैं, इस पर डिफेंस भी निर्भर करेगा.

जर्मनी और बेल्जियम भी खिताब के दावेदार

जर्मनी पिछली वर्ल्ड कप चैंपियन है. जर्मनी ने हाल के सालों में बेहतरीन प्रदर्शन से विश्व हॉकी में अपनी धाक जमाई हुई है.

साथ ही बेल्जियम, नीदरलैंड्स और ऑस्ट्रेलिया भी खिताब की दावेदारी पेश कर सकती हैं.

विश्व की नंबर एक टीम बेल्जियम को नीदरलैंड्स की तरह ही घरेलू सरजमीं पर खेलने का लाभ मिलेगा.

ऑस्ट्रेलिया भले ही पिछले कुछ समय से कोई बड़ी खिताबी सफलता नहीं पा सकी है. पर वह हमेशा अपना दिन होने पर किसी भी टीम की चुनौती ध्वस्त करने का माद्दा रखती है.

भारत से सफलता हमेशा रूठी रही है

भारतीय हॉकी टीम ने हाल फिलहाल में अपना प्रदर्शन काफी बेहतर किया है

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भारतीय हॉकी में पिछले एक दशक में बहुत सुधार आया है. वह पिछले दो ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतकर खुद को विश्व की दिग्गज टीमों शुमार कराने में सफल भी रही है.

पर वर्ल्ड कप में वह 1975 के बाद कभी पोडियम पर नहीं चढ़ सकी है.

भारतीय टीम 1975 के बाद सिर्फ़ दो बार 1982 मुंबई वर्ल्ड कप और 1994 सिडनी वर्ल्ड कप में ही पांचवें स्थान तक पहुंची है.

अन्यथा कई बार तो प्रदर्शन बेहद खराब रहा है. भारतीय हॉकी में एक दौर तो ऐसा आ गया था, जब लगने लगा था कि टीम भाग लेने जा ही क्यों रही है.

यह दौर था 1986 से 2006 का. इस दौरान टीम कम से कम चार बार दस या उससे भी निचले स्थान पर रही. 1986 के लंदन वर्ल्ड कप में तो टीम आखिरी स्थान पर पहुंच गई थी.

मेजबानी का भी नहीं मिला लाभ

शुरुआती तीन वर्ल्ड कप में भारतीय हॉकी टीम ने मेडल हासिल किए थे

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भारतीय टीम पिछले 16 सालों में तीन बार वर्ल्ड कप का आयोजन कर चुकी है पर घर में खेलना भी उसे पोडियम पर नहीं चढ़ा सका है.

भारत ने 2010 में नई दिल्ली में विश्व कप का आयोजन किया और सभी को लग रहा था कि भारतीय हॉकी की किस्मत बदल सकती है.

भारतीय टीम इस विश्व कप में ग्रुप दो में पांच मैचों में से सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ ही मैच जीत सकी थी. वह चार अंकों के साथ चौथे नंबर पर रही और क्वालिफिकेशन मैच को हारकर आठवां स्थान ही पा सकी.

भारत ने 2018 भुवनेश्वर और 2023 भुवनेश्वर और राउरकेला के विश्व कप तो उस दौर में आयोजित किए हैं, जब विदेशी कोचों की देखरेख में टीम में जान आ गई थी.

पर इन दोनों मौकों पर भी क्रमश: छठा और 9वां स्थान ही प्राप्त कर सकी.

हालांकि विश्व कप हॉकी चैंपियनशिप की शुरुआत 1971 से हुई और भारत ने पहल तीनों विश्व कपों में बेहतर प्रदर्शन करके पदक हासिल किए थे.

अजितपाल सिंह की अगुआई में 1975 के क्वालालंपुर वर्ल्ड कप में जीते स्वर्ण पदक को कैसे भुलाया जा सकता है.

भारत ने पहले दो संस्करणों की विजेता पाकिस्तान को फाइनल में 2-1 से हराकर पहली बार स्वर्ण पदक जीता था.

इस मैच में पाकिस्तान जाहिद द्वारा जमाए गोल से बढ़त बनाने में सफल हो गई थी. लेकिन सुरजीत सिंह ने 44वं मिनट में भारत को बराबरी दिलाई. पर इस जीत के हीरो रहे अशोक ध्यानचंद, उन्होंने विजयी गोल जमाया था.

भारत ने 1971 के पहले वर्ल्ड कप में कांस्य पदक और 1973 में रजत पदक जीता था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS