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कुछ महीने होते ही बच्चों के दांत निकलना शुरू हो जाते हैं. किशोरावस्था में पहुंचने तक उनके लगभग सभी स्थायी दांत निकल आते हैं.
हालांकि, मुंह के बिल्कुल पिछले हिस्से में मौजूद कुछ दाढ़ें सबसे आख़िर में निकलती हैं.
आमतौर पर ऐसा तब होता है, जब व्यक्ति वयस्क होने की उम्र में पहुंच रहा होता है.
पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश की स्थानीय भाषाओं में इन दांतों को ‘अक्ल दाढ़’ कहा जाता है.
ये धारणा है कि उम्र बढ़ने के साथ इंसान की समझ और निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित होती है. ‘अक़्ल’ का मतलब सूझबूझ या विवेक होता है.
इसी वजह से अंग्रेज़ी में इसे ‘विज़डम टूथ’ कहा जाता है. मेडिकल की भाषा में इसे ‘थर्ड मोलर’ यानी तीसरी दाढ़ कहा जाता है.
इसे यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि दांतों की कतार में यह तीसरी दाढ़ होती है.
हालांकि, हर व्यक्ति की अक्ल की दाढ़ नहीं निकलती. कुछ लोगों में ये दांत मौजूद होने के बावजूद कोई समस्या पैदा नहीं करते, जबकि कुछ लोगों के लिए ये दर्द और तकलीफ़ का कारण बन सकते हैं.
लेकिन अक़्ल दाढ़ इतनी देर से क्यों निकलती हैं? दांत निकलते समय दर्द क्यों होता है? ये किस उम्र तक निकल सकती हैं और अगर दर्द हो तो क्या दांत निकलवाना ही एकमात्र समाधान है?
अक़्ल दाढ़ निकलने की सही उम्र
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एक वयस्क इंसान के आम तौर पर 32 दांत होते हैं.
इनमें मुंह के ऊपरी और निचले जबड़े के दोनों तरफ़, बिल्कुल पीछे हर कोने पर एक-एक कर कुल चार अक़्ल दाढ़ें हो सकती हैं.
हालांकि, हर व्यक्ति में चारों अक़्ल दाढ़ें मौजूद नहीं होतीं.
किसी के एक, दो या तीन अक़्ल दाढ़ हो सकती हैं, जबकि किसी की एक भी नहीं हो सकती.
अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन के मुताबिक़, आम तौर पर 17 से 21 साल की उम्र के बीच अक़्ल दाढ़ निकलना शुरू होती है.
ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) का कहना है कि ये दांत आम तौर पर किशोरावस्था के आख़िरी वर्षों से लेकर 25 साल की उम्र के बीच निकलते हैं.
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि एक निश्चित उम्र बीत जाने के बाद अक़्ल दाढ़ नहीं निकलेगी. कुछ लोगों में अक़्ल दाढ़ बाद की उम्र में भी निकल सकती है.
अगर अक़्ल दाढ़ मसूड़ों में सही जगह पर निकले तो यह मुंह के पिछले हिस्से को सहारा देने और जबड़े की हड्डी को सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है.
हालांकि, आम तौर पर देखा जाए तो अक़्ल दाढ़ की वास्तव में अब ज्यादा जरूरत नहीं रह गई है.
बल्कि ज्यादातर चिकित्सा विशेषज्ञ इन्हें एक निष्क्रिय अंग मानते हैं.
अतीत में इनकी एक ख़ास भूमिका थी लेकिन अब उसकी अहमियत नहीं रह गई है.
अमेरिका के क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक़, हमारे पूर्वजों के शुरुआती भोजन में बड़ी मात्रा में कच्चे पौधे, सूखे फल और सख़्त और रेशेदार मांस शामिल होता था.
इस तरह के भोजन को चबाकर पचने लायक बनाने में अक़्ल दाढ़ अहम भूमिका निभाती थी.
आज के दौर में भोजन तैयार करने के आधुनिक तरीकों और खाने के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों ने अक़्ल दाढ़ की ज़रूरत को काफ़ी हद तक ख़त्म कर दिया है.
खान-पान की आदतों में इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाते हुए हमारे शरीर में भी कुछ मामूली बदलाव हुए हैं.
मिसाल के तौर पर, हमारे जबड़े पहले की तुलना में छोटे हो गए हैं.
इसी वजह से बहुत से लोगों के मुंह में अक़्ल दाढ़ निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती.
आम तौर पर इंसान की चार अक़्ल दाढ़ें होती हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि हमेशा चारों निकलें.
हर दस लोगों में करीब आठ लोगों की कम से कम एक अक़्ल दाढ़ नहीं निकलती.
हालांकि, किसी भी अक़्ल दाढ़ का न निकलना या चारों का निकल आना, दोनों ही सामान्य स्थितियां हैं.
अक़्ल दाढ़ निकलने पर दर्द क्यों होता है?
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अगर अक़्ल दाढ़ दूसरे दांतों की तरह सामान्य रूप से और पर्याप्त जगह के साथ निकले तो आम तौर पर कोई समस्या नहीं होती.
हालांकि, इस दांत के निकलने के दौरान हल्की तकलीफ़ या बेचैनी महसूस हो सकती है.
अक़्ल दाढ़ मुख्य रूप से जगह की कमी के कारण समस्याएं पैदा करती है.
यह दांत मसूड़ों के बिल्कुल आख़िरी हिस्से में निकलता है.
अगर वहां दांत के निकलने के लिए पर्याप्त जगह न हो तो यह साथ वाले दांत की ओर झुक सकता है या फिर आंशिक या पूरी तरह मसूड़े या जबड़े की हड्डी में फंसा रह सकता है.
ऐसे दांत को ‘इम्पैक्टेड विज़डम टूथ’ या फंसी हुई अक़्ल दाढ़ कहा जाता है.
अगर आंशिक रूप से निकले हुए दांत के ऊपर मसूड़े का कुछ हिस्सा बचा रह जाए तो वहां भोजन के कण और बैक्टीरिया जमा हो सकते हैं.
इससे दांत के आसपास मौजूद मसूड़े में सूजन या संक्रमण हो सकता है,
जिसे ‘पेरिकोरोनाइटिस’ कहा जाता है. इससे दांत में कीड़ा भी लग सकता है.
आंशिक रूप से निकले हुए दांत के आसपास सफ़ाई करना मुश्किल होने की वजह से कुछ मामलों में अक़्ल दाढ़ के आसपास लिक्विड जमा होकर सिस्ट या एब्सेस (मवाद जमा होना) का कारण बन सकता है.
अमेरिका के मेडिकल और रिसर्च इंस्टीट्यूट मेयो क्लिनिक के मुताबिक़, इम्पैक्टेड दांत साथ वाले दांतों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.
इस स्थिति में दर्द के अलावा मसूड़े सूज सकते हैं और मुंह खोलने या चबाने में परेशानी हो सकती है. हालांकि, अगर अक़्ल दाढ़ सही तरीके से निकले तो यह भोजन चबाने में मदद करती है.
इंसान के हर जबड़े में आम तौर पर तीन दाढ़ें या पीछे के चबाने वाले दांत होते हैं.
आगे से पीछे की ओर ये पहला मोलर, फिर दूसरा मोलर और उसके बाद तीसरा मोलर होता है.
सबसे आख़िर में मौजूद तीसरा मोलर ही विज़डम टूथ या अक़्ल दाढ़ कहलाता है.
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कई बार दांत बाहर से दिखाई न देने के बावजूद एक्स-रे के जरिए उसकी स्थिति का पता लगाया जा सकता है.
ढाका के दंत चिकित्सक डॉ. ए.के.एम. हसनुज्ज़मान के मुताबिक़, ”अगर दांत की स्थिति सही हो और उसके निकलने के लिए पर्याप्त जगह मौजूद हो तो अक़्ल दाढ़ एक से दो साल के भीतर सामान्य रूप से निकल सकती है. इस दौरान हर कुछ महीनों में दर्द हो सकता है.”
उनके मुताबिक, अक़्ल दाढ़ निकलने के दौरान मरीजों की सबसे बड़ी शिकायतें दर्द और सूजन होती हैं.
जबकि बहुत से लोगों को मुंह पूरी तरह खोलने में भी परेशानी होती है.
अगर मसूड़ों के संक्रमण का लंबे समय तक इलाज न किया जाए तो यह मुंह और गले के अलग-अलग हिस्सों तक फैलकर गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है.
उन्होंने कहा, “उस समय सांस लेने या खाना खाने में परेशानी होती है और अगर स्थिति गंभीर हो जाए तो मरीज को अस्पताल में भर्ती करना पड़ सकता है. बहुत से मामलों में आख़िरकार नौबत सर्जरी तक पहुंच जाती है.”
क्या अक़्ल दाढ़ निकलवाना ज़रूरी है?
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डॉक्टरों के मुताबिक, अक़्ल दाढ़ में दर्द होने का यह मतलब नहीं है कि उसे निकलवाना ही पड़ेगा.
एनएचएस के मुताबिक़, अगर अक़्ल दाढ़ कोई समस्या पैदा नहीं कर रही हो तो आम तौर पर उसे नहीं निकाला जाता.
इसके बजाय दांतों की नियमित जांच के जरिए उसकी स्थिति पर नज़र रखी जाती है.
हालांकि, अगर बार-बार मसूड़ों में संक्रमण, तेज़ दर्द या दांत ख़राब होने की स्थिति में इन्हें निकाला जा सकता है. सिस्ट या फोड़े जैसी जटिलताएं हों तो डॉक्टर इसे निकलवाने की सलाह दे सकते हैं.
आमतौर पर दांत निकालने से पहले मसूड़े में लोकल एनेस्थेटिक का इंजेक्शन लगाया जाता है.
इससे संबंधित हिस्सा सुन्न हो जाता है और दांत निकालते समय दर्द महसूस नहीं होता.
मरीज को तकलीफ़ न हो इसलिए सेडेशन भी दी जा सकती है.
अगर दांत निकालना जटिल हो या मरीज बहुत ज्यादा घबराया हुआ हो तो जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है. इसके बाद मरीज सोया रहता है.
अक़्ल दाढ़ निकालने के बुनियादी चरण ये हैं-
- अगर दांत मसूड़े के नीचे छिपा हुआ हो तो डॉक्टर पहले मसूड़े में एक छोटा-सा चीरा लगाते हैं.
- इसके बाद जरूरत के मुताबिक़ दांत के आसपास की जगह को खोला जाता है.
- फिर दांत को एक ही टुकड़े में निकाला जाता है, हालांकि जरूरत पड़ने पर इसे दो या तीन हिस्सों में भी निकाला जा सकता है.
- आखिर में मसूड़े पर ऐसे टांके लगाए जाते हैं, जो बाद में अपने आप घुल जाते हैं.
अक़्ल दाढ़ निकलवाने के बाद ठीक होने में कितना समय लगता है?
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अक़्ल दाढ़ निकलवाने के बाद आम तौर पर अगले ही दिन रोज़मर्रा की सामान्य गतिविधियों में वापस लौटा जा सकता है.
हालांकि, अगर दांत निकालने की प्रक्रिया जटिल हो या जनरल एनेस्थीसिया दिया गया हो तो एक से तीन दिन तक आराम करने की सलाह दी जाती है.
आमतौर पर दांत निकलवाने के बाद दो सप्ताह तक कुछ समस्याएं बनी रह सकती हैं, जैसे हल्का दर्द और सूजन.
हालांकि ये एक या दो दिन बाद कम होना शुरू हो जाती है. इसी तरह गाल पर चोट या काले निशान पड़ सकते हैं. जबड़े में दर्द और अकड़न महसूस हो सकती है. खाना चबाने और निगलने में परेशानी हो सकती है.
अगर दांत निकालने के बाद टांके लगाए गए हों तो आम तौर पर वे अपने आप घुल जाते हैं.
दांत निकलवाने के बाद घाव वाली जगह पर खून का थक्का (ब्लड क्लॉट) बनता है, जो घाव भरने में मदद करता है.
दांत निकलवाने के बाद शुरुआती कुछ दिनों में जल्दी और बेहतर तरीके से ठीक होने के लिए डॉक्टर ये सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं-
दर्द कम करने के लिए डॉक्टर की सलाह से पैरासिटामोल या आइबुप्रोफेन ली जा सकती है.
जब तक सामान्य रूप से चबाना आसान न हो जाए, तब तक नरम या तरल भोजन खाना बेहतर है.
माउथवॉश या गुनगुने नमक वाले पानी से धीरे-धीरे कुल्ला करके घाव को साफ़ रखना चाहिए.
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डॉक्टरों के मुताबिक, बाकी दांतों की सावधानी से सफाई करें.
लेकिन घाव वाली जगह से बचें, ताकि टांके या बना हुआ ब्लड क्लॉट प्रभावित न हो.
ख़ून बहने की स्थिति में साफ कपड़े या रूई से कम से कम 10 मिनट तक उस जगह को दबाकर रखें.
दूसरी ओर, डॉक्टर कहते हैं कि जनरल एनेस्थीसिया के बाद 48 घंटे तक और सेडेटिव इंजेक्शन के बाद 24 घंटे तक गाड़ी नहीं चलानी चाहिए.
सख्त, कुरकुरे या ऐसे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए जिनके कण घाव में फंस सकते हैं, जैसे मेवे या बीज.
डॉक्टर धूम्रपान न करने की सलाह देते हैं, क्योंकि इससे उनके मुताबिक़ संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.
हालांकि, अक़्ल दाढ़ निकलवाना कठिन प्रक्रिया नहीं है. लेकिन कुछ जटिलताएं हो सकती हैं.
ड्राई सॉकेट: दांत निकलने के बाद बने खाली हिस्से में आम तौर पर खून का थक्का बनता है. अगर यह ठीक से न बने या घाव भरने से पहले अपनी जगह से हट जाए तो तेज़ दर्द हो सकता है. इसे ड्राई सॉकेट कहा जाता है.
संक्रमण: घाव वाली जगह पर संक्रमण हो सकता है, जिसके इलाज के लिए एंटीबायोटिक्स की जरूरत पड़ सकती है.
नसों को नुकसान: अगर दांत के पास मौजूद नसें प्रभावित हों तो जीभ, होंठ या ठुड्डी सुन्नी हो सकती है या इसमें झनझनाहट महसूस हो सकती है.
आम तौर पर यह स्थिति समय के साथ बेहतर हो जाती है, लेकिन कभी-कभी कई हफ़्तों या महीनों तक बनी रह सकती है.
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