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फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स’ में अभिनेता अली फ़ज़ल ने एक ऐसे छात्र का किरदार निभाया था, जो अपना प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं कर पाता. उसे फ़ेल कर दिया जाता है और बाद में वह अपनी जान दे देता है.
साल 2009 में आई इस फ़िल्म ने एक सवाल को आम बातचीत का हिस्सा बनाया था, जब होनहार युवाओं पर सफल होने का दबाव बहुत बढ़ जाए, तो वे उससे कैसे जूझते हैं?
फ़िल्म को आए 15 साल से ज़्यादा हो चुके हैं. लेकिन छात्रों की आत्महत्या का सवाल आज भी बना हुआ है.
इस साल की शुरुआत में ‘अमित कुमार और अन्य बनाम भारत सरकार’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में छात्रों की आत्महत्या के मामले एक दशक में दोगुने होकर 2022 में क़रीब 13 हज़ार तक पहुंच गए थे.
18 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग में दूसरे साल के एक छात्र का शव उसके कमरे में मिला. इसके बाद कैंपस में छात्रों ने प्रदर्शन किया और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता तथा छात्रों की सुरक्षा की मांग की.
छात्र के परिवार ने आरोप लगाया कि दलित होने के कारण शिक्षकों ने उसके साथ भेदभाव किया और वह आत्महत्या की ओर धकेला गया.
संस्थान के प्रशासन ने भेदभाव के आरोप से इनकार किया है. परीक्षा में कथित नकल से जुड़ी बातें भी सामने आई हैं. इस मामले की पुलिस जांच चल रही है, इसलिए छात्र की मौत के कारणों पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी.
लेकिन इस घटना से एक बड़ा सवाल फिर सामने आया है. देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे छात्रों की मानसिक सेहत के साथ क्या हो रहा है?
(आत्महत्या एक गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव में हैं, तो भारत सरकार की जीवन आस्था हेल्पलाइन 18002333330 पर मदद ले सकते हैं. आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करें.)

छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या की रोकथाम पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाए गए राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट कहती है कि छात्र आत्महत्या को केवल मानसिक स्वास्थ्य का मामला मानकर नहीं समझा जा सकता.
रिपोर्ट के मुताबिक़, छात्र के आसपास का माहौल, संस्थान की व्यवस्था और उस पर पड़ने वाले सामाजिक व आर्थिक दबाव को भी देखना होगा.
इसी रिपोर्ट में शोधकर्ता प्रभाकर कृष्णमूर्ति के 2025 के एक अध्ययन का ज़िक्र है.
कार्यक्रम में रखे गए अध्ययन के मुताबिक़, आईआईटी दिल्ली और आईआईटी खड़गपुर में एससी और एसटी छात्रों की पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर सामान्य श्रेणी के छात्रों से 318 प्रतिशत अधिक थी. आरक्षित श्रेणी के छात्रों के पढ़ाई छोड़ने के 47.6 प्रतिशत मामलों में आर्थिक परेशानी एक वजह थी.
कार्यबल की रिपोर्ट में मदद की व्यवस्था पर भी सवाल हैं. कार्यक्रम में बताए गए यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक़, उच्च शिक्षा संस्थानों में 27,136 ऐसे लोग दर्ज थे जो काउंसलिंग के लिए नियुक्त बताए गए थे.
औसतन हर 221 छात्रों पर एक. लेकिन कार्यबल ने जिन 50 लोगों की योग्यता जांची, उनमें 47 शिक्षक, प्लेसमेंट से जुड़े कर्मचारी या पढ़ाई के सलाहकार थे. वे प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं थे.
रिपोर्ट के मुताबिक़, 70 प्रतिशत से ज़्यादा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोई पूर्णकालिक विशेषज्ञ नहीं था. चार प्रतिशत से भी कम संस्थानों के पास आत्महत्या के जोखिम से निपटने की तय प्रक्रिया थी. 23 आईआईटी में केवल चार के पास मानसिक स्वास्थ्य की आपात स्थिति के लिए लिखित प्रक्रिया थी.
इन आंकड़ों और छात्रों के अनुभवों को समझने के लिए बीबीसी हिन्दी के ख़ास कार्यक्रम ‘द लेंस’ में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने तीन लोगों से बात की.
इनमें आईआईटी मद्रास, आईआईटी कानपुर और आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र डॉक्टर प्रणव जीवन; आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी कानपुर, बिट्स पिलानी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस के प्रोफ़ेसर रहे राजीव कुमार; और साथ में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर अरुणा ब्रूटा शामिल रहीं.
आईआईटी में जातिगत भेदभाव कैसा दिख सकता है?

एक ही कठिन प्रवेश परीक्षा पास करके छात्र आईआईटी पहुंचते हैं. फिर वहां जातिगत भेदभाव किस तरह सामने आ सकता है?
यह सवाल पूछे जाने पर डॉक्टर प्रणव जीवन ने कहा कि उनके अनुभव में भेदभाव अक्सर ऐसे तरीक़ों से होता है जिन्हें बाहर से तुरंत पहचानना मुश्किल हो सकता है. खुलकर भेदभाव की घटनाएं भी होती हैं, लेकिन उनके मुताबिक़ वे कम हैं.
डॉक्टर प्रणव ने कहा कि आरक्षित वर्ग से आने वाले किसी छात्र के लिए, ख़ासकर अगर वह अपने परिवार से ऐसे संस्थान तक पहुंचने वाला पहला व्यक्ति हो, नया माहौल डराने वाला हो सकता है.
उन्होंने कहा, “ऐसे समय में उसे सहारे की उम्मीद होती है. लेकिन अगर अपने विभाग में उसे एससी, एसटी या ओबीसी समुदाय का कोई शिक्षक न दिखे, तो अकेले होने का एहसास और बढ़ सकता है.”
उनके मुताबिक़, “कुछ छात्र आरक्षण से दाख़िला लेने वालों के बारे में अपनी ही कक्षा या आसपास तंज सुनते हैं. जैसे वे पढ़ाई में अच्छे नहीं होंगे, फ़ेल हो जाएंगे या उन्हें नौकरी आसानी से मिल जाएगी. डॉक्टर प्रणव ने कहा कि दूसरों को ये बातें मज़ाक लग सकती हैं, लेकिन इन्हें बार-बार सुनने वाले छात्र पर असर पड़ता है.”
वह पढ़ाई में नाकामी को देखने के तरीक़े में भी अंतर बताते हैं. उनके मुताबिक़, सामान्य श्रेणी का कोई छात्र फ़ेल हो तो इसे उसकी अपनी नाकामी माना जाता है, लेकिन आरक्षित वर्ग का छात्र फ़ेल हो, तो कुछ लोग उसकी पूरी जाति या समुदाय के बारे में राय बनाने लगते हैं.
इससे छात्र के सामने सिर्फ़ परीक्षा पास करने का दबाव नहीं रहता. उसे यह चिंता भी हो सकती है कि उसकी अपनी नाकामी को उसके पूरे समुदाय से जोड़कर देखा जाएगा.
क्या हर छात्र एक जैसी तैयारी और सहारे के साथ पहुंचता है?

आईआईटी में ‘मेरिट’ यानी योग्यता की बात होती है. लेकिन क्या परीक्षा में मिले अंकों से ही छात्र की पूरी तैयारी समझी जा सकती है?
इस सवाल पर डॉक्टर प्रणव ने कहा कि कुछ छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जहां पहले से उच्च शिक्षा का अनुभव होता है. उन्हें परिवार, कोचिंग में पढ़ चुके परिचितों या संस्थान में मौजूद वरिष्ठ छात्रों से सलाह मिल जाती है. कौन-सा विषय कैसे पढ़ना है, असाइनमेंट कैसे करना है या किस शिक्षक से बात करनी है.
उनका कहना था कि सभी छात्रों के पास ऐसा नेटवर्क नहीं होता. कुछ को आईआईटी पहुंचने के बाद उन चीज़ों से भी पहली बार परिचय होता है जिन्हें दूसरे छात्र पहले से जानते हैं.
डॉक्टर प्रणव ने 2023 में आईआईटी बॉम्बे के छात्र दर्शन सोलंकी की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से कही गई बात का ज़िक्र किया.
उनके मुताबिक़, परिवार ने बताया था कि दर्शन को संस्थान आने से पहले कंप्यूटर इस्तेमाल करने का अनुभव नहीं था और इसे लेकर दूसरे छात्र तंज करते थे.
डॉक्टर प्रणव का कहना था कि पहले से मिले मौक़ों और जानकारी को अक्सर केवल किसी व्यक्ति की अपनी योग्यता मान लिया जाता है.
उन्होंने शिक्षकों की भर्ती का सवाल भी उठाया. उनके मुताबिक़, जब एससी, एसटी या ओबीसी आवेदकों को ‘उपयुक्त नहीं’ बताकर चुना नहीं जाता, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि चयन की प्रक्रिया में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी कितनी है और उसकी निष्पक्षता कैसे देखी जाती है. यह भर्ती प्रक्रिया पर उनका सवाल और उनकी राय है.
परेशानी हो तो छात्र किससे बात करे?
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क्या कोई छात्र बिना इस डर के मदद मांग सकता है कि उसे कमज़ोर या पढ़ाई के लायक नहीं समझ लिया जाएगा?
डॉक्टर प्रणव का कहना था कि आरक्षित वर्ग के कुछ छात्र अपने समुदाय के बारे में बताने से भी डरते हैं.
उनके मुताबिक़, अगर उन्होंने दूसरे छात्रों को इस आधार पर तंज झेलते देखा हो, तो वे अपने बारे में खुलकर बताने या साथियों से मदद मांगने में हिचक सकते हैं. उन्होंने काउंसलिंग की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया.
आईआईटी बॉम्बे में एक काउंसलर की सोशल मीडिया पोस्ट का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसी छात्र को यह लगे कि मदद देने वाला व्यक्ति ही उसके दाख़िले या योग्यता को संदेह से देखता है, तो वह उसके पास कैसे जाएगा? कार्यक्रम में इस दावे की अलग से जांच पेश नहीं की गई.
डॉक्टर प्रणव ने एससी-एसटी छात्रों की शिकायतें सुनने वाली संस्थागत व्यवस्था पर भी सवाल उठाए.
उनका आरोप था कि कुछ मामलों में शिकायत करने वाले छात्रों को मामला आगे न बढ़ाने के लिए कहा जाता है.
उन्होंने आईआईटी खड़गपुर में एक शिक्षक से जुड़ी 2021 की घटना का ज़िक्र करते हुए पूछा कि अगर छात्रों के सामने आए किसी मामले में भी कार्रवाई न हो, तो दूसरे छात्रों को शिकायत करने का भरोसा कैसे मिलेगा.
ये डॉक्टर प्रणव के आरोप और अनुभव हैं. बातचीत में इनके जवाब में किसी संबंधित संस्थान का पक्ष शामिल नहीं था.
दाख़िले के बाद पढ़ाई का दबाव क्यों बदल जाता है?
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पूर्व प्रोफ़ेसर राजीव कुमार का कहना था कि आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी और वहां दाख़िले के बाद की पढ़ाई में बड़ा फ़र्क़ है.
उन्होंने बताया कि प्रवेश परीक्षा की तैयारी में छात्र तेज़ी से सवाल हल करने का अभ्यास करते हैं. आईआईटी में पहुंचने पर उन्हें कक्षाओं के साथ असाइनमेंट, प्रोजेक्ट और लगातार होने वाले आकलन से जूझना पड़ता है. दूसरे साल से जब छात्र अपने चुने हुए विषय की पढ़ाई में आगे बढ़ते हैं, तो यह बदलाव और साफ़ दिखाई देता है.
राजीव कुमार के मुताबिक़, “नए माहौल में ढलने की ज़िम्मेदारी केवल छात्र की नहीं है. इसमें परिवार और शिक्षकों की भी भूमिका है. इसी वजह से आईआईटी में नए छात्रों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम होते हैं, ताकि वे संस्थान की पढ़ाई और रहने के तरीक़े को समझ सकें.”
अगर छात्र कक्षा में नहीं आ रहा हो या उसकी पढ़ाई में अचानक गिरावट दिखे, तो क्या शिक्षक उस पर ध्यान देते हैं?
इस सवाल पर राजीव कुमार ने कहा कि उनके अनुभव में शिक्षक, फ़ैकल्टी एडवाइज़र और हॉस्टल वार्डन की अलग-अलग ज़िम्मेदारियां होती हैं.
उन्होंने बताया कि वह किसी छात्र के लगातार क्लास से ग़ायब रहने या पढ़ाई में दिक्कत दिखने पर उससे बात करने की कोशिश करते थे. ज़रूरत पड़ने पर छात्र के सलाहकार से भी संपर्क किया जाता था.
परीक्षा में नकल के सवाल पर उनका कहना था कि संस्थान इसे गंभीरता से लेते हैं और छात्रों को नियम पहले से बताए जाते हैं.
आईआईटी बॉम्बे में छात्र की मौत वाले मामले के बारे में उन्होंने साफ़ किया कि उन्हें घटना की जानकारी मीडिया से मिली है.
उन्होंने कहा कि किसी एक परीक्षा में ख़राब प्रदर्शन से छात्र की पूरी पढ़ाई तय नहीं होती, क्योंकि आईआईटी में अंक कई परीक्षाओं, असाइनमेंट और प्रोजेक्ट से मिलकर बनते हैं.
‘जातिगत भेदभाव’ पर एक्सपर्ट ने क्या कहा?
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जातिगत भेदभाव पर राजीव कुमार की राय डॉक्टर प्रणव से अलग थी.
राजीव कुमार ने कहा कि आईआईटी में छात्र और शिक्षक के तौर पर उनके अनुभव में जाति के आधार पर भेदभाव नहीं था.
हालांकि उन्होंने माना कि छात्रों के बीच दूसरे तरह के भेदभाव होते हैं. उदाहरण के लिए, प्रवेश परीक्षा में किसी की रैंक क्या थी और उसे कंप्यूटर साइंस जैसा विषय मिला या कोई दूसरा विषय.
जब उनसे पूछा गया कि रैंक से किसी छात्र की सामाजिक पृष्ठभूमि का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है, तो उन्होंने कहा कि संस्थान छात्रों से एक-दूसरे की रैंक न पूछने को कहते हैं.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह बात किस हद तक मानी जाती है, उन्हें नहीं मालूम.
राजीव कुमार के मुताबिक़, शिक्षक के तौर पर उनके पास किसी छात्र की जाति की जानकारी नहीं होती थी.
दूसरी ओर, डॉक्टर प्रणव का कहना था कि छात्र साथियों, शिक्षकों और कर्मचारियों की टिप्पणियों से भी भेदभाव महसूस कर सकते हैं. यही दोनों के अनुभवों के बीच एक अहम अंतर है.
एससी और एसटी शिक्षकों की कम संख्या पर भी दोनों की राय अलग दिखी.
राजीव कुमार ने माना कि उनकी संख्या कम है, लेकिन आईआईटी में शिक्षक भर्ती की कठिन प्रक्रिया पर ज़ोर दिया. डॉक्टर प्रणव ने सवाल उठाया कि योग्यता तय करने की प्रक्रिया को भी देखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि आवेदकों को यहां तक पहुंचने के लिए किस तरह का सहारा मिला है.
शिकायत की व्यवस्था पर राजीव कुमार ने कहा कि छात्र शिक्षक, सलाहकार या वार्डन से बात कर सकते हैं. वह औपचारिक शिकायत के रास्ते को उपयोगी नहीं मानते.
इस पर उनसे पूछा गया कि अगर किसी छात्र को केवल किसी अच्छे शिक्षक के मिलने पर ही मदद मिलती है, तो उन छात्रों का क्या होगा जिन्हें ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता. राजीव कुमार ने कहा कि संस्थान में बात रखने के कई रास्ते मौजूद हैं.
‘हर ओर पहले आने वाले छात्र हैं’
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क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर अरुणा ब्रूटा के मुताबिक़, सबसे आगे रहने का दबाव कॉलेज में दाख़िले से बहुत पहले शुरू हो सकता है.
उन्होंने कहा कि जब माता-पिता बचपन से ही अच्छे प्रदर्शन को बहुत अधिक महत्व देते हैं और कम अंक आने पर बच्चे को ताने देते हैं, तो बच्चा छोटी उम्र से दबाव महसूस करने लगता है.
डॉक्टर ब्रूटा ने एक छात्रा की बात का उदाहरण दिया. छात्रा अपने स्कूल में पहले आती थी. प्रतिष्ठित संस्थान में पहुंचने के बाद उसे लगा कि उसके आगे, पीछे और आसपास भी ऐसे छात्र हैं जो पहले आते रहे हैं. उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वह सबसे आगे कैसे रहेगी.
डॉक्टर ब्रूटा के मुताबिक़, “ऐसे में छात्र यह भी भूल सकता है कि हमेशा पहले आने की इच्छा शुरू में उसकी अपनी थी या उस पर परिवार की उम्मीदों का इतना असर हुआ कि वह इसे अपनी इच्छा समझने लगा.”
जब उनसे पूछा गया कि पढ़ाई में संघर्ष कर रहा स्टूडेंट मदद मांगने से क्यों हिचक सकता है, तो डॉक्टर ब्रूटा ने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों को पहले यह समझना चाहिए कि स्टूडेंट कैसा महसूस कर रहा है और वह क्या कर सकता है.
उनके मुताबिक़, हर परेशानी परिवार अपने स्तर पर नहीं सुलझा सकता. ज़रूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की मदद लेनी चाहिए.
भेदभाव के असर पर उन्होंने कहा कि इससे छात्र में असुरक्षा और अपने बारे में कमतर महसूस करने की भावना पैदा हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि भेदभाव को केवल छिपे हुए या हल्के तरीक़ों तक सीमित मानना ठीक नहीं, कई बार यह खुलकर भी सामने आता है.
डॉक्टर ब्रूटा ने शिक्षकों और माता-पिता के लिए नियमित प्रशिक्षण का सुझाव दिया, ताकि वे अपने व्यवहार का छात्रों पर पड़ने वाला असर समझ सकें.
उनकी राय थी कि छात्रों को भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से नियमित रूप से बात करने का अवसर मिलना चाहिए.
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि काउंसलिंग के लिए केवल एक पद बना देना पर्याप्त नहीं है. उनके मुताबिक़, किसी छात्र की बात समझने के लिए आधे घंटे से एक घंटे तक की बातचीत और कई बार दोबारा मुलाक़ात की ज़रूरत हो सकती है. इसलिए संस्थानों में पर्याप्त प्रशिक्षित लोगों का होना ज़रूरी है.
आख़िर मदद की ज़िम्मेदारी किसकी है?
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‘द लेंस’ की बातचीत में तीनों मेहमान इस बात पर एकमत नहीं थे कि आईआईटी जैसे संस्थानों में जातिगत भेदभाव कितना है या शिकायत दर्ज कराना कितना कारगर रास्ता है.
डॉक्टर प्रणव ने सवाल उठाए कि अगर किसी छात्र को अपने सहपाठियों, शिक्षक या काउंसलर से ही भरोसा न मिले, तो वह अपनी परेशानी किसके सामने रखेगा.
वहीं प्रोफेसर राजीव कुमार ने कहा कि संस्थानों में शिक्षक सलाहकार, वार्डन और काउंसलिंग सेवाएं मौजूद हैं और छात्रों को भी बात करने के लिए आगे आना चाहिए.
जबकि डॉक्टर ब्रूटा ने ज़ोर दिया कि स्टूडेंट्स की बात सुनने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित विशेषज्ञ होने चाहिए और माता-पिता व शिक्षकों को भी अपने व्यवहार पर ध्यान देना होगा.
इन अलग-अलग जवाबों के बीच वही सवाल बना रहता है जिससे बातचीत शुरू हुई थी.
जब कोई छात्र पढ़ाई, उम्मीदों, आर्थिक परेशानी या भेदभाव के अनुभव से जूझ रहा हो, तो क्या उसके पास ऐसा रास्ता है जहां वह बिना डर के अपनी बात कह सके और जहां संकट गहराने से पहले उसकी बात सुनी जाए?
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